कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
५४४ कथासरित्सागर ९
५४४ कथासरित्सागर ९
यस्मै तुष्यति राजायं दारिद्र्यं तस्य कृन्तति।
सोऽथ कार्पटिकस्त्वेवं समाहूयैवमादरात् ॥३४॥
मातुलुङ्गमिदं दत्तं तुष्टेनानेन भूभृता।
कल्पवृक्षोऽप्यभव्यानां प्रायो याति पलाशताम् ॥३५॥
इति सर्वेऽपि तद्दृष्ट्वा तत्रास्थाने विषादिनः।
अज्ञातपरमार्थत्वात्स्वैरमूचुः परस्परम् ॥३६॥
स तु कार्पटिको मातुलुङ्गमादाय निर्ययौ।
आययौ चाग्रतस्तस्य भिक्षुरेको विपीदतः ॥३७॥
स राजवन्दिनामा तद्दृष्ट्वा शाटकमग्रहीत्।
तस्मात्कार्पटिकान् मातुलुङ्गं दृष्ट्वा मनोरमम् ॥३८॥
प्रविश्य च स भिक्षुस्तद्राज्ञः फलमढौकयत्।
राजा च तत्परीक्षाय श्रमणं पृच्छति स्म तम् ॥३९॥
मातुलुङ्गं कुत इदं भदन्त भवतामिति।
सतं कार्पटिकं सोऽस्म वदातारं शशंस चम् ॥४०॥
अथ राजा विषण्णश्च विस्मितश्च बभूव सः।
अहो अद्यापि न क्षीणं पापं तस्येति चिन्तयन् ॥४१॥
स्वीकृत्य मातुलुङ्गं तदुत्थायास्थानतः क्षणात्।
चकार दिनकर्त्तव्यं *रक्तदत्तं स भूपतिः ॥४२॥
सोऽपि कार्पटिको गत्वा सिंहद्वारे यथास्थितः।
कृतभोजनपानादिरासीद्विक्रीतशाटकः ॥४३॥
द्वितीयेऽह्नि स राजा च सर्वास्थानं तथैव तत्।
विदधे तत्र सर्वे च सपोराः प्राविशन् पुनः ॥४४॥
दृष्ट्वा कार्पटिकं स च प्रविष्टं सोऽथ भूमिभृत्।
तथैवाहूय पुनरप्युपावेशयदन्तिके ॥४५॥
पाठयित्वा च भूयोऽपि तामेवार्याँ प्रसादतः।
गूढरत्नं ददौ तस्मै मातुलुङ्गं तदेव सः ॥४६॥
अहो द्वितीये दिवसे तुष्टोऽस्यायं वृथा प्रभुः।
किं तावदेतदित्यत्र सर्वे दध्युः सविस्मयाः ॥४७॥
यह राजा जिस पर प्रसन्न होता है, उसके जीवन-भर की दरिद्रता दूर कर देता है।
किन्तु यह कार्पटिक शोचनीय (अभागा) है, जिसे इस प्रकार आदर से बुलाकर भी इस प्रसन्न
राजा ने यह बिजौरा नींबू दिया। सच है, कि अभागों के लिए कल्पवृक्ष भी पलाश का वृक्ष बन
जाता है' ॥३४-३५॥
इस प्रकार, वास्तविक बात को न जानते हुए वहाँ बैठे हुए सभी लोग विषाद के साथ आपस
में ऐसी बातें करने लगे ॥३६॥
वह कार्पटिक नींबू को लेकर जैसे ही बाहर निकला वैसे ही विषाद करते हुए उसके
सामने एक याचक आया ॥३७॥
उसका नाम राजवल्लिक था। उसने कार्पटिक को एक साड़ी देकर बदले में वह नींबू
उससे ले लिया ॥३८॥
और उस याचक ने सभा में जाकर राजा को वह बिजौरा नींबू भेंट कर दिया। तब
राजा ने उसे पहचानकर विस्मय से पूछा—॥३९॥
'भद्र! यह नींबू तुम्हें कहाँ मिला ?' तब उसने उस कार्पटिक को उसका देने वाला
बताया ॥४०॥
तब राजा खिन्न और चकित होकर सोचने लगा कि इस कार्पटिक का पाप अभी समाप्त
नहीं हुआ है ॥४१॥
तब राजा ने उस नींबू की भेंट स्वीकार की और वह उठकर अपने दैनिक कार्यों में लग
गया ॥४२॥
याचक की दी हुई साड़ी को बेचकर अपने भोजन आदि का प्रबन्ध करके वह कार्पटिक
रूक्ष्मदत्त फिर राजा के सिंहद्वार पर सदा की भाँति आकर खड़ा हो गया ॥४३॥
दूसरे दिन राजा ने फिर उसी प्रकार सार्वजनिक सभा की और उसमें पहले के समान
नागरिक, दरबारी और मन्त्री एकत्र हुए ॥४४॥
उसी प्रकार उस सभा में आये हुए कार्पटिक को देखकर और पास बुलाकर उसने बैठाया
और उसी आर्या को पुनः पड़वाकर प्रसन्नतापूर्वक दूसरा नींबू उसे प्रदान किया ॥४५-४६॥
आज दूसरे दिन भी राजा इस प्रकार व्यर्थ ही प्रसन्न हुआ, यह क्या बात है, इस प्रकार
सभी उपस्थित व्यक्ति आपस में आश्चर्य के साथ कहने लगे ॥४७॥
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