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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन

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विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

काश्यपो ह्यथ वासिष्ठः प्राणश्च प्राणपुत्रकः ।
अग्निराङ्गिरसश्चैव च्यवनस्त्रिषु वर्चकः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! कश्यपपुत्र काश्यप, वसिष्ठ-पुत्र वासिष्ठ, प्राणपुत्र प्राणक, अंगिराके पुत्र च्यवन तथा त्रिवर्चा—ये पाँच अग्नि हैं ॥ १ ॥

अचरन्त तपस्तीव्रं पुत्रार्थे बहुवार्षिकम् ।
पुत्रं लभेम धर्मिष्ठं यशसा ब्रह्मणा समम् ॥ २ ॥
इन्होंने पुत्रकी प्राप्तिके लिये बहुत वर्षोंतक तीव्र तपस्या की। इनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम ब्रह्माजीके समान यशस्वी और धर्मिष्ठ पुत्र प्राप्त करें ॥ २ ॥

महाव्याहृतिभिर्ध्यातः पञ्चभिस्तैस्तदा त्वथ ।
जज्ञे तेजो महार्चिष्मान् पञ्चवर्णः प्रभावनः ॥ ३ ॥
पूर्वोक्त पाँच अग्निरूप ऋषियोंने महाव्याहृतिसंज्ञक पाँच मन्त्रोंद्वारा* परमात्माका ध्यान किया, तब उनके समक्ष अत्यन्त तेजोमय, पाँच वर्णोंसे विभूषित एक पुरुष प्रकट हुआ, जो ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होता था। वह सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करनेमें समर्थ था ॥ ३ ॥

समिद्धोऽग्निः शिरस्तस्य बाहू सूर्यनभौ तथा ।
त्वङ्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जङ्घे च भारत ॥ ४ ॥
भारत! उसका मस्तक प्रज्वलित अग्निके समान जगमगा रहा था, दोनों भुजाएँ प्रभाकरकी प्रभाके समान थीं, दोनों आँखें तथा त्वचा—सुवर्णके समान देदीप्यमान हो रही थीं और उस पुरुषकी पिण्डलियाँ काले रंगकी दिखायी देती थीं ॥ ४ ॥

पञ्चवर्णः स तपसा कृतस्तैः पञ्चभिर्जनैः ।
पाञ्चजन्यः श्रुतो देवः पञ्चवंशकरस्तु सः ॥ ५ ॥
उपर्युक्त पाँच मुनिजनोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस पाँच वर्णवाले पुरुषको प्रकट किया था, इसलिये उस देवोपम पुरुषका नाम पाञ्चजन्य हो गया। वह उन पाँचों ऋषियोंके वंशका प्रवर्तक हुआ ॥ ५ ॥

दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महातपाः ।
जनयत् पावकं घोरं पितॄणां स प्रजाः सृजन् ॥ ६ ॥
फिर महातपस्वी पाञ्चजन्यने अपने पितरोंका वंश चलानेके लिये दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके भयंकर दक्षिणाग्निको उत्पन्न किया ॥ ६ ॥

बृहद् रथन्तरं मूर्ध्नो वक्त्राद् वा तरसाहरौ ।
शिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं वाय्वग्नी प्राणतोऽसृजत् ॥ ७ ॥
उन्होंने मस्तकसे बृहत् तथा मुखसे रथन्तर सामको प्रकट किया। ये दोनों वेगपूर्वक आयु आदिको हर लेते हैं, इसलिये 'तरसाहर' कहलाते हैं। फिर उन्होंने नाभिसे रुद्रको, बलसे इन्द्रको तथा प्राणसे वायु और अग्निको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥

बाहुभ्यामनुदात्तौ च विश्वे भूतानि चैव ह ।
एतान् सृष्ट्वा ततः पञ्च पितॄणामसृजत् सुतान् ॥ ८ ॥
दोनों भुजाओंसे प्राकृत और वैकृत भेदवाले दोनों अनुदात्तोंको मन और ज्ञानेन्द्रियोंके समस्त (छहों) देवताओंको तथा पाँच महाभूतोंको उत्पन्न किया। इन सबकी सृष्टि करनेके पश्चात् उन्होंने पाँचों पितरोंके लिये पाँच पुत्र और उत्पन्न किये ॥ ८ ॥

बृहद्रथस्य प्रणिधिः काश्यपस्य महत्तरः ।
भानुरङ्गिरसो धीरः पुत्रो वर्चस्य सौभरः ॥ ९ ॥
(जिनके नाम इस प्रकार हैं—) वासिष्ठ बृहद्रथके अंशसे प्रणिधि, काश्यपके अंशसे महत्तर, अंगिरस च्यवनके अंशसे भानु तथा वर्चके अंशसे सौभर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥

प्राणस्य चानुदात्तस्तु व्याख्याताः पञ्चविंशतिः ।
देवान् यज्ञमुषश्चान्यान् सृजत् पञ्चदशोत्तरान् ॥ १० ॥
सुभीममतिभीमं च भीमं भीमबलाबलम् ।
एतान् यज्ञमुषः पञ्च देवानां ह्यसृजत् तपः ॥ ११ ॥
प्राणके अंशसे अनुदात्तकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार पचीस पुत्रोंके नाम बताये गये। तत्पश्चात् 'तप' नामधारी पाञ्चजन्यने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले अन्य पंद्रह उत्तर देवों (विनायकों)-की सृष्टि की। उनका विवरण इस प्रकार है—सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल—इन पाँच विनायकोंकी उत्पत्ति उन्होंने पहले की, जो देवताओंके यज्ञका विनाश करनेवाले हैं ॥ १०-११ ॥

सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् ।
मित्रधर्माणमित्येतान् देवानभ्यसृजत् तपः ॥ १२ ॥
इनके बाद पाञ्चजन्यने सुमित्र, मित्रवान्, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्मा—इन पाँच देवरूपी विनायकोंको उत्पन्न किया ॥ १२ ॥

सुरप्रवीरं वीरं च सुरेशं च सुवर्चसम् ।
सुराणामपि हन्तारं पञ्चैतानसृजत् तपः ॥ १३ ॥
तदनन्तर पाञ्चजन्यने सुरप्रवीर, वीर, सुरेश, सुवर्चा तथा सुरहन्ता—इन पाँचोंको प्रकट किया ॥ १३ ॥

त्रिविधं संस्थिता ह्येते पञ्च पञ्च पृथक् पृथक् ।

मुष्णन्त्यत्र स्थिता ह्येते स्वर्गतो यज्ञयाजिनः ॥ १४ ॥
इस प्रकार ये पंद्रह देवोपम प्रभावशाली विनायक पृथक्-पृथक् पाँच-पाँच व्यक्तियोंके तीन दलोंमें विभक्त हैं। इस पृथ्वीपर ही रहकर स्वर्गलोकसे भी यज्ञकर्ता पुरुषोंकी यज्ञ-सामग्रीका अपहरण कर लेते हैं ॥ १४ ॥
तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्धविः ।
स्पर्धया हव्यवाहानां निघ्नन्त्येते हरन्ति च ॥ १५ ॥
ये विनायकगण अग्नियोंके लिये अभीष्ट महान् हविष्यका अपहरण तो करते ही हैं, उसे नष्ट भी कर डालते हैं। अग्निगणोंके साथ लाग-डाँट रखनेके कारण ही ये हविष्यका अपहरण और विध्वंस करते हैं ॥ १५ ॥
बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलैः सम्प्रवर्तितम् ।
तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्निः स्थितो भवेत् ॥ १६ ॥
इसीलिये यज्ञनिपुण विद्वानोंने यज्ञशालाकी बाह्य वेदीपर इन विनायकोंके लिये देयभाग रख देनेका नियम चालू किया है; क्योंकि जहाँ अग्निकी स्थापना हुई हो, उस स्थानके निकट ये विनायक नहीं जाते हैं ॥ १६ ॥
चितोऽग्निरुद्धहन् यज्ञं पक्षाभ्यां तान् प्रबाधते ।
मन्त्रैः प्रशमिता ह्येते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम् ॥ १७ ॥
मन्त्रद्वारा संस्कार करनेके पश्चात् प्रज्वलित अग्निदेव जिस समय आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञका सम्पादन करते हैं, उस समय वे अपने दोनों पंखों (पार्श्ववर्ती शिखाओं) द्वारा उन विनायकोंको कष्ट पहुँचाते हैं (इसीलिये वे उनके पास नहीं फटकते)। मन्त्रोंद्वारा शान्त कर देनेपर वे विनायक यज्ञसम्बन्धी हविष्यका अपहरण नहीं कर पाते हैं ॥ १७ ॥
बृहदुक्थस्तपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रितः ।
अग्निहोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्भिरीज्यते ॥ १८ ॥
इस पृथ्वीपर जब अग्निहोत्र होने लगता है, उस समय तप (पाञ्चजन्य)-के ही पुत्र बृहदुक्थ इस भूतलपर स्थित हो श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पूजित होते हैं ॥ १८ ॥
रथन्तरश्च तपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते ।
मित्रविन्दाय वै तस्य हविरध्वर्यवो विदुः ॥ १९ ॥
मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्रैर्महायशाः ॥ २० ॥
तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान् मानते हैं। महायशस्वी तप (पाञ्चजन्य) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं ॥ १९-२० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२० ।।


* भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः—ये पाँच महाव्याहृतियाँ हैं। ध्यानके लिये मन्त्रप्रयोग इस प्रकार है—‘ॐ भूरन्नमग्नये पृथिव्यै स्वाहा’ इत्यादि।