जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
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हुए चार अगत्तियों¹ से बचकर दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्मानुसार राज्य
करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरनेवाले हुए।
इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी
पटरानी की कोख में रह गर्भ की सम्यक् रक्षा होने पर माता की कोख से
बाहर निकले। नाम-करण के दिन उसका नाम ब्रह्मदत्तकुमार ही रक्खा गया।
क्रम से बढ़ते हुए सोलह वर्ष की आयु होने पर वह तक्षशिला जाकर सब
शिल्पों में निष्णात हो पिता के मरने पर राजा हो धर्म से तथा न्याय से राज्य
करने लगा। राग आदि के वशीभूत न हो वह मुकद्दमो का फैसला करता।
उसके धर्म से राज्य करने से आमात्य भी धर्म से ही व्यवहारो (=मुकद्दमो)
का फैसला करते। मुकद्दमो का धर्म से फैसला होने के कारण झूठे मुकद्दमे
करनेवाले भी नही रहे। उनके न होने से राजाङ्गण में मुकद्दमे करनेवालो का
शोर नही होता था। आमात्य सारा दिन न्यायालय में बैठे रहकर भी जब
किसी को मुकद्दमा लिए आता न देखते तो उठकर चले जाते। न्यायालय खाली
कर देने योग्य हो गए।
बोधिसत्त्व सोचने लग कि मेरे धर्मानुसार राज्य करने के कारण मुकद्दमा
करने वाले नही आते। शोर नही होता। न्यायालय छोड़ने योग्य हो गए।
अब मुझे अपने दुर्गुणो की खोज करनी चाहिए। जब मुझे यह पता लग जाएगा
कि यह यह मेरे दुर्गुण है तो उन्ह छोड़कर गुणवान बनकर ही रहूँगा।
उसके बाद से वह खोजने लगे कि कोई मेरे दोष कहने वाला है ? उस
महल के अन्दर कोई ऐसा नही मिला जो उनके दोष कहे। जो मिला प्रशसा
करने वाला ही मिला। 'यह मेरे भय से भी केवल मेरी प्रशंसा ही करते होगे'
सोच महल के बाहर रहने वाला की परीक्षा की। यहाँ भी कोई न मिला, तो
नगर के अन्दर खोज की। नगर के बाहर चारो दरवाजा पर स्थित गाँवो में
¹छन्द, द्वेष, भय तथा मोह के वशीभूत हो पक्षपात करना।
राजोवाद ] १४१
राजा। वहाँ भी कोई दोष कहने वाला न मिला। प्रशंसा ही सुनने को मिली।
तब बोधिसत्व ने जनपद में खोजने का निर्णय किया। आमात्यों को राज्य संभाल
यह रथ पर चढ़ केवल सारथि को साथ ले भेष बदल नगर से निकला। जनपद में
खोजते हुए वह राज्य की सीमा तक चला गया। जब वहाँ भी उसे कोई दोष
दिखाने वाला नहीं मिला, प्रशंसा ही सुनाने वाले मिले तो प्रत्यन्त-देश¹ की
सीमा पर से महामार्ग से नगर की ओर लौटा।
उसी समय मल्लिक नाम का कोशल-नरेश भी धर्म से राज्य करता हुआ
अपने दोष कहने वाले को ढूंढने के लिए निकला था। जब उसे महल में अन्दर
रहने वालों आदि में कोई दोष कहनेवाला नहीं मिला, प्रशंसा करने वाले ही
मिले तो वह जनपद म खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। ये दोनों गाड़ियों के एक
नीचे रास्ते पर आमने सामने हुए। रथों के लिए एक दूसरे को गुजरने देने की
जगह नहीं थी।
मल्लिक राजा के सारथि ने वाराणसी राजा के सारथि से कहा—अपने
रथ को लौटा ले।
वाराणसी राजा के सारथि ने कहा—तू अपने रथ को लौटा ले। मेरे
रथ म वाराणसी राज्य के स्वामी महाराज ब्रह्मदत्त बैठे हैं।
दूसरे ने भी कहा—इस रथ में कोशल राज्य के स्वामी मल्लिक महाराज
बैठे हैं। तू अपने रथ को मोड़ कर हमारे राजा के रथ को जगह दे।
वाराणसी राजा के सारथि ने सोचा—यह भी राजा है। अब क्या करना
चाहिए? उसे एक उपाय सूझा कि राजा की आयु पूछकर जो आयु में छोटा
होगा उसका रथ लौटवाकर जो बड़ा होगा उसके रथ के लिए जगह कर-
वाऊँगा। ऐसा निश्चय कर उसने दूसरे सारथि से कोशल राजा की आयु पूछी।
मिलान करने पर दोनों राजा समान आयु वाले निकले। फिर राज्य-विस्तार,
सेना, धन, यश, जाति, गोत्र, कुल-भेद आदि के बारे में पूछा। दोनों तीन तीन
सौ योजन राज्य के स्वामी निकले। दोनों की सेना, धन, यश, जाति, गोत्र
तथा कुल-भेद सब एक सदृश था। तब सोचा जो अधिक शीलवान् होगा उसे
¹ राज्य-सीमा के बाहर।
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जगह दी जायगी। उसने पूछा—सारथि ! तुम्हारे राजा का सदाचार कैसा
है ?”
उसने अपने राजा के दुर्गुणो को भी गुण बताते हुए कहा कि हमारे राजा
में यह गुण है, यह गुण है, और यह गाथा कही—
दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति मल्लिको मुदुना मुदु
साधुम्पि साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना,
एतादिसो अय राजा मग्गा उय्याहि सारथि ॥
[ मल्लिक कठोर के साथ कठोरता का व्यवहार करता हैं, कोमल के साथ
कोमलता का। भले आदमी को भलाई से जीतता हैं, बुरे को बुराई से।
सारथि ! यह राजा ऐसा हैं। तू मार्ग छोड़ दे। ]
दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति, जो बहुत कठोर होता हैं उसे कठोर वचन से वा
प्रहार से ही जीतना चाहिए। ऐसे आदमी के प्रति यह कठोर व्यवहार करता
है अथवा कठोर वचन का प्रयोग करता है। इस प्रकार कठोर होकर ही उसे
जीतता हैं—यही प्रकट करता है। मल्लिको, उस राजा का नाम हैं। मुदुना
मुदूं, कोमल स्वभाव वाले को स्वयं भी कोमल होकर जीतता हैं। साधुम्पि
साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना, जो सज्जन है, उनके प्रति स्वयं भी सज्जन
बनकर उन्हें सज्जनता से और जो दुर्जन है उनके प्रति स्वयं भी दुर्जन बनकर
उन्हें दुर्जनता से जीतता है। एतादिसो अय राजा, इस हमारे कोशल राजा का
ऐसा सदाचरण है। मग्गा उय्याहि सारथि, अपने रथ को लौटाकर छोटे रास्ते
से जा। हमारे राजा को रास्ता दे।
तब वाराणसी राजा के सारथि ने पूछा—"भो ! क्या तुमने अपने राजा
के गुण कह लिए ?”
“हाँ।”
"यदि यही गुण हैं, तो अवगुण कैसे होते हैं ?”
"अच्छा ! यह अवगुण ही सही। तुम्हारे राजा में कौन से गुण हैं ?”
"अच्छा तो सुनो" कह दूसरी गाथा कही—
राजोवाद ] १४३
अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने
जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं,
एतादिसो अयं राजा मग्गा उय्याहि सारथि¹ ॥
[ क्रोधी को अक्रोध से जीतता है। बुरे को भलाई से। कंजूस को दान
से। झूठे को सत्य से। यह राजा ऐसा है। इसलिए सारथि ! तू मार्ग
छोड़ दे। ]
एतादिसो, इन अक्कोधेन जिने कोध आदि कहे गए गुणों से युक्त। यह
क्रोधी आदमी को स्वयं शान्त रहकर अक्रोध को जीतता है। असाधु को स्वयं
भला होकर साधुता से। कदरियं, अत्यन्त कंजूस को स्वयं दाता बनकर दान से।
अलिक वादिन, झूठ बोलनेवाले को स्वयं सत्यवादी बनकर। सच्चेन जिनाति
मित्र सारथि ! मार्ग से हट जा। इस प्रकार के सदाचार से युक्त हमारे राजा
को मार्ग दे। हमारा राजा ही मार्ग पाने के योग्य है।
ऐसा कहने पर मल्लिक राजा तथा उसके सारथि, दोनों ने उतर कर,
घोड़ों को खोल रथ को हटा वाराणसी के राजा को मार्ग दिया। वाराणसी
राजा ने मल्लिक राजा को उपदेश दिया कि राजा को यह यह करना चाहिए !
फिर वाराणसी जा वहाँ दानादि पुण्य-कर्म करके जीवन समाप्त होने पर स्वर्ग-
मार्ग ग्रहण किया।
मल्लिक राजा ने भी उसका उपदेश ग्रहण कर जनपद में जा अपने दोष
बताने वाले को बिना खोजे ही अपने नगर पहुँच दानादि पुण्य-कर्म करके स्वर्ग
को प्रयाण किया।
शास्ता ने कोशल-नरेश को उपदेश देने के लिए यह धर्म-देशना ला जातक
का मेल बैठाया।
उस समय मल्लिक राजा का सारथि मोग्गल्लान था। राजा आनन्द था।
वाराणसी राजा का सारथि सारिपुत्र था। राजा तो मैं ही था।
¹ धम्मपद (१७।३)।