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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

७५६ कथासरित्सागर

७५६ कथासरित्सागर
मनोरथप्रभे मैवं कृथा भूयो भविष्यति ।
एतेन मुनिपुत्रेण तव कालेन सङ्गम ॥११३॥
एतच्छ्रुत्वा परावृत्य मरणात्सप्रतीक्षिणी ।
स्थितास्मीहैव बद्धाशा शङ्करार्चनतत्परा ॥११४॥
मुनिपुत्रसुहृत्सोऽपि गतो मे क्वाप्यदर्शनम् ।
इति तां वादिनीं विद्याधरीं सोमप्रभोऽभ्यधात् ॥११५॥
स्थितास्येकाकिनी तर्हि क्व सापि सखी क्व ते ।
एतच्छ्रुत्वा तमाह स्म सा विद्याधरकन्यका ॥११६॥
सिंहविक्रम इत्यस्ति नाम्ना विद्याधरेश्वरः ।
तस्यानन्यसमा चास्ति तनया मकरन्दिका ॥११७॥
सा मे सखी प्राणसमा तया सह सुस्थिता ।
तया सखी प्रेषितामद्वार्तां ज्ञातुमिहाद्य मे ॥११८॥
ततो मयापि तत्सख्या समं सा प्रहिता निजा ।
सखी तदन्तिकं तेन स्थितास्म्येकैव सम्प्रति ॥११९॥
एवं वदन्ती गगनादवतीर्णां तदैव ताम् ।
स्वसखीं दर्शयामास तस्मै सोमप्रभाय सा ॥१२०॥
तामथोक्तसखीवार्त्तां पर्णशय्यामकारयत् ।
सोमप्रभस्य तद्बाह्वोरपि वासमदापयत् ॥१२१॥
ततो नीत्वा निशां सर्वे तत्र ते प्रातरुत्थिता ।
व्योम्नोऽवतीर्णं ददृशुर्विद्याधरमुपागतम् ॥१२२॥
स च विद्याधरो देवजयो नाम कृतानतिः ।
मनोरथप्रभामेवमुपविश्य जगाद ताम् ॥१२३॥
मनोरथप्रभे राजा वक्ति त्वां सिंहविक्रमः ।
यावत्तव न निष्पन्नो वरस्तावन्न मत्सुता ॥१२४॥
विवाहमिच्छति स्नेहात्त्वत्सखी मकरन्दिका ।
तदेतां बोधयागत्य येनोद्वाहे प्रवर्त्तते ॥१२५॥
एतच्छ्रुत्वा सखीस्नेहात् विद्याधरकन्यकाम् ।
गन्तुं प्रवृत्तां वक्ति स्म राजा सोमप्रभोऽथ सः ॥१२६॥
द्रष्टुं विद्याधरं लोकमनघे कौतुकं मम ।
तत्तत्र नय मामद्यो त्सवोऽसावथ तिष्ठतु ॥१२७॥

'हे मनोरथप्रभे ऐसा न करो। इस मुनिकुमार के साथ तेरा यथासमय पुनः संगम
होगा' ॥११३॥
यह सुनकर, मरने से लौटकर और उसकी प्रतीक्षा में आशा बाँधकर शिवजी की आराधना
करती हुई बैठी हूँ ॥११४॥
मुनिकुमार का वह मित्र भी न जाने कहाँ अदृश्य हो गया। इस प्रकार कहती हुई विद्याधरी
से सोमप्रभ ने कहा— 'तो तू अकेली क्यों है? तेरी वह सखी कहाँ है? इस प्रकार कहते हुए सोमप्रभ से
वह विद्याधरी मनोरथप्रभा बोली—॥११५-११६॥
सिंहविक्रम नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी असाधारण सुन्दरी मकरन्दिका
नाम की कन्या है ॥११७॥
वह मेरी प्राणों के समान प्यारी और मेरे दुःख से दुःखिता उस कुमारी मकरन्दिका ने
मेरा समाचार जानने के लिए आज एक सहेली को भेजा था। मैंने उसकी सखी के साथ अपनी सखी
को भी भेज दिया है। इसलिए, इसी समय मैं यहाँ अकेली हूँ ॥११८-११९॥
इस प्रकार कहती हुई मनोरथप्रभा ने उसी समय आकाश से उतरी हुई अपनी सहेली को
सोमप्रभा के लिए दिखाकर उसका परिचय कराया ॥१२०॥
और, मकरन्दिका का वृत्तान्त सुनानेवाली उस सखी द्वारा सोमप्रभ के लिए पत्तों का
बिछावन बनवाया और उसके घोड़े को घास खिलवाई ॥१२१॥
तब वही सरोवर के तट पर रात्रि व्यतीत कर, प्रातःकाल वे सब उठे और उन लोगों ने
आकाश से उतरे हुए एक विद्याधर को देखा ॥१२२॥
वह देवजय नाम का विद्याधर, प्रणाम करके और पास में बैठकर मनोरथप्रभा से इस
प्रकार बोला—॥१२३॥
'हे मनोरथप्रभे तुमसे राजा सिंहविक्रम यह कहता है कि जबतक तुम्हारे पति का निश्चय
नहीं होता तबतक मेरी कन्या मकरन्दिका भी विवाह नहीं करना चाहती। इसलिए, जाकर इसे
समझ ओ कि यह विवाह के लिए तैयार हो ॥१२४ १२५॥
यह सुनकर मनोरथप्रभा सखी के स्नेह के कारण जब उसके पास जाने को उद्यत हुई, तब
सोमप्रभ ने उससे कहा—॥१२६॥
'हे पवित्र चरित्रवाली मुझे भी विद्याधरों का लोक देखने का कुतूहल है। इसलिए, मुझे
भी ले चलो। घास दिया हुआ घोड़ा यहीं रहे ॥१२७॥


१ यही बाणभट्ट की कादम्बरी है।-अनु