महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1624, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि
ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या।
ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश-
स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः॥ २५॥
'निश्चय ही बिना किसी प्रेरणाके भी हवा चलेगी ही, जो गर्भिणी है, वह समयपर अवश्य ही बच्चा जनेगी। दिनके आदिमें रजनीका नाश अवश्यम्भावी है तथा रात्रिके प्रारम्भमें दिनका भी अन्त होना निश्चित है। (इसी प्रकार पापका फल भी किसीके टाले नहीं टल सकता)॥ २५॥
क्रियेत कस्मादपरे च कुर्यु-
र्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथंचित्।
प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः
कथं न तत् स्यादिति तत् कुतः स्यात्॥ २६॥
'यदि यह विश्वास हो जाय तो हम लोभके वश होकर न करनेयोग्य काम क्यों करें और दूसरे भी क्यों करें एवं बुद्धिमान् मनुष्य भी उपार्जित धनका दान क्यों न करें? अर्थके उपयोगका समय प्राप्त होनेपर यदि उसका सदुपयोग न किया जाय तो वह अनर्थका हेतु हो जाता है। अतः विचार करना चाहिये कि उस धनका सदुपयोग क्यों नहीं होता और कैसे हो?॥ २६॥
कथं न भिद्येत न च स्रवेत
न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम्।
अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्येद्
ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके॥ २७॥
'यदि प्राप्त हुए धनका यथावत् वितरण न किया जायगा तो वह कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी भाँति चूकर व्यर्थ नष्ट क्यों न होगा? यह सोचकर उसकी रक्षा करना ही कर्तव्य है। यदि यथायोग्य विभाजनके द्वारा धनकी रक्षा न की जायगी तो वह सैकड़ों प्रकारसे बिखर जायगा। जगत्में किये हुए कर्म-फलका नाश नहीं होता—यह निश्चित है। (इससे यही सिद्ध होता है कि उसका यथायोग्य वितरण कर देना ही उचित है)'॥ २७॥
गतो ह्यरण्यादपि शक्रलोकं
धनंजयः पश्यत वीर्यमस्य।
अस्त्राणि दिव्यानि चतुर्विधानि
ज्ञात्वा पुनर्लोकमिमं प्रपन्नः॥ २८॥
'देखो, अर्जुनमें कितनी शक्ति है! वे वनसे भी इन्द्रलोकको चले गये और वहाँसे चारों प्रकारके दिव्यास्त्र सीखकर पुनः इस लोकमें लौट आये॥ २८॥
स्वर्गं हि गत्वा सशरीर एव