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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

३३८ कथासरित्सागर

३३८ कथासरित्सागर
शंखाः पश्यन्ते तावन्मात्र कुर्वन्ति सुस्थिताः ।
यावत् पश्यन्ति नायान्तं मेघमाच्छादिताम्बरम् ॥१६९॥
इत्युक्त्वोत्थाय सावक निर्गत्याहमिहागतः ।
एवम् प्रहस्ताच्छ्रुत्वा तैस्तुष्टिः प्रापि मयादिभिः ॥१७०॥
निश्चित्य चाह्वोद्योगं सर्वे सेनापति व्यधुः ।
प्रभासमथ ते सूर्यप्रभाद्या रणदुर्मदम् ॥१७१॥
सर्वे च रणदीक्षायां ते सुवासकुमारातः ।
निदेशं प्राप्य तवह प्राविशन्नियतव्रताः ॥१७२॥
रात्री सूर्यप्रभश्चात्र शतंरम्यागृहान्तरम् ।
प्रविष्टामीक्षतापूर्वमिन्द्रो वरकन्यकाम् ॥१७३॥
सा तस्य व्याजसुप्तस्य प्रसुप्तसखिस्य च।
स्वैरं निकटमागत्य सखीमाह सहस्मिताम् ॥१७४॥
यदि सुप्तस्य विश्रान्तविलासा'पीयमीदृशी ।
रूपशोभास्य तत् कीदृक् प्रबुद्धस्य भवेत् सखि ॥१७५॥
तवस्तु न प्रबोध्योऽसौ पूरितं कौतुकं दृशोः ।
अधिकं हि निमज्जेत किमत्र हृदयेन मे ॥१७६॥
भविष्यत्यस्य संग्रामः समं हि श्रुतशर्मणा ।
तत्तत्र को विजानाति भाविता किल कस्य किम् ॥१७७॥
प्राप्तव्ययाय शूराणां जायते हि रणोत्सवः ।
तत्रास्यास्तु शिवं तावत् ततो ज्ञास्यामहे पुनः ॥१७८॥
कामचूडामणियेन किं च व्योमविहारिणा ।
दृष्टा तस्यास्य हृदयं मादृशी का नु रञ्जयेत् ॥१७९॥
एव तयोक्ते साचावीत् तद् सखी किं ब्रवीष्यतः ।
असङ्गो हृदयस्यास्मिन्नायत्तश्चण्डि किं तव ॥१८०॥
येन दृष्टेन हृदयं कामचूडामणेह तम् ।
सोऽप्यस्या न हरेत् कस्या यदि साक्षादरुन्धती ॥१८१॥
विद्याबलाच्च कल्याणं वेत्सि किमास्य सङ्गरे ।
एतस्य भार्यादृषोक्ताः स्वं सिद्धं सम्भ्रमातिनः ॥१८२॥
१ विश्रान्तः व्यपगतः, विलासो यस्याः, रूपशोभाया विशेषचन् ।

'हंस पद्मवन में तभी तक निश्चिन्तता से बोलते हैं, जबतक आकाश को ढकनेवाले
मेघ उन्हें नहीं दीखते ॥१६९॥
वज्रप्रभ के साथ ऐसा कहकर और उठकर मैं चला आया। प्रहस्त द्वारा यह समाचार
सुनकर मय आदि ने सन्तोष प्रकट किया ॥१७०॥
तदनन्तर, युद्ध की तैयारी का निश्चय करके सूर्यप्रभ आदि ने युद्ध में पूर्वम प्रभास को
सेनापति बनाया ॥१७१॥
अन्य सभी सुवासकुमार से आज्ञा लेकर उस दिन नियम के साथ (विधि-पूर्वक) रण-दीक्षा
में दीक्षित हुए ॥१७२॥
नियमानुसार रात्रि में शयन-गृह में जाकर सूर्यप्रभ ने निद्रा-रहित रहकर एक सुन्दरी
कन्या को वहाँ देखा ॥१७३॥
वह कन्या जान-बूझकर सोये हुए मन्त्रियोंवाले सूर्यप्रभ के पास आकर साथ खड़ी हुई
सखी से कहने लगी—॥१७४॥
'हे सखि यदि सोये हुए अतएव विकास-रहित (निश्चेष्ट) इसकी रूपशोभा ऐसी है, तो
जगी हुई दशा की शोभा कैसी होगी ॥१७५॥
अब रहने दो इसे मत जगाओ आँखों का कौतूहल पूरा हो गया। इसके साथ अधिक
दृग्मयता से हृदय को बाँधने से क्या काम है ? ॥१७६॥
श्रुतिधर्मा के साथ होनेवाले युद्ध में कौन जानता है कि किसका क्या होगा ? ॥१७७॥
युद्धोत्सव शूरों के प्राण विनाश के लिए होता है। इसका (सूर्यप्रभ का) भी जाने क्या
होगा। इसका कल्याण हो ॥१७८॥
जिस इस आकाशचारी ने कामचूड़ामणि को देखा है, वहाँ मुझ जैसी इसका क्या हृदय-
रंजन कर सकती है ? ॥१७९॥
उसके ऐसा कहने पर उसकी सखी ने कहा—'सखि ऐसा क्या कह रही हो क्या
तुम्हारा हृदय उसके प्रति आसक्त नहीं हुआ ? ॥१८०॥
जिसने देखते ही कामचूड़ामणि का हृदय हरण कर लिया वह किसका हृदय हरण नहीं
कर सकता। भले ही वह सरस्वती क्यों न हो। क्या तू अपनी विद्या के प्रभाव से युद्ध में
होनेवाले इसके कल्याण को नहीं जानती ? सिद्धों ने तुम सभी को इसी चक्रवर्ती की भार्या
बनाया है ॥१८१ १८२॥