कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
दशम लम्बक ४७१
दशम लम्बक ४७१
दमनक और करटक का संवाद
केवल पेट भरना कौन नहीं जानता ? दमनक के ऐसा कहने पर सरलहृदय करटक
बोला- ॥३४॥
'अपनी इच्छा से राजा की अंतरंग बातों में अधिक घुसना सेवक का धर्म नहीं है।
करटक के इस प्रकार कहने पर दमनक बोला-'ऐसा नहीं ! सभी अपने योग्य फल पाना
चाहते हैं। कुत्ता हड्डी का एक टुकड़ा पाकर सन्तुष्ट हो जाता है किन्तु सिंह हाथी पर
दौड़ता है ॥३५ ३६॥
यह सुनकर करटक बोला- ऐसा जानकर स्वामी उल्टे ही कोप करने लगे तो उसका
विशेष फल कैसे मिल सकता है ॥३७॥
क्योंकि स्वामी जन पर्वतों के समान अत्यन्त कठिन हिंसक प्राणियों से घिरे होने के कारण
कठिनाई से वश में आते हैं ॥३८॥
तब दमनक ने कहा- 'यह सच है किन्तु जो समझदार है, वह मालिक के स्वभाव के अनुसार
चलकर उसे धीरे-धीरे वश में कर लेते हैं ॥३९॥
'तब ऐसा ही करो' इस प्रकार करटक ने उससे कहा। तदनन्तर दमनक अपने राजा सिंह
के पास गया ॥४०॥
प्रणाम करके पास में बैठे हुए दमनक ने अपने स्वामी पिंगलक सिंह द्वारा 'आओ बैठो'
कहकर स्वागत किये जाने पर, इस प्रकार निवेदन किया-॥४१॥
'स्वामी मैं आपका कुल-परम्परागत सेवक हूँ। दूसरा व्यक्ति भी यदि आपका हितैषी हो
तो उसे स्वीकार करना चाहिए। और, आपका आत्मीय व्यक्ति भी यदि अ-हितचिन्तक हो तो
उसे छोड़ देना चाहिए ॥४२॥
अपना हित चाहनेवाले बिलाव को भी मूल्य देकर घर में लाकर रखा जाता है और हानि
पहुँचानेवाले चूहे को अपने घर में ही उत्पन्न होने पर भी मार दिया जाता है ॥४३॥
अपना कल्याण चाहनेवाले राजा को अपने हितैषी सेवकों की बात सुननी चाहिए।
और सेवकों को भी चाहिए कि वे बिना पूछे भी अपने स्वामी का हित चिन्तन करें और उसे
हित बात कहे ॥४४॥
इसलिए स्वामिन् यदि आप विश्वास करते हैं साथ ही कोप न करें और छिपावें नहीं
तो मैं कुछ पूछना चाहता हूँ ॥४५॥
दमनक के इस प्रकार पूछने पर पिंगलक सिंह उससे बोला- 'तुम विश्वास करने योग्य
और हमारे भक्त सेवक हो इसलिए जो भी कहना हो निश्शंक होकर कहो' ॥४६॥
पिंगलक के इस प्रकार कहने के पश्चात् दमनक बोला- 'देव तुम प्यासे होकर पानी
पीने के लिए गये थे ॥४७॥
किन्तु, आप बिना पानी पिये ही कुछ उदास-से होकर क्यों लौट आये ? दमनक की यह
बात सुनकर पिंगलक सिंह सोचने लगा ॥४८॥
लक्षितोऽस्म्यमुना तत्किं मत्तस्त्यास्य निगूह्यत।
इत्यालोच्याब्रवीत् स शृणु गोप्यं न तदस्ति मे ॥४९॥
जलपार्श्वगतेनात्र नादोऽपूर्वः श्रुतो मया।
स चास्मदधिकस्योग्रो जाने सत्त्वस्य कस्यचित् ॥५०॥
भार्यं शब्दानुरूपेण प्रायेण प्राणिनां महत्।
प्रजापतिर्विचित्रो हि प्राणिसर्गोऽधिकाधिकः ॥५१॥
येन बहु प्रविष्टेन न शरीरं म मे वनम्।
तस्मादितो मयान्यत्र गन्तव्यं कानने क्वचित् ॥५२॥
इति वादिनमाह स्म सिंहं दमनकोऽथ तम्।
शूरः समित्यतां देव किं वनं त्यक्तुमिच्छसि ॥५३॥
जलेन भज्यते सेतुः स्नेहः कर्णेजपेन तु।
अरक्षणेन मन्त्रश्च शब्दमात्रेण कातरः ॥५४॥
यन्त्रादिहृच्छब्दास्ते ते हि भवन्त्येव भयङ्कराः।
परमार्थमविज्ञाय न भेतव्यमत प्रभो ॥५५॥
भेरीगोमायुकथा
तथा च भेरीगोमायुकथेयं श्रूयतां त्वया।
कोऽपि क्वापि वनोद्देशे गोमायुरनशत्पुरा ॥५६॥
स भक्ष्यार्थी भ्रमन्नुत्तुङ्गां प्राप्य भुवं ध्वनिम्।
गम्भीरमेकतः श्रुत्वा भीतो दृष्टिं ततो ददौ ॥५७॥
तत्रादृष्टचरां भेरीमपश्यत् पतितस्थिताम्।
किमीदृशोऽयं प्राणी स्यात् कोऽप्येवंरूपशब्दकृत् ॥५८॥
इति सञ्चिन्तयन् दृष्ट्वा निस्पन्दां तामुपाययौ।
यावत्पश्यति तावत्स नायं प्राणीत्यबुध्यत ॥५९॥
वातप्रेल्लच्छरस्तम्बहतचर्मपुटोद्भवम् ।
शब्दं निरूप्य तस्यां च स गोमायुर्जहौ भयम् ॥६०॥
स्यात्किञ्चिद्भक्ष्यमत्रान्तरित्युत्पाट्य स पुष्करम्।
प्रविश्य वीक्षते यावत् केवले दारुचर्मणी ॥६१॥
तन्मेव शब्दमात्रेण किं विभ्यति भवादृशाः।
मन्यसे यदि तत्तत्र तद्विज्ञातुं व्रजाम्यहम् ॥६२॥