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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

ख. अतीत कथा

१५० [ २.१.१५३
शास्ता ने कहा—"उपासको ! न केवल अभी यह बूढ़ा उबल कर अपने
बल को न जान महा बलवान् के साथ जूझ कर गूँह से लिबड़ गया है, यह पहले
भी उबल कर अपने बल को न जान महाबलवान् से जूझ गूँह से लिबड़ चुका है।"
उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की बात कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
सिंह होकर पैदा हुए, और हिमालय प्रदेश में पर्वत-गुफा में रहने लगे।
उनके नजदीक ही एक तालाब के आसपास बहुत से सूअर रहते थे।
उसी तालाब के आसपास तपस्वी भी पर्णशालाओ में रहते।
एक दिन सिंह भैंसे या हाथी मे से किसी एक को मार, पेट भर मास खा,
उस तालाब में उतर पानी पी ऊपर आया।
उसी समय एक मोटा सुअर उस तालाब के आसपास चरता था। सिंह
ने उसे देख सोचा कि इसे किसी दूसरे दिन खाऊँगा। यदि यह मुझे देख लेगा
तो फिर न आएगा। उसके न आने के डर से वह तालाब से उतर एक तरफ
को जाने लगा। सुअर ने उसे देखा तो सोचा—यह मुझे देख मेरे भय से सामने
से न जा सकने के कारण भागा जा रहा है। आज मुझे इस सिंह से जूझना चाहिए।
उसने सिर उठाकर सिंह को युद्ध के लिए ललकारते हुए यह पहली गाथा कही—
चतुप्पदो अह सम्म ! त्वम्पि सम्म ! चतुप्पदो,
एहि सीह ! निवत्तस्सु किन्नु भीतो पलायसि ॥
[दोस्त ! में चौपाया हूँ। तू भी चौपाया है। सिंह आ, रुक। डरकर
किस लिए भागता है।]
सिंह ने उसकी बात सुनी तो कहा—दोस्त ! आज हमारा तेरे साथ
युद्ध न होगा। आज से सातवें दिन इसी जगह पर सग्राम होने। इतना कह
वह चला गया।
सुअर प्रसन्न हुआ कि सिंह के साथ युद्ध करेगा। उसने अपने सब रिश्ते-
दारो को कह दिया। वह उसकी बात सुनकर डरे। 'अब तू हम सभी को नष्ट
करेगा। अपनी ताकत को न पहचानकर सिंह के साथ युद्ध करना चाहता है।
सिंह आकर हम सबके प्राण ले लेगा। दुस्साहस न कर।'

सूकर ] १५१
उसने भयभीत हो पूछा—"तो अब क्या करूँ ?"
उन्होने उपाय बताया—दोस्त सुअर ! तू उस जगह जाकर जहाँ यह
तपस्वी मल-मूत्र त्यागते हैं सात दिन तक शरीर में गन्दगी लपेटकर शरीर को
सुखा, सातवें दिन शरीर को ओस की बूँदो से गीलाकर सिंह के आने से पहले
ही आकर हवा का रुख देख, जिधर से हवा आती हो उधर खडे हो जाना ।
सिंह सफाई-पसन्द होता है। वह तेरे शरीर की गन्दगी को सूंघ तुझे विजयी
छोड चला जाएगा ।
उसने वैसे ही किया और सातवें दिन वहाँ जाकर खडा हो गया । सिंह
उसके शरीर की गन्दगी को सूंघ कर समझ गया कि उसने देह मे गूँह पोता है।
वह बोला—
"दोस्त सुअर ! तूने अच्छा उपाय सोचा है । यदि तूने गूँह न पोता होता,
तो मै तुझे यही मार देता । लेकिन अब तो मै तेरे शरीर को न मुंह से डस सकता
हूँ न पैरो से ही तुझ पर प्रहार कर सकता हूँ। इसलिए मै तुझे विजयी मानता
हूँ ।'—इतना कह दूसरी गाथा कही—
असुचि पूतिलोमोसि दुग्गन्धो वासि सूकर !
सचे युज्झितुकामोसि जय सम्म ! वदामि ते ॥
[ सुअर ! तू अपवित्र गन्दे वालो वाला है। तेरे शरीर से दुर्गन्ध आती
हैं। यदि तुझे युद्ध करने की इच्छा हैं, तो मै तुझे विजयी मान लेता हूँ । ]
पूतिलोमोसि—गन्दगी लगे दुर्गन्धपूर्ण वालो वाला है । दुग्गन्धो वासि,
अनिष्टकर, घृणित, प्रतिकूल दुर्गन्ध फैलाता है। जय सम्म ! वदामि ते !
तुझे विजयी मानता हूँ मे पराजित हूँ। तू जा। इतना कह सिंह रुक, अपना
शिकार कर, तालाब में पानी पी पर्वत गुफा को ही चला गया ।
सुअर ने अपने रिश्तेदारो को कहा—सिंह को मैने जीत लिया। वे डरे
कि फिर किसी दिन आकर सिंह हम सबको जान से मार डालेगा। वे भाग
कर किसी दूसरी जगह चले गए ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
सुअर यह वृद्ध स्थविर था । सिंह तो मै ही था ।