जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक
नकुल ] १६५
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया ।
सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर माता पिता का पोषण करने वाला
भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय राजा आनन्द था। वाराणसी सेठ सारिपुत्र था। माता पिता
का पोषण करने वाला गृध्र तो मैं ही था।
१६५. नकुल जातक
"सन्धि कत्वा अमित्तेन..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
दो श्रेणियों के कलह के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
इसकी कथा उपरोक्त उरग जातक' की तरह ही है। इसमें शास्ता ने
कहा—'भिक्षुओ ! इन दो महा-मन्त्रियों का न केवल अभी मैने मेल कराया
है। पहले भी मैने इन दोनो का मेल कराया है।" यह कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जाकर सब विद्याएँ
सीखी। फिर गृहस्थी छोड ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रज्या ली। अभिज्ञा
'उरग जातक (१५४)
२०० [ २.२.१६५
तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर फल-मूल चुग चुग कर खाते हुए हिमालय-प्रदेश
में रहने लगे।
उनके चङ्क्रमण करने के स्थान के एक सिरे पर धाम्बी में एक नेवला
और उसीके पास वृक्ष की खोह मे एक सर्प रहता था। वह दोनो नेवला और
साँप हमेशा आपस में झगडते रहते थे।
बोधिसत्त्व ने उनको झगड़ने का दुष्परिणाम और मैत्री-भावना का लाभ
समझा कर कहा कि कलह न करके मिलकर रहना चाहिए। इस प्रकार उन
दोनो का मेल करा दिया।
साँप के बाहर निकलने के समय नेवला चङ्क्रमण-भूमि के सिरे पर बांबी
के द्वार में से सिर निकाल मुंह खोल श्वास-प्रश्वास लेता हुआ लेट कर सो रहा।
बोधिसत्त्व ने उसे इस प्रकार सोते हुए देख 'तुझे किस कारण से भय लगा है ?'
पूछते हुए यह पहली गाथा कही—
सन्धिं कत्वा अमित्तेन अण्डजेन जलाबुज !
विवरिय दाढं सयसि कुतो तं भयमागतं ॥
[ हे नकुल ! तू सांप से दोस्ती करके भी मुंह खोले पड़ा है। तेरे भयभीत
होने का क्या कारण है ? ]
—————
सन्धि कत्वा मैत्री करके, अण्डजेन, अण्डे से पैदा हुए नाग से, जलाबुज¹ !
नकुल को पुकारता है। वह गर्भ से पैदा होने के कारण जलाबुज कहलाया।
विवरिय, खोलकर।
—————
इस प्रकार बोधिसत्त्व के कहने पर नेवला बोला—आर्य्य ! शत्रु की
ओर से असावधान नही होना चाहिए। सशंकित ही रहना चाहिए। यह
कहते हुए नेवले ने दूसरी गाथा कही—
सङ्केथेव अमित्तस्मिं मित्तस्मिं पि न विस्ससे
अभया भयमुप्पन्नं अपि मूलं निकन्तति ॥
—————
¹ ज्राबुज (=जरायुज)
उपसाळ्हक ] २०१
[ शत्रु से सशङ्कित रहे। मित्र पर भी विश्वास न करे। अभय से जो
भय पैदा होता है वह जड़ भी खोद देता है।]
अभया भयमुप्पन्न यहाँ से तुझे भय नहीं है, ऐसा अभय (देने वाला)
कौन है ? मित्र ! मित्र मे भी विश्वास करने पर उससे जो भय उत्पन्न होता
है, वह जड़ भी खोद देता है। मित्र को सब छिद्र मालूम होते हैं, इसलिए वह
जड़ खोदने का काम करता है।
बोधिसत्त्व ने कहा—"डर मत। मैने ऐसा वर दिया है कि सर्प अब
तुझसे द्वेष नहीं करेगा। तू अब से उससे सशङ्कित मत रह।" इस प्रकार
उपदेश दे, चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर बोधिसत्त्व ब्रह्मलोकगामी हुए।
वे भी कर्मानुसार (परलोक) सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया। उस समय सर्प और
नेवला यह दोनो प्रधान थे। तपस्वी तो मैं ही था।
१६६. उपसाळ्हक जातक
उपसाळ्हक नामानं, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उप-
साळ्हक नाम के एक ब्राह्मण के बारे में जिसे श्मशान की शुद्धि का बहुत
ख्याल था कही।
क. वर्तमान कथा
वह ब्राह्मण बड़ा धनवान् था। लेकिन क्योंकि वह एक मिथ्या-मत का
शिकार था, इसलिए वह पास के विहार में रहने वाले बुद्धो की भी सेवा नहीं
करता था। हाँ, उसका पुत्र पण्डित था, ज्ञानी था।
२०२ [ २-२ १६६
उस ब्राह्मण ने बूढा होने पर पुत्र को कहा—'तात ! मुझे किसी ऐसे
श्मशान में मत जलाना जहाँ कोई चाण्डाल जलाया गया हो। मुझे किसी ऐसे
ही श्मशान में जलाना जहाँ पहले कभी कोई न जलाया गया हो।”
“तात ! मैं नही जानता कि आपको मुझे वहाँ जलाना चाहिए। बहुत
अच्छा हो, मुझे साथ ले जाकर आप बता दें कि मुझे तुम इस जगह जलाना।”
ब्राह्मण ने 'तात ! अच्छा' कह, और उसे ले जा नगर से निकल गृध्र-
कूट पर्वत पर चढ कहा—'तात ! यहाँ पहले कोई चाण्डाल नहीं जलाया
गया है। मुझे यहाँ जलाना।”
फिर वह पुत्र के साथ पर्वत से उतरने लगा।
शास्ता ने प्रात काल ही ऐसे लोगो का विचार करते हुए जिनकी उस दिन
ज्ञानप्राप्ति की सम्भावना थी उन पिता-पुत्र की श्रोतापत्ति-मार्गारूढ होने की
सम्भावना को देखा।
इसलिए मार्ग पकड एक शिकारी की तरह पर्वत की तराई में पहुँच उनके
पर्वत से उतरते समय उनकी प्रतीक्षा करते हुए बैठे। उन्होने उतरते समय
शास्ता को देखा। शास्ता ने कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा—"ब्राह्मण ! कहाँ
गए थे ?”
माणवक ने वह बात कही। शास्ता ने कहा—'तो आओ, तुम्हारे पिता
ने जो स्थान बताया है, वहाँ चलें।' उन दोनो को साथ लेकर पर्वत के शिखर
पर चढ पूछा—'कौनसी जगह है?'
माणवक ने कहा—"भन्ते ! इन तीनो चोटियो के बीच में बताया है।”
शास्ता बोले—'माणवक ! तेरे पिता केवल अभी श्मशान की शुद्धि
मानने वाले नही है, पहले भी श्मशान की शुद्धि मानने वाले रहे हैं। न केवल
अभी इसने तुझे कहा है कि मुझे इस स्थान पर जलाना, पहले भी इसने इसी
स्थान पर जलाने के लिए कहा है।” इतना कह, माणवक के प्रार्थना करने पर
शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में इसी राजगृह में यही उपसाल्हक ब्राह्मण था, यही इसका
पुत्र था।
उपसाळ्हक ] २०३
उस समय बोधिसत्व मगध देश में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, सब विद्याएँ
सीख, ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त
कर ध्यान-क्रीडा करते हुए हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे । फिर नमक-
खटाई खाने के लिए गृध्रकूट पर पर्ण-कुटी में रहने लगे ।
उस समय उस ब्राह्मण ने इसी तरह से पुत्र को कह, पुत्र के यह कहने पर
• कि 'तुम्ही मुझे उस तरह का स्थान बता दो' यही स्थान बताया । फिर पत्र
के साथ उतरते हुए ब्राह्मण बोधिसत्त्व को देख उनके पास पहुँचा ।
बोधिसत्त्व ने इसी तरह पूछ माणवक की बात सुन, कहा—'आ, तेरे
पिता द्वारा बताए गए स्थान की परीक्षा करें कि वहाँ पहले कोई जलाया गया
है, वा नहीं ?' फिर उनके साथ पर्वत-शिखर पर चढ़, जब माणवक ने कहा
कि यह तीनो चोटियो के बीच का स्थान ऐसा है जहाँ कोई नहीं जलाया गया,
कहा—"माणवक ! इसी स्थान पर जलाए गयो का हिसाब नहीं है। तेरा
पिता इसी राजगृह में ब्राह्मण कुल में ही पैदा होकर, उपसाळ्हक नाम से ही
इन्ही चोटियो के बीच में चौदह हजार बार जलाया गया है। पृथ्वी में ऐसी
कोई जगह नहीं है, जहाँ कोई न कोई जलाया न गया हो, जहाँ श्मशान न
बना हो, जहाँ सिर न कटे हो। पूर्व-जन्मो का ज्ञान होने से, उघाड कर यह
दो गाथाएँ कही—
उपसाळ्हक नामान सहस्सानि चतुद्दस
अस्मिं पदेसे दट्ठानि नत्थि लोके अनामंतं ॥
यम्हि सच्चं च धम्मो च अहिंसा सयमो दमो
एतदरिया सेवन्ति एतं लोके अनामंतं ।
[ उपसाळ्हक नाम से ही चौदह हजार व्यक्ति इसी स्थान में जलाए गए।
लोक में ऐसी जगह नहीं है जहाँ कोई न कोई मरा न हो।
जिसमे सत्य है, धर्म है, अहिंसा है, सयम है उसे आर्य्य-जन सेवन करते हैं।
यही लोक में नहीं मरता है ।]
———
अनामंतं, मृत-स्थान को ही व्यवहार से अमृत-स्थान कहा गया है।
उसका प्रतिषेध करते हुए अनामंत कहा है। अनमतं, भी पाठ है। लोक में
[ २.२.१६७
री जगह नहीं है जहाँ श्मशान न बना हो, जहाँ कोई न मरा हो। यम्हि
च्चं च धम्मो च, जिस व्यक्ति में चार आर्य-सत्य, पूर्व-भाग-सत्य ज्ञान¹ तथा
कुत्तर धर्म हैं, अहिंसा, दूसरो को कष्ट न देना, संयमो, सदाचार, दमो
न्द्रियो का दमन। जिस आदमी में यह गुण है, एतदरिया सेवन्ति बुद्ध, प्रत्येक
र तथा बुद्ध श्रावक आर्य-जन इस स्थान का सेवन करते हैं। इस प्रकार
आदमी के पास जाते हैं, उसकी संगति करते हैं। एत लोके अनामृतं, यही
र लोक में अमृतत्व का साधन होने से अमृत कहलाते है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व पिता तथा पुत्र को धर्मोपदेश दे चारो ब्रह्मविहारो
भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला (आर्य-)सत्यों को प्रकाशित कर जातक
मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पिता पुत्र
तापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुए।
उस समय के पिता पुत्र ही अब के पिता पुत्र हुए। तपस्वी तो मैं ही था।
१६७. समिद्धि जातक
"अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु..." यह शास्ता ने राजगृह के तपोदाराम मे
ार करते हुए समिद्धि स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन आयुष्मान् समिद्धि सारी रात योगाभ्यास करके अरुणोदय के
य स्नान कर अपने स्वर्ण-वर्ण शरीर को सुखा रहे थे। उन्होने अन्तरवासक
¹ मार्ग प्राप्ति से पहले का आर्य-सत्यों का ज्ञान।
समिद्धि ] २०५
पहन लिया था और उत्तरासंग उनके हाथ में था। वे सोने की सुन्दर प्रतिमा
की तरह प्रतीत होते थे। उनका शरीर समृद्ध होने से ही उनका नाम
समिद्धि था।
उनके शरीर का सौन्दर्य देख एक देव-कन्या उन पर आसक्त हो गई और
बोली—"भिक्षु ! तू तरुण है, तू युवा है, तेरे केश सुन्दर तथा काले है, तू
श्रेष्ठ यौवन से युक्त हैं, तू मनोरम है, तू दर्शनीय है, तू मन को प्रसन्न करने वाला
हैं। तेरे ऐसे शरीर वाले को काम-भोगो को न भोग प्रव्रजित होने में क्या लाभ ?
अभी तू काम-भोगो को भोग। पीछे प्रव्रजित होकर श्रमण-धर्म का पालन
करना।"
उसे स्थविर ने उत्तर दिया—"हे देव-कन्या ! मैं नही जानता कि मैं किस
आयु में मरूँगा। मेरी मृत्यु मुझसे छिपी है। इसलिए तरुणाई की अवस्था
में ही श्रमण-धर्म करके दुःख का अन्त करूँगा।"
स्थविर ने उसका स्वागत नही किया। वह वही अन्तर्ध्यान हो गई।
स्थविर ने शास्ता के पास जाकर यह बात कही। शास्ता बोले—
"समिद्धि ! न केवल तुझे ही अब देव-कन्या ने प्रलोभित किया है ? पूर्व में
भी देव-कन्याओ ने प्रव्रजितों को प्रलोभित किया है।"
शास्ता ने उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी-गाँव में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर सब विद्याओ में पारङ्गत
हो, ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त
कर हिमालय प्रदेश में एक तालाब के पास रहने लगे।
वह सारी रात योगाभ्यास करते रहे। अरुणोदय होने पर स्नान किया।
फिर एक वल्कल चीर पहन, एक हाथ में ले शरीर को सुखाने लगे। उसका
सुन्दर शरीर देख एक देव-कन्या उस पर आसक्त हो बोधिसत्व को ललचाती
हुई यह पहली गाथा बोली—
[२२।६७]
अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु ! नहि भुत्वान भिक्खसि ।
भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु मा त कालो उपच्चगा ॥१
[ भिक्षु ! तू बिना काम भोगो को भोगे भिक्षु बना है। काम भोगो को
भोग कर भिखारी नहीं बना है। भिक्षु ! काम भोगो का भोग करके तू
भिखारी बन। यह तेरा काम भोगो को भोगने का समय न बीत जाए ॥]
अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु, भिक्षु ! तू तरुणाई में काम भोगो को न भोग
कर भिक्षाचार करता है। नहि भुत्वान भिक्खसि, क्या पांच प्रकार के काम-
भोगो को भोग कर ही भिखारी नहीं बनना चाहिए ? तू काम भोगो को न
भोग कर ही भिखारी बना है। भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु, भिक्षु ! अभी
तरुणाई में काम भोगो को भोग। काम भोगो को भोग कर पीछे वृद्ध होने पर
भिखारी बनना। मा तं कालो उपच्चगा, यह काम भोगो के उपभोग करने
की आयु यह तरुणाई यूँ ही न बिता।
बोधिसत्व ने देव-कन्या की बात सुन अपना विचार प्रकट करने के लिए
दूसरी गाथा कही—
काल वोह न जानामि, छन्नो कालो न दिस्सति
तस्मा अभुत्वा भिक्खामि, मा म कालो उपच्चगा ॥
[ मैं मृत्यु के समय को नहीं जानता। छिपा हुआ समय दिखाई नहीं देता।
इसलिए बिना काम भोगा का उपभोग किए ही भिक्षु बना हूँ। मेरा यह समय
न बीत जाए।]
काल वोह न जानामि, 'वो' केवल निपात है। मै प्रथम आयु में मरूँगा,
मध्यम-आयु में अथवा आखिरी में—अपना मरन का समय नहीं जानता हूँ।
अत्यन्त पण्डित आदमी को भी—
१ देवता संयुत्त, संयुक्त निकाय।
सकुणिग्घि ] २०७
जीवित ब्याधि कालो च देहनिक्खेपन गति
पञ्चेते जीवलोकस्मि अनिमित्ता न नायरे ।
[ जीव-लोक में इन पाँच बातो का पता नही लगता—(१) जीने की
आयु, (२) रोग, (३) मृत्यु-समय, (४) शरीर के पतन का स्थान, (५)
मरने पर क्या गति होगी ? ]
छन्नो कालो न दिस्सति, इसलिए इस आयु में अथवा इस समय वा हेमन्त
आदि ऋतुओ में से इस ऋतु में मुझे मरना होगा, यह मुझसे भी छिपा हुआ
मृत्यु-समय मुझे दिखाई नहीं देता। अच्छी प्रकार ढका होने से प्रकट नही है।
तस्मा अभुत्वा भिक्खामि इसलिए काम-भोगो को न भोग भिखारी बना हूँ।
मा म कालो उपच्चगा, मेरा श्रमण धर्म करने का समय बीत न जाए।
इसलिए तरुणाई में ही प्रव्रजित होकर श्रमण धर्म करता हूँ।
देव-कन्या बोधिसत्त्व की बात सुन वही अन्तर्ध्यान हो गई।
शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय देव-कन्या यही देव-कन्या थी। मैं ही उस समय तपस्वी था।
१६८. सकुग्णग्घि जातक
सेनो बलसा पतमानो, यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय अपने विचार
के द्योतक सकुगोवाद सूत्र१ के बारे में कही।
१ महावग्ग ।