जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१९३. चुल्लपदुम जातक
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१९३. चुल्लपदुम जातक
"अयमेव सा अहमपि सो अनञ्जो...." यह शास्ता ने जेतवन में
विहार करते हुए, उद्विग्नचित्त भिक्षु के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा उम्मद्दन्ति जातक¹ में आयेगी। शास्ता ने पूछा-"भिक्षु ! क्या
तू सचमुच उद्विग्न-चित्त है ?"
"भगवान् ! सचमुच ।"
"तुझे किसने उद्विग्न किया है ?"
"भन्ते ! मै एक अलङ्कृत सजीधजी स्त्री को देख कर आसक्त होने
के कारण उद्विग्न हुआ हूँ।"
"भिक्षु ! स्त्री अकृतज्ञ होती है, मित्रद्रोही होती है, कठोर हृदया होती
हैं। पुराने पण्डित दाहिनी जांघ का लहू पिलाकर भी, जीवनदान देकर स्त्री का
चित्त न जीत सके।"
शास्ता ने यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही-
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। नामकरण के दिन उसका नाम पदुम-
कुमार रक्खा गया। उसके और छ भाई थे। यह सातो जने क्रम से बडे हो,
विवाह कर राजा के मित्रो की तरह रहने लगे।
¹ उम्मद्दन्ति जातक (५२७)
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एक दिन राजा ने राजागण में खड़े होकर उन्हें बड़े ठाट बाट से राजा
की सेवा में आते देख, सोचा—यह मुझे मारकर राज्य भी ले सकते हैं। इस
शङ्का से सदाद्विग्न हो उसने उन्हें बुलाकर कहा—तात ! तुम इस नगर में
नहीं रह सकते। दूसरी जगह जाओ। मेरे मरने पर आकर कुल-प्राप्त राज्य
ग्रहण करना।
ये पिता का कहना मान रोते पीटते घर गए। अपनी अपनी स्त्रियो को ले,
जहाँ कही जाकर जीवन बिताने के लिए नगर से निकले। रास्ते चलते हुए
वे एक कान्तार में पहुँचे। वहाँ खाना पीना न मिला। भूख न सह सकने के
कारण उन्होने सोचा, जीते रहेंगे तो स्त्रियां मिलेंगी। सबसे छोटे भाई की
स्त्री को मारकर उसके तेरह टुकड़े कर उसका मास खाया।
बोधिसत्त्व ने अपने और भार्या के लिए मिले दो हिस्सो में से एक रख
छोड़ा, एक को दोनो ने खाया। इस प्रकार छ दिनो में छ स्त्रियो का मास
खाया गया। बोधिसत्त्व ने एक एक करके छ दिनो में छ टुकड़े रख छोड़े।
सातवें दिन 'बोधिसत्त्व की भार्या को मारेंगे' कहने पर बोधिसत्त्व ने वे छ
टुकड़े उन्हें देकर कहा कि आज यह खाओ। कल देखेंगे।
जिस समय वह मास खाकर सो रहे थे, बोधिसत्त्व अपनी भार्या को लेकर
भाग निकले। उसने थोडी दूर चलकर कहा स्वामी ! चल नही सकती हूँ।
बोधिसत्त्व उसे कन्धे पर लेकर सूर्योदय के समय कान्तार से निकले। सूर्यो-
दय होने पर उसने कहा—स्वामी ! प्यास लगी है। बोधिसत्त्व ने कहा—
भद्रे ! पानी नही है। लेकिन बार बार माँगने पर बोधिसत्त्व ने अपनी दाहिनी
जाँघ में तलवार का प्रहार कर कहा—भद्रे ! पानी नही है। यह मेरी दाहिनी
जाँघ का लहू पी ले। उसने वैसा किया।
वे क्रम से महानदी पर आए। पानी पी, नहा कर फलमूल खाते हुए,
आराम करने की एक जगह पर विश्राम किया। फिर गङ्गा के मोड की जगह
पर आश्रम बनाकर रहने लगे।
गङ्गा के ऊपर के हिस्से में किसी राज्यापराधी चोर को हाथ पाँव तथा
नाक काट कर बोरे में बिठा गङ्गा में बहा दिया गया था। वह बहुत चिल्लाता
हुआ उस जगह आ लगा। बोधिसत्त्व ने उसकी करुणापूर्ण रोने पीटने की
आवाज सुन 'मेरे रहते कोई दुख प्राप्त प्राणी नष्ट न हो' सोच गङ्गा किनारे
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जा, उसे उठा आश्रम पर ला, काषाय से धो लेप कर उसके जखमो की चिकित्सा
की। उसकी भार्य्या घृणा से उस पर थूकती हुई फिरती थी—इस प्रकार
के लुञ्जे को गङ्गा से लाकर उसकी सेवा करते हैं ।।।
उसके जखम ठीक होने पर बोधिसत्त्व उसे और अपनी भार्य्या को आश्रम
पर छोड़, जगल से फलमूल लाकर उसका तथा भार्य्या का पालन करने लगे।
उनके इस प्रकार रहते हुए वह स्त्री उस लुञ्जे से आकृष्ट हो गई। उसने
उसके साथ अनाचार किया। फिर किसी उपाय से बोधिसत्त्व को मार डालना
चाहिए, सोच बोली—"स्वामी ! मैने, तुम्हारे कन्धे पर बैठे हुए जिस समय
कान्तार से निकल रही थी इस पर्वत को देख कर एक मिन्नत मानी थी—
हे पर्वतनिवासी देवता ! यदि मैं और मेरा स्वामी सकुशल जीते निकल जाएंगे
तो मैं तुम्हारी बलि चढाऊँगी। सो, वह देवता जिसकी मिन्नत मानी थी तग
करता है। उसकी बलि दे।"
बोधिसत्त्व उसकी माया नही जानते थे। उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार
किया, और बलिकर्म तैयार कर उससे बलि-पात्र उठवा पर्वत पर चढे।
उस स्त्री ने बोधिसत्व से कहा—"स्वामी ! देवता से भी बढकर तुम ही
उत्तम देवता हो। इसलिए पहले तुम्हें ही वन-पुष्पों से पूज, प्रदक्षिणा कर,
वन्दना कर पीछे देवता की बलि दूँगी।" उसने बोधिसत्त्व को प्रपात की ओर
कर वन-पुष्पों से पूजा की। फिर प्रदक्षिणा कर, प्रणाम करने वाली की तरह
हो, पीछे जा, पीठ में धक्का दे, प्रपात से गिरा दिया। 'शत्रु की पीठ देख ली'
सोच सन्तुष्ट हो, वह पर्वत से उतर लुञ्जे के पास गई। बोधिसत्त्व भी प्रपात
के किनारे से पर्वत से गिरते हुए, एक गूलर के वृक्ष पर पत्तो से ढके कष्टकररहित
गुच्छ में जा लग। पर्वत से नीचे उतरने में असमर्थ थे। वह गूलर खाकर
शाखाओ के बीच में बैठे रहे।
एक गोह, जिसका शरीर बडा था पर्वत के नीचे से उस गूलर के पेड़ पर
चढ फल खाता था। वह उस दिन बोधिसत्त्व को देखकर भाग गया। अगल
दिन आया और एक ओर से फल खाकर चला गया। इस प्रकार बार बार
आने से जब वह बोधिसत्त्व का विश्वासी हो गया तो उसने पूछा—"तं इस
जगह कैसे आया ?" "इस कारण से" बताने पर उसने कहा—"तो मत डर।"
उसने बोधिसत्त्व को अपनी पीठ पर लिटा, उतार कर जगल से निकल, महामार्ग
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पर ले जाकर कहा—"इस मार्ग से जा।" बोधिसत्त्व को उत्साहित कर
वह स्वयं जगल में चला गया।
बोधिसत्त्व एक गामडे में जाकर रहने लगे। वहाँ रहते हुए, पिता के
मरने का समाचार मिला। वह वाराणसी पहुँच, कुलागत राज्य पर अधिकार
कर, पदुमराजा नाम से, दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्म से राज्य करने लगे।
चारो नगर-द्वारो पर, नगर के बीच में तथा महल के द्वार पर छ दानशालाएँ
बनवा प्रति दिन छ हजार खर्च कर दान देते।
वह पापी स्त्री भी उस लुञ्जे को कन्धे पर बिठा जगल से निकल बस्तियो
मे भिक्षा मांग कर यागु-भात इकट्ठा कर उस लुञ्जे को पोसती थी। उससे
यदि कोई पूछता कि यह तेरा क्या लगता हैं, सो वह उत्तर देती—"मैं इसके
मामा की लडकी हूँ और यह मेरी बुआ का लडका है। मैं इसीको दी गई।
सो में अपने स्वामी को—जो इस तरह दण्डित भी किया गया है—उठाए लिए
फिर कर, भीख मांग कर पालती हूँ।" मनुष्यों ने समझा—यह पतिव्रता है।
उसके बाद और भी यवागु भात देने लगे। दूसरो ने कहा—"तू इस तरह
मत घूम। पदुमराज वाराणसी में राज्य करता है। सारे जम्बूद्वीप को उद्वेलित
कर दान देता है। वह तुझे देखकर प्रसन्न होगा। बहुत धन देगा।" उन्होने
उसे एक बेंत की टोकरी दी और कहा कि अपने स्वामी को इसमें बिठा कर
ले जा। वह अनाचारिणी उस लुञ्जे को बेंत की टोकरी में बिठा, टोकरी को
उठा, वाराणसी पहुँच वहाँ दानशालाओ में खाती हुई घूमने लगी।
बोधिसत्त्व अलङ्कृत हाथी के कन्धे पर बैठ, दानशाला जा, वहाँ आठ या
दस को अपने हाथ से दान देकर घर जाते। वह अनाचारिणी उस लुञ्जे को
टोकरी में बिठा, टोकरी उठा, राजा के रास्ते में खडी हुई। राजा ने देखकर
पूछा—"यह क्या है?"
'देव! एक पतिव्रता है।"
उसे बुलवा कर, पहचान कर, लुञ्जे को टोकरी से निकलवा कर पूछा—
"यह तेरा क्या लगता है?"
'देव! यह मेरी बुआ का लडका है। कुलवालो ने मुझे इसे सौंपा है।
यह मेरा स्वामी है।"
मनुष्य उनके बीच के भेद को न जानते थे। वे उस अनाचारिणी की
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प्रणाम करने लगे—ओह ! पतिदेवता !
राजा ने फिर उससे पूछा—"तुझे कुलवालो ने इसे सौंपा है ? यह तेरा
स्वामी है ?"
उसने राजा को न पहचानते हुए धीर बन कर कहा—"देव ! हाँ।"
तब राजा ने उसे पूछा—"क्या यह वाराणसी राजा का पुत्र है ? क्या
तू पदुमकुमार की भार्या अमुक राजा की अमुक नाम की लडकी नही है ?
मेरी जाँघ का लहू पीकर इस लुञ्जे के प्रति आसक्त हो मुझे प्रपात से गिरा
दिया। यह तू अब अपने सिर पर मृत्यु ले मुझे मरा समझ यहाँ आई है ? मैं
जीता हूँ।" इतना कह, अमात्यो को बुला राजा ने कहा—"अमात्यो ! क्या मैने
तुम लोगो के पूछने पर यह नहीं कहा था कि मेरे छ छोटे भाइयो ने छ स्त्रियो
को मार कर मास खाया। लेकिन मैने अपनी स्त्री को सकुशल गङ्गा किनारे
लाकर एक आश्रम में रहते हुए, एक दण्ड-प्राप्त लुञ्जे को (पानी से) निकाल
सेवा की। उस स्त्री ने उस आदमी के प्रति आसक्त हो मुझे पर्वत पर से गिरा
दिया। मै अपने मैत्रीचित्त के कारण नही मरा। जिसने मुझे पर्वत से गिराया
था, वह कोई और नहीं थी, यही दुराचारिणी थी। जो दण्ड-प्राप्त लुञ्जा था,
वह भी कोई दूसरा न था, यही था।"
यह कह यह गाथाएँ कही—
अयमेव सा अहमपि सो अनञ्ञो,
अयमेव सो हत्थच्छिन्नो अनञ्ञो;
यमाहु कोमारपती ममन्ति,
वज्झित्थियो नत्थि इत्थीसु सच्चं ॥
इमञ्च जम्म मुसलेन हन्त्वा,
लूदं छव परदारूपसेविं;
इमिस्सा च न पापपतिव्वताय,
जीवन्तिया छिन्दथ कण्णनासं ॥
[ यही वह है। मैं भी वही हूँ। यह हाथ कटा भी वही है। दूसरा नही
है जिसे 'यह मेरा कोमारपति' कहती है। स्त्रियाँ वध्य करने योग्य हैं। उनमें
सत्य नहीं होता ।
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इस नीच-लोभी, मृतसदृश, पराई स्त्री का सेवन करने वाले को मूसल से
मार डालो। और इस पापी पति-व्रता के जीते जी (इसके) कान नाक काट
डालो। ]
यमाहु कोमारपती ममं, जिसे यह मेरा कोमारपति, जिसे मैं कुल द्वारा
सौंपी गई, स्वामी कहती हूँ। अयमेव सो न अञ्ञो। यमाहु कुमारपति, यह
भी पाठ है। यही पुस्तको मे लिखा है। उसका भी यही अर्थ है। वचन-भेद
मात्र है। जो राजा ने कहा, वही यहाँ आ गया। वज्झित्थियो, स्त्रियाँ वध्य
होती है, वध करने के योग्य ही होती हैं। नत्थि इत्थीसु सच्चं, इनका स्वभाव
एक नही रहता। इमञ्च जम्मं, यह उन दोनो को दण्डाज्ञा देने के लिए कहा।
जम्मं नीच। मूसलेन हन्त्वा, मूसल से मारकर, पीटकर, हड्डियो को
तोडकर, चूर्ण विचूर्ण करके। लुद्दं कठोर। छवं निर्गुण होने से निर्जीव मृत-
सदृश। इमिस्सा च नं, इसमें नं निपातमात्र है। इसके पापपतिव्वताय
अनाचारिणी दुःशीला के जीवन्तियाव कण्णं नासं छिन्दथ।
बोधिसत्त्व ने क्रोध को न सम्भाल सकने के कारण उनको ऐसे दण्ड की
आज्ञा दे दी; लेकिन वैसा करवाया नही। क्रोध को कम करके उसने टोकरी
को उसके सिर पर ऐसे कसकर बँधवाया कि वह उतार न सके। फिर उस लुञ्जे
को उसमें फिंकवा उसे अपने राज्य से निकलवा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु
स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय छ भाई कोई स्थविर थे। भार्या चिञ्चामाणविका थी।
लुञ्जा देवदत्त था।, गोहराज आनन्द था। पदुमराज तो मैं ही था।