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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

अष्टम लम्बक २७९

अष्टम लम्बक २७९
यह सुनकर मय ने विभीषण से कहा—'हम जबरदस्ती वैर नही कर रहे हैं किन्तु इन्द्र
के निरर्थक हठ को सहन कैसे करें, तुम ही बताओ ॥१४८॥
देवताओं ने जिन असुरों को मारा है, वे प्रमादी थे। बलि प्रह्लाद आदि सावधान असुर
नहीं मारे गये' ॥१४९॥
मय द्वारा इस प्रकार कहा गया विभीषण सबसे मिलकर उसी समय मन्दोदरी को
साथ लेकर लंका को लौट गया ॥१५०॥
तदनन्तर, सुनीथ और सूर्यप्रभ को साथ लेकर राजा बलि को देखने के लिए वह
दानवराज तीसरे पाताल को गया ॥१५१॥
स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर उस लोक में उन्होंने हार और मुकुट धारण किये हुए तथा दैत्यों
और दानवों से घिरे हुए राजा बलि को देखा ॥१५२॥
वे सुनीथ आदि सभी राजा बलि के चरणों पर गिरे और उसने भी उन सब का समुचित
स्वागत-सम्मान किया ॥१५३॥
मय दानव द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर प्रसन्न हुए राजा बलि ने शीघ्र ही प्रह्लाद
तथा अन्य दूसरे दानवों को बुलवाया ॥१५४॥
सुनीथ आदि ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और वे सभी उन विप्रन्न भोगों
को देखकर आनन्द-विभोर हो गये ॥१५५॥
तब बलि ने कहा—'यह हमारा सुनीथ पृथ्वी पर चन्द्रप्रभ के रूप में जन्म लेकर अपने शरीर
में आकर पुनर्जीवित होगया ॥१५६॥
सुमुण्डीक का अवतार यह सूर्यप्रभ भी आया है। शिवजी ने इसे विद्याधरों का भावी
चक्रवर्ती बनाया है ॥१५७॥
उसके यज्ञ के प्रभाव से मेरे बन्धन ढीले हुए हैं। अतः इन दोनों के पुनः प्राप्त होने पर
हम लोगों का अभ्युदय ही होनेवाला है' ॥१५८॥
बलि के वचन सुनकर उनका गुरु शुक्र बोला—'धर्म का आचरण करो। सत्य-मार्ग पर
रहने से अवनति कदापि नही होती ॥१५९॥
अतः धर्म का व्यवहार करो यह मेरा वचन मानो। यह सुनकर सभी दानवों ने धर्म
पे चलने का नियम बना लिया ॥१६०॥
सातों पातालो के राजा वहाँ एकत्र हुए और सुनीथ की पुनःप्राप्ति की प्रसन्नता
में बलि ने महान् उत्सव मनाया १६१॥
इसी बीच फिर नारद मुनि वहाँ आ पहुँचे। पूजा सत्कार प्राप्तकर बैठने के बाद उन्होंने
दानवों से कहा—॥१६२॥

सम्भूत्वा च मयोत्क्षोभम बलात् कुर्महे वयम्।
हठात् कुर्वति शक्रे तु कथं ब्रूहि सहामहे ॥१४८॥
ते चासुरा हता देवैस्ते बभूवुः प्रमादिनः।
अप्रमत्तास्तु किं नैव बलिप्रभृतयो हताः ॥१४९॥
इत्याद्युक्तो मयेनाथ मन्दोदर्या सहैव सः।
राक्षसेश्वरमामन्त्र्य जगाम वसतिं निजाम् ॥१५०॥
सूर्यप्रभादिभिर्युक्तः सुनीथोऽथ मयेन सः।
निन्ये तृतीयं पातालं बलिं राजानमीक्षितुम् ॥१५१॥
स्वर्गादप्यधिके तत्र सर्वे ते ददृशुर्बलिम्।
आमुक्ताहारमुकुटं वृतं दितिजदानवैः ॥१५२॥
निपेतुः पादयोस्तस्य सुनीथाद्याः क्रमेण ते।
सोऽपि तान् मानयामास सत्कारेण यथोचितम् ॥१५३॥
मयावेदितवृत्तान्तहृष्टः सोऽथ बलिस्ततः।
प्रह्लादमानायितवांष्ठीघ्रमन्यांश्च दानवान् ॥१५४॥
तानप्यत्र सुनीथाद्याः पादयोस्ते ववन्दिरे।
तेऽप्याप्यभिननन्दुस्तान् प्रह्लादानन्दनिर्भराः ॥१५५॥
तत्राऽथ बलिराह स्म भूत्वा चन्द्रप्रभो भुवि।
सुनीथः स्वतनुप्राप्त्या प्रत्युज्जीवित एष यः ॥१५६॥
सुमुण्डीकावतारश्च प्राप्तः सूर्यप्रभोऽप्ययम्।
शर्वेण चायमादिष्टो भावी विद्याधरेश्वरः ॥१५७॥
एतच्चप्रभावाच्च जातोऽहं क्षतबन्धनः।
तदेताभ्यामवाप्ताभ्यां ध्रुवमभ्युदयोऽस्ति नः ॥१५८॥
एतद्वलिवचः श्रुत्वा शुक्रः प्रोवाच सद्गुरुः।
धर्मेण चरतां सत्ये नास्त्यनभ्युदयः क्वचित् ॥१५९॥
तस्माद् धर्मेण वर्तध्वं कुरुताद्यापि मद्वचः।
तच्छ्रुत्वा दानवास्तत्र तथेति नियमं व्यधुः ॥१६०॥
सप्त पातालपतयो ये तत्र मिलितास्तथा।
बलिद्वात्रोत्सवं चक्रुः सुनीथप्राप्तिहर्षतः ॥१६१॥
अत्रान्तरे च तत्रायात् पुनर्नारदो मुनिः।
गृहीतार्योपविष्टश्च दानवांस्तानुवाच सः ॥१६२॥

यह सुनकर मय ने विभीषण से कहा—'हम जबरदस्ती बैर नहीं कर रहे हैं किन्तु इन्द्र
के निरर्थक हठ को सहन कैसे करें, तुम ही बताओ ।।१४८।।
देवताओं ने जिन असुरों को मारा है वे प्रमादी थे। बलि प्रह्लाद आदि सावधान असुर
नहीं मारे गए ।।१४९।।
मय द्वारा इस प्रकार कहा गया विभीषण सबसे मिलकर उसी समय मन्दोदरी को
साथ लेकर लंका को लौट गया ।।१५०।।
तदनन्तर, सुनीथ और सूर्यप्रभ को साथ लेकर राजा बलि को देखने के लिए वह
दानवराज तीसरे पाताल को गया ।।१५१।।
स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर उस लोक में उन्होंने हार और मुकुट धारण किये हुए तथा दैत्यों
और दानवों से घिरे हुए राजा बलि को देखा ।।१५२।।
वे सुनीथ आदि सभी राजा बलि के चरणों पर गिरे और उसने भी उन सब का समुचित
स्वागत-सम्मान किया ।।१५३।।
मय दानव द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर प्रसन्न हुए राजा बलि ने शीघ्र ही प्रह्लाद
तथा अन्य दूसरे दानवों को बुलवाया ।।१५४।।
सुनीथ आदि ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और वे सभी उन विनम्र लोगों
को देखकर आनन्द-विभोर हो गये ।।१५५।।
तब बलि ने कहा—'यह हमारा सजीव पृथ्वी पर चन्द्रप्रभ के रूप में जन्म लेकर अपने शरीर
में आकर पुनर्जीवित होगया ।।१५६।।
सुपुण्डीक का अवतार यह सूर्यप्रभ भी आया है। शिवजी ने इसे विद्याधरों का भावी
चक्रवर्ती बनाया है ।।१५७।।
उसके यज्ञ के प्रभाव से मेरे बन्धन ढीले हुए हैं। अतः इन दोनों के पुनः प्राप्त होने पर
हम लोगों का अभ्युदय ही होनेवाला है' ।।१५८।।
बलि के वचन सुनकर उनका गुरु शुक्र बोला—'धर्म का आचरण करो। सद्-मार्ग पर
जाने से अवनति कदापि नहीं होती ।।१५९।।
अतः धर्म का व्यवहार करो यह मेरा वचन मानो। यह सुनकर सभी दानवों ने धर्म
के चलने का नियम बना लिया ।।१६०।।
सातो पातालों के राजा वहाँ एकत्र हुए और सुनीथ की पुन्र्जाति की प्रसन्नता
में तीन व महान् उत्सव मनाया १६१।।
इसी बीच फिर नारद मुनि वहाँ आ पहुँचे। पूजा सत्कार पाकर बैठने के बाद उन्होंने
दानवों से कहा—।।१६२।।