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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 800, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 800

राजन्! पृथ्वी देवीको विषाद करती देख महर्षि भगवान् कश्यपने प्रार्थनाद्वारा उन्हें प्रसन्न किया ।। २१ ।।
ततः प्रसन्ना पृथिवी तपसा तस्य पाण्डव ।
पुनरुन्नह्य सलिलाद् वेदीरूपा स्थिता बभौ ।। २२ ।।
पाण्डुनन्दन! उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुई पृथ्वी पुनः जलसे ऊपर उठकर वेदीके रूपमें स्थित हो गयी ।।
सैषा प्रकाशते राजन् वेदी संस्थानलक्षणा ।
आरुह्यात्र महाराज वीर्यवान् वै भविष्यसि ।। २३ ।।
राजन्! वह पृथ्वी देवी ही यहाँ इस मिट्टीकी वेदीके रूपमें प्रकाशित हो रही है। महाराज! इसपर आरूढ़ होकर तुम बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो जाओगे ।। २३ ।।
सैषा सागरमासाद्य राजन् वेदी समाश्रिता ।
एतामारुह्य भद्रं ते त्वमेकस्तर सागरम् ।। २४ ।।
युधिष्ठिर! वही यह वेदीस्वरूपा पृथ्वी समुद्रका आश्रय लेकर स्थित है; तुम्हारा कल्याण हो। तुम अकेले ही इसपर चढ़कर समुद्रको पार करो ।। २४ ।।
अहं च ते स्वस्त्ययनं प्रयोक्ष्ये
यथा त्वमेनामधिरोहसेऽद्य ।
स्पृष्टा हि मर्त्येन ततः समुद्र-
मेषा वेदी प्रविशत्याजमीढ ।। २५ ।।
मैं तुम्हारे लिये स्वस्तिवाचन करूँगा, जिससे तुम आज इस वेदीपर चढ़ सको; अजमीढकुलनन्दन! नहीं तो मनुष्यके द्वारा स्पर्श हो जानेपर यह वेदी समुद्रमें प्रवेश कर जाती है ।। २५ ।।
ॐ नमो विश्वगुप्ताय नमो विश्वपराय ते ।
सांनिध्यं कुरु देवेश सागरे लवणाम्भसि ।। २६ ।।
(समुद्रमें स्नान करते समय उसकी प्रार्थनाके लिये निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—) जिनमें यह सम्पूर्ण विश्व लीन होता है तथा जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। देवेश्वर! आप खारे समुद्रमें निवास करें ।। २६ ।।
अग्निर्मित्रो योनिरापोऽथ देव्यो
विष्णो रेतस्त्वममृतस्य नाभिः ।
एवं ब्रुवन् पाण्डव सत्यवाक्यं
वेदीमिमां त्वं तरसाधिरोह ।। २७ ।।
‘हे समुद्र! अग्नि, मित्र (सूर्य) और दिव्य जल—ये सब तुम्हारी योनि (उत्पत्ति-कारण) हैं। तुम सर्वव्यापी परमात्माके रेतस् (वीर्य या शक्ति) हो और तुम्हीं अमृतकी उत्पत्तिके