महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(घोषयात्रापर्व)
(घोषयात्रापर्व)
षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्गार
जनमेजय उवाच
एवं वने वर्तमाना नराग्र्याः
शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गाः ।
सरस्तदासाद्य वनं च पुण्यं
ततः परं किमकुर्वन्त पार्थाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार वनमें रहकर सर्दी, गर्मी, हवा और धूपका कष्ट सहनेके कारण जिनके शरीर अत्यन्त कृश हो गये थे, उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने पवित्र द्वैतवनमें पूर्वोक्त सरोवरके पास पहुँचकर फिर कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
सरस्तदासाद्य तु पाण्डुपुत्रा
जनं समुत्सृज्य विधाय वेश्म ।
वनानि रम्याण्यथ पर्वतांश्च
नदीप्रदेशांश्च तदा विचेरुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन्! उस (रमणीय) सरोवरपर आकर पाण्डवोंने वहाँ आये हुए जनसमुदायको विदा कर दिया और अपने रहनेके लिये कुटी बनाकर वे आस-पासके रमणीय वनों, पर्वतों तथा नदीके तटप्रदेशोंमें विचरने लगे ॥ २ ॥
तथा वने तान् वसतः प्रवीरान्
स्वाध्यायवन्तश्च तपोधनाश्च ।
अभ्याययुर्वेदविदः पुराणा-
स्तान् पूजयामासुरथो नराग्र्याः ॥ ३ ॥
इस तरह वनमें रहते हुए उन वीरशिरोमणि पाण्डवोंके पास बहुत-से स्वाध्यायशील, वेदवेत्ता एवं पुरातन तपस्वी ब्राह्मण आते थे और वे नरश्रेष्ठ पाण्डव उनकी यथोचित सेवा-पूजा करते थे ॥ ३ ॥
ततः कदाचित् कुशलः कथासु
विप्रोऽभ्यगच्छद् भुवि कौरवेयान् ।
स तैः समेत्याथ यदृच्छयैव
वैचित्रवीर्यं नृपमभ्यगच्छत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर किसी समय कथा-वार्तामें कुशल एक ब्राह्मण उस वन्यभूमिमें पाण्डवोंके पास आया और उनसे मिलकर वह घूमता-घामता अकस्मात् राजा धृतराष्ट्रके दरबारमें जा पहुँचा ॥ ४ ॥
अथोपविष्टः प्रतिसत्कृतश्च
वृद्धेन राज्ञा कुरुसत्तमेन ।
प्रचोदितः संकथयाम्बभूव
धर्मानिलेन्द्रप्रभवान् यमौ च ॥ ५ ॥
कुरुकुलमें श्रेष्ठ एवं वयोवृद्ध राजा धृतराष्ट्रने उसका बहुत आदर-सत्कार किया। जब वह आसनपर बैठ गया, तब महाराजके पूछनेपर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवके समाचार सुनाने लगा ॥ ५ ॥
कृशांश्च वातातपकर्शिताङ्गान्
दुःखस्य चोग्रस्य मुखे प्रपन्नान् ।
तां चाप्यनाथामिव वीरनाथां
कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ॥ ६ ॥
उसने बताया—‘इस समय पाण्डव हवा और गर्मी आदिका कष्ट सहन करनेके कारण अत्यन्त कृश हो गये हैं। भयंकर दुःखके मुँहमें पड़ गये हैं और वीरपत्नी द्रौपदी भी अनाथकी भाँति सब ओरसे क्लेश-ही-क्लेश भोग रही है’ ॥ ६ ॥
ततः कथास्तस्य निशम्य राजा
वैचित्रवीर्यः कृपयाभितप्तः ।
वने तथा पार्थिवपुत्रपौत्रान्
श्रुत्वा तथा दुःखनदीं प्रपन्नान् ॥ ७ ॥
प्रोवाच दैन्याभिहतान्तरात्मा
निःश्वासवातोपहतस्तदानीम् ।
वाचं कथंचित् स्थिरतामुपेत्य
तत् सर्वमात्मप्रभवं विचिन्त्य ॥ ८ ॥
ब्राह्मणकी ये बातें सुनकर विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र दयासे द्रवित हो बहुत दुःखी हो गये। जब उन्होंने सुना कि राजाके पुत्र और पौत्र होकर भी पाण्डव इस प्रकार दुःखकी नदीमें डूबे हुए हैं, तब उनका हृदय करुणासे भर आया और वे लंबी-लंबी साँसे खींचते हुए किसी प्रकार धैर्य धारण करके सब कुछ अपनी ही करतूतका परिणाम समझकर यों बोले — ॥ ७-८ ॥
कथं नु सत्यः शुचिरार्यवृत्तो
ज्येष्ठः सुतानां मम धर्मराजः ।
अजातशत्रुः पृथिवीतले स्म
शेते पुरा राङ्कवकूटशायी ॥ ९ ॥
‘अहो! जो मेरे सभी पुत्रोंमें बड़े तथा सत्यवादी, पवित्र और सदाचारी हैं तथा जो पहले रंकु मृगके (नरम) रोओंसे बने हुए बिछौनोंपर सोया करते थे, वे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर आजकल भूमिपर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ९ ॥
प्रबोध्यते मागधसूतपूगै-
र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वयमिन्द्रकल्पः ।
पतत्रिसङ्घैः स जघन्यरात्रे
प्रबोध्यते नूनमिडातलस्थः ॥ १० ॥
‘जिन्हें कभी मागधों और सूतोंका समुदाय प्रतिदिन स्तुति-पाठ करके जगाता था, जो साक्षात् इन्द्रके समान तेजस्वी और पराक्रमी हैं, वे ही राजा युधिष्ठिर निश्चय ही अब भूमिपर सोते और पक्षियोंके कलरव सुनकर रातके पिछले पहरमें जागते होंगे’ ॥ १० ॥
कथं नु वातातपकर्शिताङ्गो
वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः ।
शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः
कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः ॥ ११ ॥
'भीमसेनका शरीर हवा और धूपका कष्ट सहन करनेसे अत्यन्त दुर्बल हो गया होगा। उनका अंग-अंग क्रोधसे काँपता और फड़कता होगा। वे द्रौपदीके सामने कैसे धरतीपर शयन करते होंगे? उनका शरीर ऐसा कष्ट भोगनेयोग्य नहीं है ॥ ११ ॥
तथार्जुनः सुकुमारो मनस्वी
वशे स्थितो धर्मसुतस्य राज्ञः ।
विदूयमानैरिव सर्वगात्रै-
र्ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥ १२ ॥
'इसी प्रकार सुकुमार एवं मनस्वी अर्जुन, जो सदा धर्मराज युधिष्ठिरके अधीन रहते हैं, अमर्षके कारण उनके सारे अंगोंमें संताप हो रहा होगा और निश्चय ही उन्हें अपनी कुटियामें अच्छी तरह नींद नहीं आती होगी ॥ १२ ॥
यमौ च कृष्णां च युधिष्ठिरं च
भीमं च दृष्ट्वा सुखविप्रयुक्तम् ।
विनिःश्वसन् सर्प इवोग्रतेजा
ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥ १३ ॥
'अर्जुनका तेज बड़ा ही भयंकर है। वे नकुल, सहदेव, द्रौपदी, युधिष्ठिर तथा भीमसेनको सुखसे वंचित देखकर सर्पके समान फुककारते होंगे और अमर्षके कारण निश्चय ही उन्हें नींद नहीं आती होगी ॥ १३ ॥
तथा यमौ चाप्यसुखौ सुखार्हौ
समृद्धरूपावमरौ दिवीव ।
प्रजागरस्थौ ध्रुवमप्रशान्तौ
धर्मेण सत्येन च वार्यमाणौ ॥ १४ ॥
'इसी प्रकार सुख भोगनेके योग्य नकुल और सहदेवका भी सुख छिन गया है। वे दोनों भाई स्वर्गके देवता अश्विनीकुमारोंकी भाँति रूपवान् हैं। वे भी निश्चय ही अशान्तभावसे सारी रात जागते हुए भूमिपर सोते होंगे। धर्म और सत्य ही उन्हें तत्काल आक्रमण करनेसे रोके हुए हैं ॥ १४ ॥
समीरणेनाथ समो बलेन
समीरणस्यैव सुतो बलीयान् ।
स धर्मपाशेन सितोऽग्रजेन
ध्रुवं विनिःश्वस्य सहत्यमर्षम् ॥ १५ ॥
'जो बलमें वायुके समान हैं, वायुदेवताके ही अत्यन्त बलवान् पुत्र हैं, वे भीमसेन भी अपने बड़े भाईके द्वारा धर्मके बन्धनमें बाँध लिये गये हैं। निश्चय ही इसीलिये चुपचाप लम्बी
साँसें खींचते हुए वे क्रोधको सहन करते हैं ।। १५ ।।
स चापि भूमौ परिवर्तमानो
वधं सुतानां मम काङ्क्षमाणः ।
सत्येन धर्मेण च वार्यमाणः
कालं प्रतीक्षत्यधिको रणेऽन्यैः ॥ १६ ॥
‘रणभूमिमें भीमसेन दूसरोंकी अपेक्षा सदा अधिक पराक्रमी सिद्ध होते हैं। वे मेरे पुत्रोंके वधकी कामना करते हुए धरतीपर करवटें बदल रहे होंगे। सत्य और धर्मने ही उन्हें रोक रखा है; अतः वे भी अवसरकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं ।। १६ ।।
अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या
दुःशासनो यत् परुषाण्यवोचत् ।
तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं
दहन्ति कक्षाग्निरिवेन्धनानि ॥ १७ ॥
‘अजातशत्रु युधिष्ठिरको जूएमें छलपूर्वक हरा दिये जानेपर दुःशासनने जो कड़वी बातें कही थीं, वे भीमसेनके शरीरमें घुसकर जैसे आग तृण और काष्ठके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार उन्हें दग्ध कर रही होंगी ।। १७ ।।
न पापकं ध्यास्यति धर्मपुत्रो
धनंजयश्चाप्यनुवत्स्यते तम् ।
अरण्यवासेन विवर्धते तु
भीमस्य कोपोऽग्निरिवानिलेन ॥ १८ ॥
‘धर्मपुत्र युधिष्ठिर मेरे अपराधपर ध्यान नहीं देंगे। अर्जुन भी उन्हींका अनुसरण करेंगे। परंतु इस वनवाससे भीमसेनका क्रोध तो उसी प्रकार बढ़ रहा होगा, जैसे हवा लगनेसे आग धधक उठती है ।। १८ ।।
स तेन कोपेन विदह्यमानः
करं करेणाभिनिपीड्य वीरः ।
विनिःश्वसत्युष्णमतीव घोरं
दहन्निवेमान् मम पुत्रपौत्रान् ॥ १९ ॥
‘उस क्रोधसे जलते हुए वीरवर भीमसेन हाथसे हाथ मलकर इस प्रकार अत्यन्त भयंकर गर्म-गर्म साँस खींच रहे होंगे, मानो मेरे इन पुत्रों और पौत्रोंको अभी भस्म कर डालेंगे ।। १९ ।।
गाण्डीवधन्वा च वृकोदरश्च
संरम्भिणावन्तककालकल्पौ ।
न शेषयेतां युधि शत्रुसेनां
शरान् किरन्तावशनिप्रकाशान् ॥ २० ॥
'गाण्डीवधारी अर्जुन तथा भीमसेन जब क्रोधमें भर जायँगे, उस समय यमराज और कालके समान हो जायँगे। वे रणभूमिमें विद्युत्के समान चमकनेवाले बाणोंकी वर्षा करके शत्रुसेनामेंसे किसीको भी जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रो
दुःशासनश्चापि सुमन्दचेताः ।
मधु प्रपश्यन्ति न तु प्रपातं
यद् द्यूतमालम्ब्य हरन्ति राज्यम् ॥ २१ ॥
'दुर्योधन, शकुनि, सूतपुत्र कर्ण तथा दुःशासन—ये बड़े ही मूढ़बुद्धि हैं, क्योंकि जूएके सहारे दूसरेके राज्यका अपहरण कर रहे हैं। (ये अपने ऊपर आनेवाले संकटको नहीं देखते हैं) इन्हें वृक्षकी शाखासे टपकता हुआ केवल मधु ही दिखायी देता है, वहाँसे गिरनेका जो भारी भय है, उधर इनकी दृष्टि नहीं है ॥ २१ ॥
शुभाशुभं कर्म नरो हि कृत्वा
प्रतीक्षते तस्य फलं स्म कर्ता ।
स तेन मुह्यत्यवशः फलेन
'मोक्षः कथं स्यात् पुरुषस्य तस्मात् ॥ २२ ॥
मनुष्य शुभ और अशुभ कर्म करके उसके स्वर्ग-नरकरूप फलकी प्रतीक्षा करता है। वह उस फलसे विवश होकर मोहित होता है। ऐसी दशामें मूढ़ पुरुषका उस मोहसे कैसे छुटकारा हो सकता है? ॥ २२ ॥
क्षेत्रे सुकृष्टे ह्युपिते च बीजे
देवे च वर्षत्यृतुकालयुक्तम् ।
न स्यात् फलं तस्य कुतः प्रसिद्धि-
रन्यत्र दैवादिति चिन्तयामि ॥ २३ ॥
'मैं सोचता हूँ कि अच्छी तरह जोते हुए खेतमें बीज बोया जाय तथा ऋतुके अनुसार ठीक समयपर वर्षा भी हो, फिर भी उसमें फल न लगे, तो इसमें प्रारब्धके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी सिद्धि कैसे की जा सकती है? ॥ २३ ॥
कृतं मताक्षेण यथा न साधु
साधुप्रवृत्तेन च पाण्डवेन ।
मया च दुष्पुत्रवशानुगेन
तथा कुरूणामयमन्तकालः ॥ २४ ॥
'द्यूतप्रेमी शकुनिने जूआ खेलकर कदापि अच्छा नहीं किया। साधुतामें लगे हुए युधिष्ठिरने भी जो उसे तत्काल नहीं मार डाला, यह भी अच्छा नहीं किया। इसी प्रकार कुपुत्रके वशमें पड़कर मैंने भी कोई अच्छा काम नहीं किया है। इसीका फल है कि यह कौरवोंका अन्तकाल आ पहुँचा है ॥ २४ ॥
ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि
ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या।
ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश-
स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः॥ २५॥
'निश्चय ही बिना किसी प्रेरणाके भी हवा चलेगी ही, जो गर्भिणी है, वह समयपर अवश्य ही बच्चा जनेगी। दिनके आदिमें रजनीका नाश अवश्यम्भावी है तथा रात्रिके प्रारम्भमें दिनका भी अन्त होना निश्चित है। (इसी प्रकार पापका फल भी किसीके टाले नहीं टल सकता)॥ २५॥
क्रियेत कस्मादपरे च कुर्यु-
र्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथंचित्।
प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः
कथं न तत् स्यादिति तत् कुतः स्यात्॥ २६॥
'यदि यह विश्वास हो जाय तो हम लोभके वश होकर न करनेयोग्य काम क्यों करें और दूसरे भी क्यों करें एवं बुद्धिमान् मनुष्य भी उपार्जित धनका दान क्यों न करें? अर्थके उपयोगका समय प्राप्त होनेपर यदि उसका सदुपयोग न किया जाय तो वह अनर्थका हेतु हो जाता है। अतः विचार करना चाहिये कि उस धनका सदुपयोग क्यों नहीं होता और कैसे हो?॥ २६॥
कथं न भिद्येत न च स्रवेत
न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम्।
अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्येद्
ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके॥ २७॥
'यदि प्राप्त हुए धनका यथावत् वितरण न किया जायगा तो वह कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी भाँति चूकर व्यर्थ नष्ट क्यों न होगा? यह सोचकर उसकी रक्षा करना ही कर्तव्य है। यदि यथायोग्य विभाजनके द्वारा धनकी रक्षा न की जायगी तो वह सैकड़ों प्रकारसे बिखर जायगा। जगत्में किये हुए कर्म-फलका नाश नहीं होता—यह निश्चित है। (इससे यही सिद्ध होता है कि उसका यथायोग्य वितरण कर देना ही उचित है)'॥ २७॥
गतो ह्यरण्यादपि शक्रलोकं
धनंजयः पश्यत वीर्यमस्य।
अस्त्राणि दिव्यानि चतुर्विधानि
ज्ञात्वा पुनर्लोकमिमं प्रपन्नः॥ २८॥
'देखो, अर्जुनमें कितनी शक्ति है! वे वनसे भी इन्द्रलोकको चले गये और वहाँसे चारों प्रकारके दिव्यास्त्र सीखकर पुनः इस लोकमें लौट आये॥ २८॥
स्वर्गं हि गत्वा सशरीर एव
को मानुषः पुनरागन्तुमिच्छेत् ।
अन्यत्र कालोपहताननेकान्
समीक्षमाणस्तु कुरून् मुमूर्षून् ॥ २९ ॥
‘सदेह स्वर्गमें जाकर कौन मनुष्य इस संसारमें पुनः लौटना चाहेगा। अर्जुनके पुनः मर्त्यलोकमें लौटनेका कारण इसके सिवा दूसरा नहीं है कि ये बहुसंख्यक कौरव कालके वशीभूत हो मृत्युके निकट पहुँच गये हैं और अर्जुन इनकी इस अवस्थाको अच्छी तरह देख रहे हैं’॥ २९ ॥
धनुर्ग्राहश्चार्जुनः सव्यसाची
धनुश्च तद् गाण्डिवं भीमवेगम् ।
अस्त्राणि दिव्यानि च तानि तस्य
त्रयस्य तेजः प्रसहेत कोऽत्र ॥ ३० ॥
‘सव्यसाची अर्जुन अद्वितीय धनुर्धर हैं। उनके उस गाण्डीव धनुषका वेग भी बड़ा भयानक है, और अब तो अर्जुनको वे दिव्यास्त्र भी प्राप्त हो गये हैं। इस समय इन तीनोंके सम्मिलित तेजको यहाँ कौन सह सकता है?’॥ ३० ॥
निशम्य तद् वचनं पार्थिवस्य
दुर्योधनं रहिते सौबलोऽथ ।
अबोधयत् कर्णमुपेत्य सर्वं
स चाप्यहृष्टोऽभवदल्पचेताः ॥ ३१ ॥
एकान्तमें कही हुई राजा धृतराष्ट्रकी उपर्युक्त सारी बातें सुनकर सुबलपुत्र शकुनिने दुर्योधन और कर्णके पास जाकर ज्यों-की-त्यों कह सुनायी। इससे मन्दमति दुर्योधन उदास एवं चिन्तित हो गया ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि धृतराष्ट्रखेदवाक्ये
षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें धृतराष्ट्रके खेदयुक्त वचनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३६ ॥