महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रयात: कौशिक्या: पाण्डवो जनमेजय ।
आनुपूर्व्येण सर्वाणि जगामायतनान्यथ ॥ १ ॥
स सागरं समासाद्य गङ्गायाः संगमे नृप ।
नदीशतानां पञ्चानां मध्ये चक्रे समाप्लवम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने कौशिकी नदीके तटवर्ती सभी तीर्थों और मन्दिरोंकी क्रमशः यात्रा की। राजन्! उन्होंने गंगा-सागरसंगमतीर्थमें समुद्रतटपर पहुँचकर पाँच सौ नदियोंके जलमें स्नान किया ॥ १-२ ॥
ततः समुद्रतीरेण जगाम वसुधाधिपः ।
भ्रातृभिः सहितो वीरः कलिङ्गान् प्रति भारत ॥ ३ ॥
भारत! तत्पश्चात् वीर भूपाल युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ कलिंगदेश (उड़ीसा) में गये ॥ ३ ॥
लोमश उवाच
एते कलिङ्गाः कौन्तेय यत्र वैतरणी नदी ।
यत्रायजत धर्मोऽपि देवाञ्छरणमेत्य वै ॥ ४ ॥
तब लोमशजीने कहा—कुन्तीकुमार! यह कलिंग देश है, जिसमें वैतरणी नदी बहती है। जहाँ धर्मने भी देवताओंकी शरणमें जाकर यज्ञ किया था ॥ ४ ॥
ऋषिभिः समुपायुक्तं यज्ञियं गिरिशोभितम् ।
उत्तरं तीरमेतद्धि सततं द्विजसेवितम् ॥ ५ ॥
यह पर्वतमालाओंसे सुशोभित वैतरणीका वही उत्तर तट है जहाँ यज्ञका आयोजन किया गया था। बहुत-से ऋषि तथा ब्राह्मणलोग सदा इस उत्तर तटका सेवन करते आये हैं ॥ ५ ॥
समानं देवयानेन पथा स्वर्गमुपेयुषः ।
अत्र वै ऋषयोऽन्येऽपि पुरा क्रतुभिरीजिरे ॥ ६ ॥
स्वर्गलोककी प्राप्ति करनेवाले पुण्यात्मा मनुष्यके लिये यह स्थान 'देवयान' मार्गके समान है। प्राचीन कालमें ऋषियों तथा अन्य लोगोंने भी यहाँ बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ६ ॥
अत्रैव रुद्रो राजेन्द्र पशुमादत्तवान् मखे ।
पशुमादाय राजेन्द्र भागोऽयमिति चाब्रवीत् ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! यहीं रुद्रदेवने यज्ञमें पशुको ग्रहण कर लिया था। उस पशुको ग्रहण करके उन्होंने कहा—'यह तो मेरा हिस्सा है' ॥ ७ ॥
हृते पशौ तदा देवास्तमूचुर्भरतर्षभ ।
मा परस्वमभिद्रोग्धा मा धर्मान् सकलान् वशीः ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! पशुका अपहरण हो जानेपर देवताओँने उनसे कहा—'आप दूसरोंके धनसे द्रोह न करें (दूसरोंके हिस्सेको न लें) धर्मके साधनभूत समस्त यज्ञभागोंको लेनेकी इच्छा न करें' ॥ ८ ॥
ततः कल्याणरूपाभिर्वाग्भिस्ते रुद्रमस्तुवन् ।
इष्ट्या चैनं तर्पयित्वा मानयांचक्रिरे तदा ॥ ९ ॥
यों कहकर उन्होंने कल्याणमय वचनोंद्वारा भगवान् रुद्रका स्तवन किया और इष्टिद्वारा उन्हें तृप्त करके उस समय उनका विशेष सम्मान किया ॥ ९ ॥
ततः स पशुमुत्सृज्य देवयानेन जग्मिवान् ।
तत्रानुवंशो रुद्रस्य तं निबोध युधिष्ठिर ॥ १० ॥
तब वे उस पशुको वहीं छोड़कर देवयान मार्गसे चले गये। युधिष्ठिर! यज्ञमें भगवान् रुद्रकी भागपरम्पराका बोधक एक श्लोक है, उसे बताता हूँ, सुनो— ॥ १० ॥
अयातयामं सर्वेभ्यो भागेभ्यो भागमुत्तमम् ।
देवाः संकल्पयामासुर्भयाद् रुद्रस्य शाश्वतम् ॥ ११ ॥
'देवताओँने रुद्रदेवके भयसे उनके लिये शीघ्र ही सब भागोंकी अपेक्षा उत्तम एवं सनातन भाग देनेका संकल्प किया' ॥ ११ ॥
इमां गाथामत्र गायन्नपः स्पृशति यो नरः ।
देवयानोऽस्य पन्थाश्च चक्षुषाभिप्रकाशते ॥ १२ ॥
जो मनुष्य यहाँ इस गाथाका गान करते हुए वैतरणीके जलका स्पर्श करता है उसकी दृष्टिमें देवयान मार्ग प्रकाशित हो जाता है ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो वैतरणीं सर्वे पाण्डवा द्रौपदी तथा ।
अवतीर्य महाभागास्तर्पयांचक्रिरे पितॄन् ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर महान् भाग्यशाली समस्त पाण्डवों और द्रौपदीने वैतरणीके जलमें उतरकर अपने पितरोंका तर्पण किया ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
उपस्पृश्येह विधिवदस्यां नद्यां तपोबलात् ।
मानुषादस्मि विषयादपेतः पश्य लोमश ।। १४ ।।
उस समय युधिष्ठिर बोले—लोमशजी! देखिये, इस वैतरणी नदीमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे मुझे तपोबल प्राप्त हुआ है, जिसके प्रभावसे मैं मानवीय विषयोंसे दूर हो गया हूँ ।। १४ ।।
सर्वाँल्लोकान् प्रपश्यामि प्रसादात् तव सुव्रत ।
वैखानसानां जपतामेष शब्दो महात्मनाम् ।। १५ ।।
सुव्रत! आपकी कृपासे इस समय मुझे सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन हो रहा है। यह जप और स्वाध्यायमें लगे हुए महात्मा वैखानस ऋषियोंका शब्द है ।। १५ ।।
लोमश उवाच
त्रिशतं वै सहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर ।
यत्र ध्वनिं शृणोष्येनं तूष्णीमास्व विशाम्पते ।। १६ ।।
लोमशजीने कहा—राजा युधिष्ठिर! जहाँसे आती हुई इस ध्वनिको तुम सुन रहे हो वह स्थान यहाँसे तीन लाख योजन दूर है; अतः अब चुप रहो ।। १६ ।।
एतत् स्वयम्भुवो राजन् वनं दिव्यं प्रकाशते ।
यत्रायजत राजेन्द्र विश्वकर्मा प्रतापवान् ।। १७ ।।
राजन्! यह ब्रह्माजीका दिव्य वन प्रकाशित हो रहा है; राजेन्द्र! यहीं प्रतापी विश्वकर्माने यज्ञ किया है ।। १७ ।।
यस्मिन् यज्ञे हि भूर्दत्ता कश्यपाय महात्मने ।
सपर्वतवनोद्देशा दक्षिणार्थे स्वयम्भुवा ।। १८ ।।
उस यज्ञमें ब्रह्माजीने पर्वत और वनप्रान्तसहित यह सारी पृथ्वी महात्मा कश्यपको दक्षिणारूपमें दे दी थी ।। १८ ।।
अवासीदच्च कौन्तेय दत्तमात्रा मही तदा ।
उवाच चापि कुपिता लोकेश्वरमिदं प्रभुम् ।। १९ ।।
न मां मर्त्याय भगवन् कस्मैचिद् दातुमर्हसि ।
प्रदानं मोघमेतत् ते यास्याम्येष रसातलम् ।। २० ।।
कुन्तीकुमार! उनके द्वारा अपना दान होते ही पृथ्वी बहुत दुःखी हो गयी और कुपित हो लोकनाथ प्रभु ब्रह्मासे इस प्रकार बोली—'भगवन्! आप मुझे किसी मनुष्यको न सौंपें। यदि मुझे मनुष्यको सौंपेंगे तो वह व्यर्थ होगा, क्योंकि मैं अभी रसातलको चली जाऊँगी' ।। १९-२० ।।
विषीदन्तीं तु तां दृष्ट्वा कश्यपो भगवानृषिः ।
प्रसाद्याम्बभूवाथ ततो भूमिं विशाम्पते ।। २१ ।।
राजन्! पृथ्वी देवीको विषाद करती देख महर्षि भगवान् कश्यपने प्रार्थनाद्वारा उन्हें प्रसन्न किया ।। २१ ।।
ततः प्रसन्ना पृथिवी तपसा तस्य पाण्डव ।
पुनरुन्नह्य सलिलाद् वेदीरूपा स्थिता बभौ ।। २२ ।।
पाण्डुनन्दन! उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुई पृथ्वी पुनः जलसे ऊपर उठकर वेदीके रूपमें स्थित हो गयी ।।
सैषा प्रकाशते राजन् वेदी संस्थानलक्षणा ।
आरुह्यात्र महाराज वीर्यवान् वै भविष्यसि ।। २३ ।।
राजन्! वह पृथ्वी देवी ही यहाँ इस मिट्टीकी वेदीके रूपमें प्रकाशित हो रही है। महाराज! इसपर आरूढ़ होकर तुम बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो जाओगे ।। २३ ।।
सैषा सागरमासाद्य राजन् वेदी समाश्रिता ।
एतामारुह्य भद्रं ते त्वमेकस्तर सागरम् ।। २४ ।।
युधिष्ठिर! वही यह वेदीस्वरूपा पृथ्वी समुद्रका आश्रय लेकर स्थित है; तुम्हारा कल्याण हो। तुम अकेले ही इसपर चढ़कर समुद्रको पार करो ।। २४ ।।
अहं च ते स्वस्त्ययनं प्रयोक्ष्ये
यथा त्वमेनामधिरोहसेऽद्य ।
स्पृष्टा हि मर्त्येन ततः समुद्र-
मेषा वेदी प्रविशत्याजमीढ ।। २५ ।।
मैं तुम्हारे लिये स्वस्तिवाचन करूँगा, जिससे तुम आज इस वेदीपर चढ़ सको; अजमीढकुलनन्दन! नहीं तो मनुष्यके द्वारा स्पर्श हो जानेपर यह वेदी समुद्रमें प्रवेश कर जाती है ।। २५ ।।
ॐ नमो विश्वगुप्ताय नमो विश्वपराय ते ।
सांनिध्यं कुरु देवेश सागरे लवणाम्भसि ।। २६ ।।
(समुद्रमें स्नान करते समय उसकी प्रार्थनाके लिये निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—) जिनमें यह सम्पूर्ण विश्व लीन होता है तथा जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। देवेश्वर! आप खारे समुद्रमें निवास करें ।। २६ ।।
अग्निर्मित्रो योनिरापोऽथ देव्यो
विष्णो रेतस्त्वममृतस्य नाभिः ।
एवं ब्रुवन् पाण्डव सत्यवाक्यं
वेदीमिमां त्वं तरसाधिरोह ।। २७ ।।
‘हे समुद्र! अग्नि, मित्र (सूर्य) और दिव्य जल—ये सब तुम्हारी योनि (उत्पत्ति-कारण) हैं। तुम सर्वव्यापी परमात्माके रेतस् (वीर्य या शक्ति) हो और तुम्हीं अमृतकी उत्पत्तिके
स्थान हो।' पाण्डुनन्दन! इस सत्य वाक्यका उच्चारण करते हुए तुम शीघ्रतापूर्वक इस वेदीपर आरूढ़ हो जाओ॥ २७॥
अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो
रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः।
एवं जपन् पाण्डव सत्यवाक्यं
ततोऽवगाहेत पतिं नदीनाम्॥ २८॥
'हे महासागर! अग्नि तुम्हारी योनि (कारण) है और यज्ञ शरीर है, तुम भगवान् विष्णुकी शक्तिके आधार और मोक्षके साधन हो।' पाण्डुपुत्र! इस सत्य वचनको बोलते हुए नदियोंके स्वामी समुद्रमें स्नान करना चाहिये॥ २८॥
अन्यथा हि कुरुश्रेष्ठ देवयोनिरपां पतिः।
कुशाग्रेणापि कौन्तेय न स्प्रष्टव्यो महोदधिः॥ २९॥
कुरुश्रेष्ठ! जलका स्वामी समुद्र देवताओंका अधिष्ठान है। कुन्तीनन्दन! ऊपर बतायी हुई रीतिके सिवा दूसरे किसी प्रकारसे इस महासागरका कुशके अग्रभागद्वारा भी स्पर्श नहीं करना चाहिये॥ २९॥
वैशम्पायन उवाच
ततः कृतस्वस्त्ययनो महात्मा
युधिष्ठिरः सागरमभ्यगच्छत्।
कृत्वा च तच्छासनमस्य सर्वं
महेन्द्रमासाद्य निशामुवास॥ ३०॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर लोमशजीके स्वस्तिवाचन करनेके पश्चात् महात्मा राजा युधिष्ठिरने उनकी बतायी हुई सारी विधियोंका पालन करते हुए समुद्रमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया। इसके बाद महेन्द्रपर्वतपर जाकर रात्रि बितायी॥ ३०॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां महेन्द्राचलगमने
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें महेन्द्राचलगमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥