जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मैं ही
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आमात्य समझ गया कि राजा ने उसीके बारे मे कहा है। उसके बाद
से उसने रणवास को दूषित करने का साहस नहीं किया। उसके सेवक ने
भी यह जानकर कि आमात्य को पता लग गया है उसके बाद से वह कर्म करने
का साहस नहीं किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मैं ही
बाराणसी-राजा था। वह आमात्य भी राजा ने शास्ता को कह दिया जान
तब से यह कर्म नहीं कर सका।
२२६. कोसिय जातक
“काले निक्खमणा साधु. ” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय कोशल नरेश के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कोशल राजा प्रत्यन्त देश को शान्त करने के लिए गैर मुनासिब समय
पर निकल पड़ा। कथा उपरोक्त कथा¹ के सदृश ही है।
ख. अतीत कथा
शास्ता ने पूर्व(-जन्म) की कथा लाकर कहा—महाराज ! पूर्वकाल
मे बाराणसी नरेश ने नामुनासिब समय निकल उद्यान में पड़ाव डलवाया।
उसी समय एक उल्लू बाँसो के झुण्डो मे घुस कर छिप रहा। कौओ की
सेना ने आकर उसे घेर लिया कि निकलते ही पकडेगे। उसने सूर्यास्त तक
¹देखें कळाय मुट्ठि जातक (१७६)
कोसिय ] ३८६
गिरा रहे समय रहते ही निकलकर भागना आरम्भ किया। कौओ ने उसे घेर
चोचो से ठांगे मार मार कर गिरा दिया। राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर
पूछा—तात ! यह कौवे उल्लू को क्यो मार गिरा रहे हैं ? बोधिसत्त्व ने
उत्तर दिया-महाराज ! अपने निवासस्थान से असमय बाहर निकलने
वाले इस प्रकार का बुरा अनुभव करते ही हैं। इसलिए नामुनासिब समय
पर अपने स्थान से नहीं निकलना चाहिए। यह बात कहते हुए ये दो गाथाएँ
कहीँ—
काले निक्खमणा साधु नाकाले साधु निक्खमो,
अकालेनेहि निक्खम्म एकम्पि बहूजनो;
न किञ्चि अत्थं जोतेति धङ्कारोनाव कोसिय ॥
धीरो च विधिविधानञ्जू परेस विवरन्तगू,
सब्बामित्ते वसीकत्वा कोसियोव सुखी सिया ॥¹
[ समय पर (घर से बाहर) निकलना अच्छा है। असमय निकलना
अच्छा नही। असमय पर निकलने से किसी लाभ को प्राप्त नहीं करता।
अकेले को भी बहुत जन (मार देते हैं) जैसे कौवा की सेना न उल्लू को।
धीर, विधि-विधान को जानने वाला, तथा दूसरे के मार्ग पर चलने
वाला सभी शत्रुओ को वशीभूत कर (पण्डित) उल्लू की तरह सुखी होने ]
काले निक्खमणा साधु महाराज निष्क्रमण का मतलब है निकलने का
पराक्रम करना, यह उचित समय पर ही अच्छा होता है। नाकाले साधु
निक्खमो असमय अपने निवासस्थान से दूसरे स्थान पर जाना—निकलना
या पराक्रम करना—ठीक नहीं। अकालेनेहि इत्यादि चारो पदो मे पहले से
तीसरे और दूसरे से चौथे का सम्बन्ध जोडकर इस प्रकार अर्थ जानना चाहिए।
अपने निवासस्थान से असमय निकलकर आदमी न किञ्चि अत्थं जोतेति
अपनी कुछ भी उन्नति नहीं कर सकता। सो एकम्पि बहूननो बहुत मे भी
¹गाथाओं का टीकाकार ने जो अर्थ दिया है वह ठीक नहीं है। प्रतीत
होता है कि कथा अन्यथा हो गई है।
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वे शत्रु इसे अकेला निकला वा जाता देख मारकर महाविनाश को पहुँचा
देंगे। यह उपमा है—यङ्ककसेनाय कोसियं जिस प्रकार यह कौओं की सेना
इस असमय पर निकले, जाने उल्लू को चोंच से ठोंगे मारती है, महाविनाश
को प्राप्त करती है वैसे ही। इसलिए पशु-पक्षियों तक को भी—किसीको भी
असमय पर अपने निवासस्थान से नहीं निकलना चाहिए, नहीं चल पड़ना
चाहिए।
दूसरी गाथा में धीर का मतलब है पण्डित। विधि पुराने बुद्धिमान
लोगों द्वारा स्थापित परम्परा। विधानं हिस्सा या क्रम। विवरन्तगू भेद
को जानते हुए। सब्बामित्ते सभी शत्रु। वसी कत्वा अपने वश में करके।
कोसियोव इस मूर्ख उल्लू से भिन्न किसी दूसरे बुद्धिमान उल्लू की तरह।
मतलब यह है कि जो बुद्धिमान 'इस समय निकलना चाहिए, पराक्रम
करना चाहिए; इस समय नहीं निकलना चाहिए, नहीं पराक्रम करना चाहिए'
यह पुराने पण्डितों द्वारा स्थापित परम्परा नामक जो विधि है उसके विभाग
नामक विधान को, अथवा विधि के विधान, क्रम वा अनुष्ठान को जानता है;
वह विधिविधान को जानने वाला पराए और अपने भेद को जानकर जैसे
बुद्धिमान उल्लू रात्रि को अपने समय पर निकल पराक्रम कर जहां तहां सोए
हुए कौओ के सिरों को छेदता हुआ उन सभी शत्रुओं को वश में कर सुखी
होता है, इस प्रकार बुद्धिमान आदमी समय पर निकल पराक्रम कर अपने
शत्रुओं को वश में कर सुखी होवे, दुःखरहित होवे।
राजा बोधिसत्व का कहना सुन रुका।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा
आनन्द था। पण्डित आमात्य तो मैं ही था।