जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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बिछवाया । नलकी भर बकरी की सूखी मींगन कुबड़े के पास रखवा दी ।
जिस समय ब्राह्मण हजूरी मे आया, उसे उस आसन पर बिठाना, राजा ने बात
चीत चलाई । किसी दूसरे को बोलने का अवसर न दे, ब्राह्मण ने राजा से
बोलना शुरू किया । बनात के छेद मे से मक्खी डालने की तरह वह कुबड़ा
एक एक मींगन ब्राह्मण के तालु के अन्दर गिराता रहा । नलिया मे तेल
डालने की तरह ब्राह्मण जो जो मींगनें आती उन्हें निगल जाता । सब
खतम हो गईं । उसके पेट में गई नलकी भर बकरी की मींगनें आधे आळ्हक१
भर थी । राजा ने उन्हें खतम हुआ जान कहा—"आचार्य ! अति भुलक्कड़
होने के कारण आपको नलकी भर बकरी की मीगने निगल जाने पर भी पता
नहीं लगा । अब इससे अधिक हजम न कर सकोगे । जाओ कगनी या
पानी पीकर इन्हें निकाल अपने को स्वस्थ करो ।"
उस दिन से मानो ब्राह्मण का मुख सिल गया । बातचीत करनेवाले
के साथ भी बातचीत न करता । 'इसने मुझे कर्ण-सुख दिया है' सोच राजा
ने कुबड़े को चारो दिशा मे लाख की आमदनी के चार गाँव दिये । बोधिसत्व
ने राजा के पास आ 'देव ! बुद्धिमान् आदमी को हुनर सीखना चाहिए ।
कुबड़े ने केवल कंकर फेंकने (की कला से) भी सम्पत्ति पैदा कर ली' कह,
यह गाथा कही—
साधु खो सिप्पकं नाम अपि यादिसकीदिसं,
पस्स खज्जप्पहारेन लद्धा गामा चतुद्दिशा ॥
[जैसा कैसा भी हो, हुनर सीखना अच्छा है । देखो ! कुबड़े ने
(मींगनो के) फेकने (के हुनर) से ही चारो दिशाओ में गाँव पा लिये ।]
पस्स खज्जप्पहारेन, महाराज ! देखो इस कुबड़े ने बकरी की मींगन
के निशाने लगाने मात्र से ही चारो दिशाओ में चार गाँव पा लिये । अन्य
शिल्पो की महिमा का तो क्या ही कहना—इस प्रकार हुनर सीखने की महिमा
का वर्णन किया ।
१ १६ पसत=एक आळ्हक ।