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सर्वकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 479 में से

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१४२ [ २.१-१५१
जगह दी जायगी। उसने पूछा—सारथि ! तुम्हारे राजा का सदाचार कैसा
है ?”
उसने अपने राजा के दुर्गुणो को भी गुण बताते हुए कहा कि हमारे राजा
में यह गुण है, यह गुण है, और यह गाथा कही—
दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति मल्लिको मुदुना मुदु
साधुम्पि साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना,
एतादिसो अय राजा मग्गा उय्याहि सारथि ॥
[ मल्लिक कठोर के साथ कठोरता का व्यवहार करता हैं, कोमल के साथ
कोमलता का। भले आदमी को भलाई से जीतता हैं, बुरे को बुराई से।
सारथि ! यह राजा ऐसा हैं। तू मार्ग छोड़ दे। ]
दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति, जो बहुत कठोर होता हैं उसे कठोर वचन से वा
प्रहार से ही जीतना चाहिए। ऐसे आदमी के प्रति यह कठोर व्यवहार करता
है अथवा कठोर वचन का प्रयोग करता है। इस प्रकार कठोर होकर ही उसे
जीतता हैं—यही प्रकट करता है। मल्लिको, उस राजा का नाम हैं। मुदुना
मुदूं, कोमल स्वभाव वाले को स्वयं भी कोमल होकर जीतता हैं। साधुम्पि
साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना, जो सज्जन है, उनके प्रति स्वयं भी सज्जन
बनकर उन्हें सज्जनता से और जो दुर्जन है उनके प्रति स्वयं भी दुर्जन बनकर
उन्हें दुर्जनता से जीतता है। एतादिसो अय राजा, इस हमारे कोशल राजा का
ऐसा सदाचरण है। मग्गा उय्याहि सारथि, अपने रथ को लौटाकर छोटे रास्ते
से जा। हमारे राजा को रास्ता दे।
तब वाराणसी राजा के सारथि ने पूछा—"भो ! क्या तुमने अपने राजा
के गुण कह लिए ?”
“हाँ।”
"यदि यही गुण हैं, तो अवगुण कैसे होते हैं ?”
"अच्छा ! यह अवगुण ही सही। तुम्हारे राजा में कौन से गुण हैं ?”
"अच्छा तो सुनो" कह दूसरी गाथा कही—