महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 738, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम ।
दक्षिणामभिगन्तास्मि दिशं कार्येण केनचित् ॥ १२ ॥
‘पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्यसे दक्षिण दिशाको जा रहा हूँ, मेरी इच्छा है, तुम मुझे मार्ग प्रदान करो ॥ १२ ॥
यावदागमनं मह्यं तावत् त्वं प्रतिपालय ।
निवृत्ते मयि शैलेन्द्र ततो वर्धस्व कामतः ॥ १३ ॥
‘जबतक मैं पुनः लौटकर न आऊँ तबतक मेरी प्रतीक्षा करते रहो। शैलराज! मेरे लौट आनेपर तुम पुनः इच्छानुसार बढ़ते रहना’ ॥ १३ ॥
एवं स समयं कृत्वा विन्ध्येनामित्रकर्शन ।
अद्यापि दक्षिणाद्देशाद् वारुणिर्न निवर्तते ॥ १४ ॥
शत्रुसूदन! विन्ध्यके साथ ऐसा नियम करके मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यजी चले गये और आजतक दक्षिण प्रदेशसे नहीं लौटे ॥ १४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा विन्ध्यो न वर्धते ।
अगस्त्यस्य प्रभावेण यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १५ ॥
राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने कह दिया। महर्षि अगस्त्यके ही प्रभावसे विन्ध्यपर्वत बढ़ नहीं रहा है ॥ १५ ॥