सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१२०. धम्मद्ध जातक

३६४ [ २७.२२०
१२०. धम्मद्ध जातक
“सुख जीवितरुप्पोसि,....” यह शास्ता ने वेणुवन में विहार करते
समय बध का प्रयत्न करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने ‘भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने मेरे बध के लिए प्रयत्न
किया है, पहले भी किया है, लेकिन त्रासमात्र भी पैदा नहीं कर सका’ कह
पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में बाराणसी में पायासिपाणी नामका राजा राज्य करता था।
काळक नाम का उसका सेनापति था। उस समय बोधिसत्त्व उसीके पुरोहित
थे। नाम था धम्मध्वज। राजा के सिर को अलङ्कृत करने वाले नाई का
नाम था छत्तपाणी।
राजा धर्म-पूर्वक राज्य करता था, लेकिन उसका सेनापति मुकद्दमा का
फैसला करता हुआ रिश्वत खाता था। चुगल-खोर रिश्वत लेकर स्वामी को
अस्वामी कर देता था।
एक दिन मुकद्दमे में हारे हुए आदमी ने बाहें पकड कर रोते हुए, अदालत
से निकल राज-सेवा में जात हुए बोधिसत्त्व को देखा। उसने उसके पाँव में
गिरकर कहा—‘स्वामी ! तुम्हारे सदृश राजा के अर्थधर्मानुशासक के होते हुए
काळक सेनापति रिश्वत लेकर अस्वामी को स्वामी बना देता है, और अपने
मुकद्दमे हारने की बात कही।

धम्मट्ठ ] ३६५
बोधिसत्त्व ने मन में करुणा का भाव ला कर कहा—अरे, आ तेरे मुकद्दमे
का फैसला करूँगा। यह उसे लेकर मुकद्दमे की जगह गए। जन-समूह इकट्ठा
हो गया। बोधिसत्त्व ने उस मुकद्दमे के फैसले को उलटते हुए फिर स्वामी
को ही स्वामी बना दिया। जन-समूह ने 'वाह वाह' की। बडा शोर हुआ।
राजा ने सुनकर पूछा—यह क्या आवाज है ?
'देव ! धर्मध्वज पण्डित ने एक ऐसे मुकद्दमे का जिसका ठीक फैसला
नहीं हुआ था, ठीक फैसला किया है। उसीमें यह 'वाह वाह' हो रही है।"
राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को बुलाकर पूछा—'आचार्य ! तुमने
मुकद्दमे का फैसला किया ?
'हाँ महाराज ! काळक ने जिस मुकद्दमे का ठीक फैसला नहीं किया,
उसका फैसला किया।"
"अब से तुम ही मुकद्दमे का फैसला किया करो। मेरे कानो को सुख
मिलेगा। जनता की उन्नति होगी।"
उसके इच्छा न करने पर भी राजा ने 'प्राणियो पर दया करने के लिए
न्याय की गद्दी पर बैठें' प्रार्थना कर राजी किया। तब से बोधिसत्त्व न्याय
की गद्दी पर बैठने लगे। स्वामी को ही स्वामी बनाते।
उसके बाद से जब काळक को रिशवत न मिलने के कारण लाभ की हानि
हुई तो उसने "महाराज ! धर्मध्वज पण्डित आपका राज्य चाहता है" कह
राजा और बोधिसत्त्व में भेद पैदा करने की कोशिश की।
राजा ने अविश्वास करते हुए मना किया—ऐसा मत कहो। वह बोला—
यदि मेरा विश्वास नहीं करते तो उसके आने के समय झरोखे से देखें। तब
देखेंगे कि इसने सारे नगर को अपने हाथ में कर लिया है। राजा ने उसके
पास मुकद्दमे के लिए आए लोगो को उसीके आदमी समझ विश्वास कर पूछा—
सेनापति ! क्या करें।
"देव ! इसे मार डालना चाहिए।"
"कोई बडा दोष दिखाई न देने पर कैसे मारें ?"
"एक उपाय है।"
"कौन सा उपाय ?"

३६६ [ २.७.२२०
"इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने
पर, उस दोष पर दोषी बता मारेंगे।"
"कौन सा असम्भव कार्य्य ।"
"महाराज, खरगेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान तो चार
साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाओ। यह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध
के कारण मार देंगे।"
राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—'पण्डित ! पुराने उद्यान में हम
बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाएं। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।"
बोधिसत्त्व समझ गए कि कालक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा
को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो दूंगा" कह कर
जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो
गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने
जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश में खड़े हो पूछा—पण्डित
क्या चिन्ता कर रहे हो ?
"तू कौन है ?"
"मैं शक्र हूँ।"
"राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।"
'पण्डित, चिन्ता न कर। मैं तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान
बना दूंगा। किस जगह पर बनाऊँ ?"
"अमुक स्थान पर बना।"
शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को
प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा—
महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेले।
राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनोशिलावर्ण की दीवार से
घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार
के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने कालक से पूछा—पण्डित ने हमारा
कहना किया। अब क्या करें ?

धम्मद्ध ] ३६७
“महाराज, जो एक रात मँ उद्यान बना सकता है। वह राज्य ले सकता
है वा नही ?”
“अब क्या करे ?”
“उससे दूसरा असम्भव कार्य्य कराएँ।”
“ कौनसा काम ?”
“सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनवाएँ ।”
राजा ने 'अच्छा' कह बोधिसत्व को बुलाकर कहा—
“आचार्य्य ! तुमने उद्यान तो बना दिया। अब इसके योग्य सात रत्नो
वाली पुष्करिणी बनाएँ। यदि नही बना सकोगे तो तुम्हारी जान जाएगी।”
बोधिसत्व ने कहा—महाराज, अच्छा। बना सकेगे तो बनाएँगे।
शक्र ने सुन्दर, सौ तीर्थों वाली, हज़ार जगह से मुड़ी, पाँच प्रकार के
कमलो से ढकी नन्दन पुष्करिणी¹ सदृश पुष्करिणी बना दी ! बोधिसत्त्व ने
उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा से जाकर कहा—देव, पुष्करिणी बना दी।
राजा ने उसे देख काळक से पूछा—अब क्या करे ? 'देव, उद्यान के योग्य
घर बनाने को कहे।' राजा ने बोधिसत्व को बुलवाकर कहा—आचार्य्य,
इस उद्यान और पुष्करिणी के अनुकूल एक ऐसा घर बनाएँ जो सारा का सारा
हाथी दाँत का हो। यदि नही बनाएँगे तो तुम्हारी जान न रहेगी।
शक्र ने उसका घर भी बना दिया। अगले दिन बोधिसत्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने उसे भी देख काळक से पूछा—अब
क्या करें ? 'महाराज, घर के योग्य मणि बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्त्व
को बुलाकर कहा—पण्डित, इस हाथीदांत के घर के अनुकूल मणि बनाओ।
मणि के प्रकाश में घूमेंगे। यदि नही बना सकोगे, तो तुम्हारी जान जाएगी।
शक्र ने उसकी मणि भी बना दी। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने देखकर पूछा—अब क्या करें ? "महाराज !
मालूम होता है कि ऐसा देवता है जो धम्मध्वज ब्राह्मण को जो जो वह चाहता
है, देता है। अब जिसे देवता भी न बना सके, ऐसी आज्ञा दें। चारो अङ्गों²
────────
¹ सिहल में 'नन्दा पोक्खरणि' पाठ है। ² चार गुणो ।

३६६ [ २.७.२२०
"इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने
पर, उस दोष का दोषी बना मारेंगे।"
"कौन सा असम्भव कार्य्य।"
"महाराज, जरखेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान दो चार
साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाओ। वह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध
के कारण मार देंगे।"
राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—पण्डित ! पुराने उद्यान में हम
बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाएँ। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।"
बोधिसत्त्व समझ गए कि काळक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा
को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो देखूँगा" कह घर
जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो
गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने
जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश मे खडे हो पूछा—पण्डित
क्या चिन्ता कर रहे हो ?
"तू कौन है ?"
"मैं शक्र हूँ।"
"राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।"
"पण्डित, चिन्ता न कर। मै तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान
बना दूँगा। किस जगह पर बनाऊँ ?"
"अमुक स्थान पर बना।"
शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को
प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा—
महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेलें।
राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनःशिलावर्ण की दीवार से
घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार
के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने काळक से पूछा—पण्डित ने हमारा
कहना किया। अब क्या करें ?

धम्मद्ध ] ३६७
“महाराज, जो एक रात म उद्यान बना सकता है। वह राज्य ले सकता
है या नही ?”
“अब क्या करें ?”
“उससे दूसरा असम्भव कार्य्य कराएँ।”
“कौनसा काम ?”
“सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनवाएँ।”
राजा ने 'अच्छा' कह बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—
“आचार्य्य ! तुमने उद्यान तो बना दिया। अब इसके योग्य सात रत्नो
वाली पुष्करिणी बनाएँ। यदि नही बना सकोगे तो तुम्हारी जान जाएगी।”
बोधिसत्त्व ने कहा—महाराज, अच्छा। बना सकेंगे तो बनाएँगे।
शक्र ने सुन्दर, सौ तीर्थों वाली, हज़ार जगह से मुड़ी, पाँच प्रकार के
कमलो से ढकी नन्दन पुष्करिणी¹ सदृश पुष्करिणी बना दी। बोधिसत्त्व ने
उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा से जाकर कहा—देव, पुष्करिणी बना दी।
राजा ने उसे देख काळक से पूछा—अब क्या करे ? 'देव, उद्यान के योग्य
घर बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्व को बुलवाकर कहा—आचार्य्य,
इस उद्यान और पुष्करिणी के अनुकूल एक ऐसा घर बनाएँ जो सारा का सारा
हाथी दांत का हो। यदि नही बनाएँगे तो तुम्हारी जान न रहेगी।
शक्र ने उसका घर भी बना दिया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने उसे भी देख काळक से पूछा—अब
क्या करें ? 'महाराज, घर के योग्य मणि बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्त्व
को बुलाकर कहा—पण्डित, इस हाथीदांत के घर के अनुकूल मणि बनाओ।
मणि के प्रकाश में घूमेंगे। यदि नही बना सकोगे, तो तुम्हारी जान जाएगी।
शक्र ने उसकी मणि भी बना दी। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने देखकर पूछा—अब क्या करें ? “महाराज!
मालूम होता है कि ऐसा देवता है जो धम्मध्वज ब्राह्मण को जो जो वह चाहता
है, देता है। अब जिसे देवता भी न बना सके, ऐसी आज्ञा दें। चारो अङ्गो²
;
¹ सिहल में 'नन्दा पोक्खरणि' पाठ है। ² चार गुणों।

३६८ [ २७.२२०
से युक्त मनुष्य को देवता भी नही बना सकता। इसलिए उसे कहें कि
मुझे चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल बनाकर दे।
राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर कहा—आचार्य्य, तूने हमारे लिए उद्यान,
पुष्करिणी, हाथी-दांत का प्रासाद, उसमें प्रकाश करने के लिए मणि-रत्न
बनाया। अब मेरे उद्यान की रक्षा करने वाला चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल
बनाएं। यदि नही बनाएंगे, तो तुम्हारी जान न रहेगी।
बोधिसत्त्व 'होवे, मिलने पर दूंगा' कह, घर जा प्रणीत भोजन खा, सोकर
जब प्रात काल उठा तो शय्या पर बैठ कर सोचने लगा—देवराज शक्र ने जो
स्वय बना सकता था, बनाया। वह चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना
सकता। ऐसा होने पर दूसरो के हाथ से मरने की अपेक्षा जगल में अनाथ की
तरह मरना ही अच्छा है।
वह बिना किसीसे कहे, प्रासाद से उतर, मुख्यद्वार से ही नगर से निकल,
जगल में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे बैठ सत्पुरुषो के धर्म का ध्यान करने लगा।
शक्र को जब यह पता लगा तो उसने एक वनचर की शक्ल बना बोधिसत्त्व के
पास जा पूछा—'ब्राह्मण ! तू सुकुमार है। तूने पहले दुख नही देखा सा है।
तू इस अरण्य में दाखिल हो बैठा क्या कर रहा है?' यह पूछते हुए पहली
गाथा कही—
सुखं जीवितरूपोसि रट्ठा विवनमागतो,
सो एकको अरण्यस्मिं रुक्खमूले कृपणो विय झायसि ॥
[तू सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले सा है। जनाकीर्ण स्थान से
निर्जन स्थान में आया है। त जगल में वृक्ष के नीचे अकेला बैठ कृपण की तरह
(क्या) सोचता है ?]
सुखं जीवितरूपोसि, तू सुख से जीने वाले, सुख से रहने वाले, सुख से
पालन हुए की तरह है। रट्ठा जनाकीर्ण स्थान से। विवनमागतो जलरहित
स्थान जगल में दाखिल हुआ। रुक्खमूले, वृक्ष के पास। कृपणो विय झायसि,
कृपण की तरह अकेला बैठा हुआ ध्यान करता है, विषण्ण ध्यान करता है।
तू यह क्या सोच रहा है ?—यही पृच्छा।

धम्मट्ठ ] . ३६६

इसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
सुखं जीवितरूपोस्मि रट्ठा विब्भनमागतो,
सो एकको अरञ्ञस्मि रुक्खमूले;
कपणो विय झायामि सतं धम्मं अनुस्सरं ॥
[ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला हूँ। जनाकीर्ण स्थान से निर्जन
स्थान मे आया हूँ। अरण्य में, वृक्ष के नीचे अकेला ही कृपण की तरह श्रेष्ठ
पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ ध्यान लगा रहा हूँ । ]
सतं धम्म अनुस्सरं, मित्र, यह सत्य ही है कि मै सुख पूर्वक जीवन व्यतीत
करने वाला जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान मे आया हूँ। मै इस जगल मे
.वृक्ष के नीचे अकेला ही बैठकर कृपण की तरह ध्यान करता हूँ। जो तू पूछता
है कि क्या सोच रहा हूँ, वह कहता हूँ। मैं श्रेष्ठ (पुरुषो के) धर्म को स्मरण
करता हुआ यहाँ बैठा हूँ। सतं धम्मं बुद्ध, पच्चेक बुद्ध, श्रावको का, श्रेष्ठ
सत्पुरुषो का, पण्डितो का धर्म—लाभ, हानि, अपकीर्ति, कीर्ति, निन्दा, प्रशंसा,
सुख, दुख, यह आठ प्रकार का लोक-धर्म है। इनसे आघात पाने पर सत्पुरुष
कांपते नही हैं, चंचल नही होते हैं। यह न कांपना सत्पुरुषो का धर्म है। इस
सत्पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ बैठा हूँ—यही प्रकट करता है।
शक्र ने पूछा—ब्राह्मण ! ऐसा है तो इस जगह क्यो बैठा है ?
“राजा चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल मंगवाता है। वैसा नही मिल
सकता है। सो मैं यह सोचकर कि किसीके हाथ से मरने से क्या लाभ, जगल में.
प्रविष्ट हो अनाथ की तरह मरूँगा, (इसलिए) यहाँ आकर बैठा हूँ।”
“ब्राह्मण ! मैं देवराज शक्र हूँ। मैने तेरे लिए उद्यान आदि बनाए।
चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना सकता। तुम्हारे राजा के वालो को
सजानेवाला छत्तपाणी नाम का नाई है। चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल की
आवश्यकता होने पर, उसे उद्यानपाल बनाने के लिए कहना।”

  • शक्र बोधिसत्त्व को यह उपदेश दे, 'डर मत' कह आश्वासन दे, अपने
    देवनगर को गया।
    ऽ४

३७० [ २.७ २२०

बोधिसत्व प्रात काल का भोजन कर राजद्वार गया। वही छत्तपाणी
को देख हाथ से पकड पूछा-मित्र, क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ?
"तुझे किसने कहा है कि मै चारो अङ्गो से युक्त हूँ ?"
"देवराज शक्र ने।"
"किस कारण से कहा ?"
"इस कारण से ' कह सब कहा। वह बोला-हाँ, मैं चारो अङ्गो से
युक्त हूँ।
बोधिसत्व उसे हाथ से पकडे ही पकडे राजा के पास ले जाकर बोला-
महाराज, यह छत्तपाणी चारो अङ्गो से युक्त है। उद्यानपाल की आवश्यकता
होने पर इसे उद्यानपाल बनावें।
राजा ने उसे पूछा-क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? हां महाराज।
'किन चारो अङ्गो से ?" उत्तर दिया-
"अनुसुय्यको अह देव अमज्जपायको अहं,
निस्नेहको अह देव अक्कोधन अधिद्वितो ॥
महाराज ! मुझ म ईर्ष्या नही है। मैने कभी शराब नही पी है। देव !
मुझ में दूसरो के प्रति न स्नेह है, न कोष है। मैं इन चारो अङ्गो से युक्त हूँ।
राजा ने पूछा-छत्तपाणी ! तू अपने आपको ईर्ष्या रहित कहता है ?
'-हाँ देव ! मै ईर्ष्या रहित हूँ।
'किस बात को देखकर ईर्ष्या रहित हुआ ?"
'देव ! सुने' कह अपने ईर्ष्या रहित होने का कारण बताते हुए यह गाथा
कही-
इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहित,
सो म अत्ये निवेसेसि तस्माह अनुसुय्यको ॥
[ राजन ! स्त्री के कारण मैने पुरोहित को बँधवाया। उसने मुझे सदर्थ
में लगाया। इसलिए मै ईर्ष्या रहित हूँ।]

इसका अर्थ है कि देव ! मैं पहले इसी वाराणसी नगर में तुम्हारे जैसा
ही राजा था। मैने स्त्री के लिए पुरोहित को बँधवाया।