कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक ४२१
अष्टम लम्बक ४२१
इस प्रकार पुण्डरीकाक्ष के अज्ञान से मूर्खबुद्धि महासेन ने विरक्ति प्राप्त की और गुणशर्मा ने
धैर्य धारण कर पूर्ण शक्रता और सर्वोत्कृष्ट राज्यलक्ष्मी प्राप्त की ॥२५१॥
अपने मन्त्री शास्त्रान्वित इस प्रकार की उदार कथा को सुनकर समर-रूपी महासागर को
पार करने की इच्छा से सूर्यप्रभ ने अधिक उत्साह प्राप्त किया और धीरे धीरे सो गया ॥२५२॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का
षष्ठ तरङ्ग समाप्त
सप्तम तरङ्ग
सूर्यप्रभ का वृतान्त अन्तिम युद्ध
रात बीतने पर प्रातःकाल मदिरा के साथ शय्या से उठकर सूर्यप्रभ अपनी दानव और
मानव-सेना को लेकर रणभूमि में गया ॥१॥
उधर विद्याधरों की सेनासहित श्रुतशर्मा भी युद्ध के मैदान में आकर डट गया और देवता
असुर आदि भी प्रतिज्ञा के समान आकाश में युद्ध का दृश्य देखने के लिए आ गये ॥२॥
उस दिन दोनों ओर की सेनाओं में अर्धचन्द्र व्यूह बनाये गये और उसके पश्चात् दोनों
सेनाओं में सङ्ग्राम आरम्भ हुआ ॥३॥
अस्त्रशस्त्रों के साथ दोनों ओर से दौड़ते हुए वीर आपस में एक दूसरे को काटते हुए और
रक्ताक्त हुए हाथी भी दोनों आपस में टकरा-टकराकर युद्ध करने लगे ॥४॥
बाणों की धूलि में छिपी लक्ष्मी और खून की प्याली भरकर चलती हुई तलवारें मानो
यम की प्रीक्षा के समान रणभूमि में लहलहा रही थीं ॥५॥
शस्त्रसञ्चालन से गिरे हुए हाथ-कङ्कालों पर गिरते हुए यक्ष-राक्षसों ...
के सिरों को काट रहे थे ॥६॥
युद्ध के अन्ध और विकराल वातावरण के समय वीरों के पैर कटकर गिरते ...
... रही थी ॥७॥
उस समय दोनों ओर के ...
... ॥८-९-१०-११-१२-१३...॥
१. एक प्रकार का सैन्यव्यूह। २. युद्ध का फैसला।
आसीत्सूर्यप्रभस्यात्र संग्रामः श्रुतशर्मणा।
दामोदरेण च समं प्रभासस्याहवोऽभवत् ॥१९॥
महोत्पातेन सार्कं च सिद्धार्थो युयुधे सदा।
प्रहस्तो ब्रह्मगुप्तेन सङ्क्रमेन च बीतभीः ॥२०॥
प्रज्ञाढ्यश्चन्द्रगुप्तेनाप्यक्रमेण प्रियङ्करः।
युयुधे सर्वदमनः सहैवातिबलेन च ॥२१॥
धुरन्धरेण युयुधे स कुञ्जरकुमारकः।
अन्ये महारथाश्चान्यैरयुध्यन्त पृथक्पृथक् ॥२२॥
तत्र पूर्वं महोत्पातः प्रतिहत्य शरैः शरान्।
सिद्धार्थस्य धनुश्छित्त्वा जघानाश्वांससारथीन् ॥२३॥
विरथः सोऽपि सिद्धार्थो धावित्वा तस्य तं रुषा।
अयोदण्डेन महता साश्वं रथमचूर्णयत् ॥२४॥
ततस्तं पादचारी स सिद्धार्थं पादचारिणम्।
बाहुयुद्धेन धरण्यां महोत्पातम्पातयत् ॥२५॥
यावच्चेच्छति निष्पेष्टुं स तं तावत्स खेचरः।
भगेन रक्षितः पित्रा प्रोत्थाय प्रययौ रणात् ॥२६॥
प्रहस्तब्रह्मगुप्तौ चाप्यन्योन्यं विरथीकृतौ।
करणैः खड्गयुद्धेन युध्यते स्म पृथग्विधैः ॥२७॥
प्रहस्तश्छासिनिर्मूनचर्माणं करणक्रमात्।
युक्त्या तं पातयामास ब्रह्मगुप्तं भुवस्तले ॥२८॥
पतितस्य शिरस्तस्य स यावच्छेत्तुमिच्छति।
तावन्निवारितो दूरात्पित्रास्य ब्रह्मणा स्वयम् ॥२९॥
सुता रक्षितुमायाता यूयं न प्रेक्षितुं रणम्।
इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे देवान्निजघ्नुस्तदा ॥३०॥
तावद्वीतभयश्छिन्नधन्वानं हतसारथिम्।
जघान हृदये विद्ध्वा प्रद्युम्नास्त्रेण संङ्क्रमम् ॥३१॥
प्रज्ञाढ्यश्चन्द्रगुप्तं च पदातिं रथवांस्तयात्।
पदातिं खड्गयुद्धेन न्यवधीत्कृतमस्तकम् ॥३२॥
ततः पुष्णवशत्रुश्च स्वममात्यं धनञ्जयम्।
प्रज्ञाढ्ये योजयामास युद्धं चासीत्तयो क्षमम् ॥३३॥