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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर

सकुणग्घि ] २०६
जब उस बटेर ने समझा कि बाज मेरे बहुत समीप आगया, तो वह पलट कर
उस ढेले के अन्दर चला गया।
बाज अपने जोर को न रोक सका। उसकी छाती ढेले से टकराई।
इस प्रकार उसका कलेजा चूर चूर हो गया। आँखें निकल आईं। यह मर गया।
शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर
भी अयोग्य स्थान पर चरने से शत्रु के हाथ मे पड जाते है। योग्य स्थान में,
अपने पैतृक स्थान में चरते हुए शत्रुओ को जीत लेते हैं। इसलिए तुम भी अयोग्य
स्थान में, जो तुम्हारा विषय नही है, मत विचरो। अयोग्य-स्थान में, जो अपना
विषय नही है विचरने वाले पर भिक्षुओ ! मार आक्रमण करता है। वह
मार का निशाना बनता है। भिक्षुओ ! भिक्षुओ के लिए अयोग्य-स्थान,
जो उनका विषय नही है, क्या है ? जो यह पाँच प्रकार के कामोपभोग हैं।
कौन से पाँच ? आँख से देखे जाने वाले (प्रिय) रूप, कान से सुने जाने वाले
शब्द, नाक से सूंघी आने वाली सुगन्धियाँ, जिह्वा से मजा लिए जानेवाले रस
और शरीर से छुए जाने वाले स्पर्श—भिक्षुओ, यह भिक्षुओ के लिए अयोग्य-
स्थान हैं। यह उनका विषय नही है।"
इतना कह सम्यक सम्बुद्ध हुए रहने की अवस्था में प्रथम गाथा कही—
सेनो बलसा पतमानो लापं गोचरठायिनं,१
सहसा अज्झपत्तो मरण तेनुपागमि ॥
[ बाज अपने बल को न रोक करके अपने योग्य-स्थान पर विचरन वाले
बटेर पर झपटा। इसीसे वह मर गया।]
बलसा पतमानो, बटेर को पकडन की इच्छा से जोर से गिरने वाला,
गोचरठायिनं, अपने विषय (=प्रदेश) से निकल जगल तक चरने के लिए
स्थित। अज्झपत्तो, पहुँचा। मरण तेनुपागमि, इस कारण से मर गया।
१ अगोचर ठायिनं के स्थान पर गोचर ठायिन श्रेयस्कर प्रतीत
होता है।
१४

२१० [ २.२.१६६
उसके मरने पर बटेर ने निकल कर शत्रु की पीठ देख कर सन्तुष्ट हो
उसकी छाती पर खड़े हो उल्लास पूर्वक दूसरी गाथा कही—
सोहं नयेन सम्पद्यो पेत्तिके गोचरे रतो
अपेतसत्तु मोदामि सम्पस्स अत्यमत्तनो ॥
[ में उपाय से अपने पैतृक-प्रदेश में चरता हुआ, अपनी उन्नति देखता हुआ
प्रसन्न हूँ, क्योंकि मेरा शत्रु नहीं रहा है।]
नयेन, उपाय से, अत्यमत्तनो, अपनी आरोग्य नामक उन्नति।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओं ने श्रोतापत्ति
आदि फल प्राप्त किए।
उस समय बाज देवदत्त था। बटेर तो मैं ही था।
१६६. अरक जातक
"यो वे मेत्तेन चित्तेन " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय मेत्तसूत्त¹ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक समय शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, मैत्री-
भावना जो कि चित्त की विमुक्ति (का साधन) है का सेवन करने से, की
¹अंगुत्तर निकाय, एकादसक निपात।

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अरक ]' ' २११
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भावना करने से, को बढ़ाने से, को जारी रखने से, का अभ्यास करने से,
का अनुष्ठान करने से, का अच्छी तरह आरम्भ करने से ग्यारह लाभो की
आशा करनी चाहिए। कौन से ग्यारह ? सुख पूर्वक सोता है, सुख से जागता
है, बुरा स्वप्न नही देखता, मनुष्यो का प्रिय होता है, अ-मनुष्यों का प्रिय
होता है, देवता रक्षा करते हैं, इस पर अग्नि, विष, या शस्त्र का आक्रमण
नही होता, चित्त जल्दी शान्त हो जाता है, मुख-वर्ण सुन्दर होता है, होश
रखकर शरीर छोड़ता है तथा अधिक कुछ (निर्वाण-मार्ग) न प्राप्त कर
सकने पर ब्रह्मलोकगामी अवश्य होता है। भिक्षुओ मैत्री भावना जो कि
चित्त की विमुक्ति (का साधन) है, का सेवन करने से.. .इन ग्यारह
लाभो की आशा करनी चाहिए।" इन ग्यारह लाभो वाली मैत्री-भावना की
प्रशंसा कर आगे कहा—"भिक्षुओ, भिक्षु को सभी प्राणियो के प्रति खास तौर
पर, साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी चाहिए। हितैषी का भी हित-
चिन्तक होना चाहिए, जो हितैषी न हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए,
जो मध्यस्थ-वृत्ति हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए। इस प्रकार सभी
प्राणियो के प्रति खास तौर पर, तथा साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी
चाहिए । करुणा-भावना की भावना करनी चाहिए । मुदिता-भावना की
भावना करनी चाहिए। उपेक्षा-भावना की भावना करनी चाहिए। इन
चारो ब्रह्म-विहारो का अभ्यास करना ही चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करने
से यदि मार्ग तथा फल की प्राप्ति न भी हो तो भी ब्रह्मलोकगामी होता है ।
पुराने समय में भी पण्डित लोग सात वर्ष तक मैत्री-भावना करके सात सबत-
विवर्त्त कल्प तक ब्रह्मलोक में ही रहे।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा

पूर्व समय में एक कल्प में बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए । बड़े
होने पर काम-भोगो को छोड़ ऋषि-प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो चारो
ब्रह्म-विहारो को प्राप्त कर अरक नाम से उपदेशक हुए। वह हिमालय प्रदेश
में रहते थे। उनके बहुत अनुयाई थे। वे ऋषि-गणो को उपदेश देते हुए कहते
—"प्रव्रजित को मैत्री-भावना का अभ्यास करना चाहिए। करुणा-भावना,

२१२ [ २.२.१६६
मुदिता-भावना तथा उपेक्षा-भावना का अभ्यास करना चाहिए। मैत्री-पूर्ण
चित्त अर्पणा-समाधि तथा ब्रह्मलोक-परायणता तक को प्राप्त कराता है।"
इस प्रकार मैत्री-भावना की प्रशंसा करते हुए उन्होने यह गाथा कही—
यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति
उद्धं अधो च तिरियं च अप्पमाणेन सब्बसो
अप्पमाणं हितं चित्तं परिपुण्णं सुभावितं
यं पमाण कतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति
[ जो अप्रमाण मैत्री चित्त से ऊपर-नीचे तथा तिर्यक् दिशा में सारे लोको
पर अनुकम्पा करता है, उसके प्रमाण रहित, परिपूर्ण अच्छी तरह से भावना
किए गए मैत्री-चित्त के (फल) के आगे जो सीमित कर्म है उसका फल नहीं
ठहरता।]
यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति, क्षत्रिय आदि में अथवा श्रमण-
ब्राह्मण आदि में जो कोई अर्पणा-प्राप्त चित्त से सारे प्राणियो पर अनुकम्पा
करता है, उद्धं पृथिवी से नेवसञ्ञानासञ्ञायतन ब्रह्मलोक तक अधो पृथ्वी
से नीचे उस्सद नाम के महानरक तक, तिरियं, मनुष्य लोक में जितने चक्रवाल
हैं उन सब में जितने प्राणी है वह सभी वैर-रहित हो, क्रोध-रहित हो, दुःख-
रहित हो; इस प्रकार भावना किए गए मैत्री-चित्त से। अप्पमाणेन अप्रमाण
प्राणियो के कारण असीम आलम्बन होने से अप्रमाण। सब्बसो सब तरह
से ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् इस प्रकार सब सुगति तथा दुर्गति में। अप्पमाणं
हितं चित्तं सभी प्राणियों के प्रति मैत्री की असीम भावना। परिपुण्णं सम्पूर्ण
सुभावितं अच्छी प्रकार उन्नत, इसका मतलब है अर्पणा-चित्त। यं पमाण कतं
कम्मं जो यह अप्पमाण-अप्पमाणारम्मण, परित्तं-अप्पमाणारम्मण तथा अप्प
माणं-परित्तारम्मणं तीन प्रकार के आरम्मण पर पूर्ण अधिकार करते हुए उसे
न बढा कर जो सीमित कामावचर कर्म किया जाता है। न तं तत्रावसिस्सति
वह सीमित (परित्त) कर्म जो अप्रमाण मैत्री-चित्त रूपी रूपावचर धर्म है,
उसके सामने नहीं ठहरता। जैसे बाढ़ के आने पर सीमित पानी उससे पृथक
नहीं रह सकता है, नहीं ठहरता है; वह बाढ़ में ही मिल जाता है। उसी प्रकार

ककण्टक ] २१३
वह सीमित कर्म उस महान् कर्म के अन्दर, उस महान् कर्म में मिलकर, फल
देने में असमर्थ हो रहता है, अपना फल नहीं दे सकता।
वह महान् कर्म ही उसे ढक देता है, महान् कर्म ही फल देने वाला
रहता है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व अपने शिष्यो को मैत्री-भावना का फल कह ध्यान
में अवस्थित रह ब्रह्मलोक में पैदा हो सात सवत्तं-विवत्तं कल्प तक फिर इस
लोक में नहीं आए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।•
उस समय ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। अरक नाम का उपदेशक तो मै
ही था।
१७०. ककण्टक जातक
“नायं पुरे श्रोनमति' •” यह ककण्टक जातक महाउम्मग जातक१ में
आएगी।
१ महाउम्मग जातक (५४६)