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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

में हुशियार है, बल्कि पहले भी हुशियार ही था" कह पूर्वजन्म की कथा कही—

सालित्त ] १३
शास्ता ने उसकी निन्दा करते हुए "भिक्षुओ ! न केवल अभी यह इस हुनर
में हुशियार है, बल्कि पहले भी हुशियार ही था" कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि-
सत्त्व उसके आमात्य (होकर उत्पन्न हुए) थे। राजा का तत्कालीन पुरोहित
बडा बुलक्कड था—बोलना आरम्भ करता तो किसी दूसरे को बोलने का
मौका ही न मिलता। राजा सोचने लगा—'इसका मुंह बन्द करनेवाला
कोई कब मिलेगा ?" और तब से ऐसे आदमी की खोज मे रहने लगा।
उन दिनो वाराणसी में एक कुबडा ककर फेकने के हुनर मे पारगत
था। गाँव के लडके वाले उसे ठेले (रथक) पर चढा खीच कर, वाराणसी
नगर के दरवाजे पर शाखाग्रो से युक्त एक महान्न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे ले
आते, और उसे घेर कर तथा कौडी आदि दे कहते "हाथी की शक्ल बनाओ ।
घोडे की शक्ल बनाओ।" वह ककर चला चलाकर न्यग्रोध के पत्तो में भिन्न
भिन्न तरह की शक्लें बनाता। सभी पत्तो में छेद हो गये।
वाराणसी नरेश सैर को जाते समय उस जगह आये। भगा दिये जाने
के भय से लडके वाले भाग गये। कुबडा वही पड रहा। राजा ने न्यग्रोध
वृक्ष के नीचे रथ पर बैठे ही बैठे, छिद्रित पत्तो के कारण धूप-छनी छाया
देख, सभी पत्तो को छिद्रित पा पूछा—ऐसा किसने किया ?"
"देव ! कूबडे ने।"
'यह ब्राह्मण का मुंह बन्द कर सकेगा' सोच राजा ने पूछा—"कुबडा
कहाँ है ?"
खोज करनेवालो ने कुबडे को वृक्ष की जड में पडे देख कहा "देव ! यहाँ
है।"
राजा ने उसे बुलवा, लोगों को दूर हटवा, उस से पूछा—"हमारे यहाँ
एक बुलक्कड ब्राह्मण है, क्या तू उसे निश्शब्द कर सकेगा ?"
"देव ! यदि नलकी भर बकरी के मेगन मिले तो कर सकूँगा।"
राजा कुबडे को घर ले गया, और कनात के भीतर बैठाया। (फिर)
कनात में एक छेद कर ब्राह्मण के बैठने का आसन उस छेद की ठीक सीध में

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बिछवाया । नलकी भर बकरी की सूखी मींगन कुबड़े के पास रखवा दी ।
जिस समय ब्राह्मण हजूरी मे आया, उसे उस आसन पर बिठाना, राजा ने बात
चीत चलाई । किसी दूसरे को बोलने का अवसर न दे, ब्राह्मण ने राजा से
बोलना शुरू किया । बनात के छेद मे से मक्खी डालने की तरह वह कुबड़ा
एक एक मींगन ब्राह्मण के तालु के अन्दर गिराता रहा । नलिया मे तेल
डालने की तरह ब्राह्मण जो जो मींगनें आती उन्हें निगल जाता । सब
खतम हो गईं । उसके पेट में गई नलकी भर बकरी की मींगनें आधे आळ्हक१
भर थी । राजा ने उन्हें खतम हुआ जान कहा—"आचार्य ! अति भुलक्कड़
होने के कारण आपको नलकी भर बकरी की मीगने निगल जाने पर भी पता
नहीं लगा । अब इससे अधिक हजम न कर सकोगे । जाओ कगनी या
पानी पीकर इन्हें निकाल अपने को स्वस्थ करो ।"
उस दिन से मानो ब्राह्मण का मुख सिल गया । बातचीत करनेवाले
के साथ भी बातचीत न करता । 'इसने मुझे कर्ण-सुख दिया है' सोच राजा
ने कुबड़े को चारो दिशा मे लाख की आमदनी के चार गाँव दिये । बोधिसत्व
ने राजा के पास आ 'देव ! बुद्धिमान् आदमी को हुनर सीखना चाहिए ।
कुबड़े ने केवल कंकर फेंकने (की कला से) भी सम्पत्ति पैदा कर ली' कह,
यह गाथा कही—
साधु खो सिप्पकं नाम अपि यादिसकीदिसं,
पस्स खज्जप्पहारेन लद्धा गामा चतुद्दिशा ॥
[जैसा कैसा भी हो, हुनर सीखना अच्छा है । देखो ! कुबड़े ने
(मींगनो के) फेकने (के हुनर) से ही चारो दिशाओ में गाँव पा लिये ।]
पस्स खज्जप्पहारेन, महाराज ! देखो इस कुबड़े ने बकरी की मींगन
के निशाने लगाने मात्र से ही चारो दिशाओ में चार गाँव पा लिये । अन्य
शिल्पो की महिमा का तो क्या ही कहना—इस प्रकार हुनर सीखने की महिमा
का वर्णन किया ।
१ १६ पसत=एक आळ्हक ।