जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूकर ] १५१
उसने भयभीत हो पूछा—"तो अब क्या करूँ ?"
उन्होने उपाय बताया—दोस्त सुअर ! तू उस जगह जाकर जहाँ यह
तपस्वी मल-मूत्र त्यागते हैं सात दिन तक शरीर में गन्दगी लपेटकर शरीर को
सुखा, सातवें दिन शरीर को ओस की बूँदो से गीलाकर सिंह के आने से पहले
ही आकर हवा का रुख देख, जिधर से हवा आती हो उधर खडे हो जाना ।
सिंह सफाई-पसन्द होता है। वह तेरे शरीर की गन्दगी को सूंघ तुझे विजयी
छोड चला जाएगा ।
उसने वैसे ही किया और सातवें दिन वहाँ जाकर खडा हो गया । सिंह
उसके शरीर की गन्दगी को सूंघ कर समझ गया कि उसने देह मे गूँह पोता है।
वह बोला—
"दोस्त सुअर ! तूने अच्छा उपाय सोचा है । यदि तूने गूँह न पोता होता,
तो मै तुझे यही मार देता । लेकिन अब तो मै तेरे शरीर को न मुंह से डस सकता
हूँ न पैरो से ही तुझ पर प्रहार कर सकता हूँ। इसलिए मै तुझे विजयी मानता
हूँ ।'—इतना कह दूसरी गाथा कही—
असुचि पूतिलोमोसि दुग्गन्धो वासि सूकर !
सचे युज्झितुकामोसि जय सम्म ! वदामि ते ॥
[ सुअर ! तू अपवित्र गन्दे वालो वाला है। तेरे शरीर से दुर्गन्ध आती
हैं। यदि तुझे युद्ध करने की इच्छा हैं, तो मै तुझे विजयी मान लेता हूँ । ]
पूतिलोमोसि—गन्दगी लगे दुर्गन्धपूर्ण वालो वाला है । दुग्गन्धो वासि,
अनिष्टकर, घृणित, प्रतिकूल दुर्गन्ध फैलाता है। जय सम्म ! वदामि ते !
तुझे विजयी मानता हूँ मे पराजित हूँ। तू जा। इतना कह सिंह रुक, अपना
शिकार कर, तालाब में पानी पी पर्वत गुफा को ही चला गया ।
सुअर ने अपने रिश्तेदारो को कहा—सिंह को मैने जीत लिया। वे डरे
कि फिर किसी दिन आकर सिंह हम सबको जान से मार डालेगा। वे भाग
कर किसी दूसरी जगह चले गए ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
सुअर यह वृद्ध स्थविर था । सिंह तो मै ही था ।