महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं सहसा विन्ध्यः प्रवृद्धः क्रोधमूर्च्छितः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामुने ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महामुने! विन्ध्यपर्वत किसलिये क्रोधसे मूर्छित हो सहसा बढ़ने लगा था? मैं इस प्रसंगको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
लोमश उवाच
अद्रिराजं महाशैलं मेरुं कनकपर्वतम् ।
उदयास्तमने भानुः प्रदक्षिणमवर्तत ॥ २ ॥
**लोमशजीने कहा—**राजन्! सूर्यदेव सुवर्णमय महान् पर्वत गिरिराज मेरुकी उदय और अस्तके समय परिक्रमा किया करते हैं ॥ २ ॥
तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्यः शैलः सूर्यमथाब्रवीत् ।
यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते ॥ ३ ॥
प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर ।
एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलेन्द्रं प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥
नाहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् ।
एष मार्गः प्रदिष्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत् ॥ ५ ॥
उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरिने उनसे कहा—'भास्कर! जैसे आप मेरुकी प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, उसी तरह मेरी भी कीजिये।' यह सुनकर भगवान् सूर्यने गिरिराज विन्ध्यसे कहा—'गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छासे मेरुगिरिकी परिक्रमा नहीं करता हूँ। जिन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है, उन विधाताने मेरे लिये यही मार्ग निश्चित किया है' ॥ ३—५ ॥
एवमुक्तस्ततः क्रोधात् प्रवृद्धः सहसाचलः ।
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं रोद्धुमिच्छन् परंतप ॥ ६ ॥
परंतप युधिष्ठिर! सूर्यदेवके ऐसा कहनेपर विन्ध्य-पर्वत सहसा कुपित हो सूर्य और चन्द्रमाका मार्ग रोक लेनेकी इच्छासे बढ़ने लगा ॥ ६ ॥
ततो देवाः सहिताः सर्व एव
विन्ध्यं समागम्य महाद्रिराजम् ।
निवारयामासुरुपायतस्तं
न च स्म तेषां वचनं चकार ॥ ७ ॥
यह देख सब देवता एक साथ मिलकर महान् पर्वतराज विन्ध्यके पास गये और अनेक उपायोंद्वारा उसके क्रोधका निवारण करने लगे; परंतु उसने उनकी बात नहीं मानी ॥ ७ ॥
अथाभिजग्मुर्मुनिमाश्रमस्थं
तपस्विनं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
अगस्त्यमत्यद्भुतवीर्यवन्तं
तं चार्थमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥ ८ ॥
तब वे सब देवता मिलकर अपने आश्रमपर विराजमान धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तपस्वी अगस्त्य मुनिके पास गये, जो अद्भुत प्रभावशाली थे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना प्रयोजन कह सुनाया ॥ ८ ॥
देवा ऊचुः
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं नक्षत्राणां गतिं तथा ।
शैलराजो वृणोत्येष विन्ध्यः क्रोधवशानुगः ॥ ९ ॥
तं निवारयितुं शक्तो नान्यः कश्चिद् द्विजोत्तम ।
ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय ॥ १० ॥
**देवता बोले—**द्विजश्रेष्ठ! यह पर्वतराज विन्ध्य क्रोधके वशीभूत होकर सूर्य और चन्द्रमाके मार्ग तथा नक्षत्रोंकी गतिको रोक रहा है। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इसका निवारण नहीं कर सकता। अतः आप चलकर इसे रोकिये ॥ ९-१० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् ।
सोऽभिगम्याब्रवीद् विन्ध्यं सदारः समुपस्थितः ॥ ११ ॥
देवताओंकी यह बात सुनकर विप्रवर अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये और वहाँ उपस्थित हो उससे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥
मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम ।
दक्षिणामभिगन्तास्मि दिशं कार्येण केनचित् ॥ १२ ॥
‘पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्यसे दक्षिण दिशाको जा रहा हूँ, मेरी इच्छा है, तुम मुझे मार्ग प्रदान करो ॥ १२ ॥
यावदागमनं मह्यं तावत् त्वं प्रतिपालय ।
निवृत्ते मयि शैलेन्द्र ततो वर्धस्व कामतः ॥ १३ ॥
‘जबतक मैं पुनः लौटकर न आऊँ तबतक मेरी प्रतीक्षा करते रहो। शैलराज! मेरे लौट आनेपर तुम पुनः इच्छानुसार बढ़ते रहना’ ॥ १३ ॥
एवं स समयं कृत्वा विन्ध्येनामित्रकर्शन ।
अद्यापि दक्षिणाद्देशाद् वारुणिर्न निवर्तते ॥ १४ ॥
शत्रुसूदन! विन्ध्यके साथ ऐसा नियम करके मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यजी चले गये और आजतक दक्षिण प्रदेशसे नहीं लौटे ॥ १४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा विन्ध्यो न वर्धते ।
अगस्त्यस्य प्रभावेण यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १५ ॥
राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने कह दिया। महर्षि अगस्त्यके ही प्रभावसे विन्ध्यपर्वत बढ़ नहीं रहा है ॥ १५ ॥
कालेयास्तु यथा राजन् सुरैः सर्वैर्निषूदिताः ।
अगस्त्याद् वरमासाद्य तन्मे निगदतः शृणु ॥ १६ ॥
राजन्! सब देवताओंने अगस्त्यसे वर पाकर जिस प्रकार कालेय नामक दैत्योंका संहार किया, वह बता रहा हूँ, सुनो— ॥ १६ ॥
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत् ।
किमर्थमभियाताः स्थ वरं मत्तः कमिच्छथ ।
एवमुक्तास्ततस्तेन देवता मुनिमब्रुवन् ॥ १७ ॥
(सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा पुरन्दरपुरोगमाः ।)
देवताओंकी बात सुनकर मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यने पूछा—'देवताओ! आपलोग किसलिये यहाँ पधारे हैं और मुझसे कौन-सा वर चाहते हैं?' उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रको आगे करके सब देवताओंने हाथ जोड़कर मुनिसे कहा— ॥ १७ ॥
एवं त्वयेच्छाम कृतं हि कार्यं
महार्णवं पीयमानं महात्मन् ।
ततो वधिष्याम सहानुबन्धान्
कालेयसंज्ञान् सुरविद्विषस्तान् ॥ १८ ॥
'महात्मन्! हम आपके द्वारा यह कार्य सम्पन्न कराना चाहते हैं कि आप सारे महासागरके जलको पी जायँ। तदनन्तर हमलोग देवद्रोही कालेय नामक दानवोंका उनके बन्धु-बान्धवोंसहित वध कर डालेंगे' ॥ १८ ॥
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरब्रवीत् ।
करिष्ये भवतां कामं लोकानां च महत् सुखम् ॥ १९ ॥
देवताओंका यह कथन सुनकर महर्षि अगस्त्यने कहा—'बहुत अच्छा' मैं आपलोगोंका मनोरथ पूर्ण करूँगा। इससे सम्पूर्ण लोकोंको महान् सुख प्राप्त होगा ॥ १९ ॥
एवमुक्त्वा ततोऽगच्छत् समुद्रं सरितां पतिम् ।
ऋषिभिश्च तपःसिद्धैः सार्धं देवैश्च सुव्रत ॥ २० ॥
सुव्रत! ऐसा कहकर अगस्त्यजी देवताओं तथा तपःसिद्ध ऋषियोंके साथ नदीपति समुद्रके तटपर गये ॥
मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिंपुरुषास्तथा ।
अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ २१ ॥
उस समय मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर सभी उस अद्भुत दृश्यको देखनेके लिये उन महात्माके पीछे चल दिये ॥ २१ ॥
ततोऽभ्यगच्छन् सहिताः समुद्रं भीमनिःस्वनम् ।
नृत्यन्तमिव चोर्मीभिर्वल्गन्तमिव वायुना ॥ २२ ॥
फिर वे सब लोग एक साथ भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रके समीप गये, जो अपने उत्ताल तरंगोंद्वारा मानो नृत्य कर रहा था; और वायुके द्वारा उछलता-कूदता-सा जान पड़ता था ॥ २२ ॥
हसन्तमिव फेनौघैः स्खलन्तं कन्दरेषु च ।
नानाग्राहसमाकीर्णं नानाद्विजगणान्वितम् ॥ २३ ॥
वह फेनोंके समुदायद्वारा मानो अपनी हास्यछटा बिखेर रहा था; और कन्दराओंसे टकराता-सा जान पड़ता था। उसमें नाना प्रकारके ग्राह आदि जलजन्तु भरे हुए थे, तथा बहुत-से पक्षी निवास करते थे ॥ २३ ॥
अगस्त्यसहिता देवाः सगन्धर्वमहोरगाः ।
ऋषयश्च महाभागाः समासेदुर्महोदधिम् ॥ २४ ॥
अगस्त्यजीके साथ देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग और महाभाग ऋषिगण सभी महासागरके तटपर जा पहुँचे ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योदधिगमने चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यका समुद्रतटपर गमनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)