जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
फिर उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
हुआ ? उसने प्रारम्भ से लेकर प्रतिकूलता की सब बात कही । शास्ता ने
कहा--भिक्षु ! पूर्व समय मे जानवरो ने भी अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता
देख, अनुकूल रहने पर उस जगह रह, प्रतिकूल प्रतीत होने पर उसे छोड दिया
और दूसरी जगह चले गए । तू ने क्यो अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता न समझी ?
फिर उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व पक्षी होकर पैदा
हुए । बडे होने पर सौभाग्यशाली पक्षि-राजा हो एक जगल में एक तालाब के
किनारे शाखा प्रशाखाओ से युक्त तथा बहुत पत्तोवाले एक महान्-वृक्ष पर
अनेक अनुचरो सहित रहने लगे । बहुत से पक्षी पानी पर फैली हुई शाखाओ
पर रहते हुए अपनी बीट पानी मे गिरा देते थे ।
उस तालाब मे एक प्रचण्ड नाग-राज रहता था । उसके मन में आया कि
यह पक्षिगण मेरे निवासस्थान तालाब में बीट गिराते है । में पानी मे से आग
पैदा कर इस वृक्ष को जला इन्हें यहाँ से भगाऊँ । उसने क्रुद्ध हो रात को जिस
समय सब पक्षिगण इकट्ठे हो वृक्ष की शाखाओ पर सो रहे थे, पहले चूल्हे पर
रक्खे पानी की तरह बुलबुले पैदा कर, दूसरी बार धुआँ उठा, तीसरी बार
ताड के वृक्ष जितनी ऊँची ज्वाला उठाई । बोधिसत्त्व ने कहा—"पक्षिगण !
आग से जलने पर पानी से बुझाया जाता है, लेकिन अब पानी ही जलने लगा है
इसलिए यहाँ नही रह सक्ते । अन्यत्र चले ।" इतना कह, यह गाथा कही—
खेमं यहिं तत्थ घरी उदीरितो
उदकस्स मज्झे जलते घतासनो,
न अज्ज वासो महिया महीरुहे
दिसा भजव्हो सरणज्ज नो भय ॥
[ जहाँ कल्याण था, वही शत्रु पैदा हो गया । पानी में आग जलने लगी ।
आज पृथ्वी से उगे वृक्ष पर रहना नहीं होगा । (किसी दूसरी) दिशा को
चलो। जिस जगह हम ने शरण ली थी वहाँ से भय पैदा हो गया । ]
भानसोधन ] ८५
सेमें याँहि तत्थ अरी उदीरितो, जिस पानी में हमारा कल्याण था, जहाँ
निर्भयता थी, वही से विरोधी, शत्रु पैदा हो गया । उदरस्स, पानी के, घतासनो,
अग्नि । वह घृत खाती है, इसी लिए घतासन कहलाई । न अज्ज वासो, आज
हमारा रहना नहीं है । महिया महीरुहे, महीरुह कहते हैं वृक्ष को, उस इस पृथ्वी
में से पैदा हुए वृक्ष में । दिसा भजव्हो, दिशाओं में जाओ । सरणञ्च नो भय,
आज हमारे शरणस्थान से ही भय पैदा हो गया । प्रतिशरणस्थान ही भय का
जनक हो गया ।
ऐसा कह बोधिसत्व अपना कहना मानने वाले पक्षियों को लेकर अन्यत्र
चले गए । बोधिसत्व का कहना न मान जो पक्षीगण वहीं रहे वह मर गए ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया । आर्य-सत्यों के प्रकाशन के अंत में वह भिक्षु अर्हत्
हो गया ।
उस समय बोधिसत्व का कहना मानने वाले पक्षीगण बुद्ध परिषद हुई ।
पक्षि-राजा तो मैं ही था ।
१३४. भानसोधन जातक
“ये सञ्चिन्नो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय सङ्कस्स
नगर द्वार पर सक्षेप में पूछे गए प्रश्न की धर्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा
विस्तृत व्याख्या के बारे में कही । अतीत कथा इस प्रकार है—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणमी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने
एकान्त जगल में मृत्यु को प्राप्त होते समय शिष्यो के पूछने पर सक्षेप से उत्तर
८६ [ १.१४.१३४
दिया—नेवसञ्जानासञ्जी...तपस्वियों को ज्येष्ठ-शिष्य की बात समझ
मे नही आई। बोधिसत्व ने आभास्वर (-लोक) से आ आकाश में ठहर यह
गाथा कही—
ये सञ्जिनो तेपि दुग्गता
येपि असञ्जिनो तेपि दुग्गता,
एतं उभयं विवज्जय
तं समापत्तिसुखं अनङ्गणं ॥
[जो सञ्जि है, उनकी भी दुर्गति है। जो असञ्जि हैं, उनकी भी दुर्गति
है। इन दोनो को छोड़कर समापत्ति सुख दोष रहित है।]
ये सञ्जिनो, नेवसञ्जानासञ्जी प्राणियो को छोड़ शेष चित्त वाले
प्राणियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, उस समापत्ति के न होने से वह भी दुर्गति-
प्राप्त है। येपि असञ्जिनो, असञ्जा-भव में पैदा होनेवाले चित्त-रहित प्रा-
णियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, ये भी इसी समापत्ति को प्राप्त किए न
रहने से दुर्गति-प्राप्त हैं। एतं उभयं विवज्जय। इन दोनो सञ्जि-भाव तथा
असञ्जिभाव को छोड़, त्याग—यह शिष्यो को उपदेश देता है। तं समापत्ति
सुखं अनङ्गणं—नेवसञ्जानासञ्जायतन को प्राप्त करने वालो के शान्त होने
के कारण उसे सुख कहा, ध्यान सुख अङ्गण-रहित, दोष रहित होता है। चित्त
की बहुत एकाग्रता होने से भी वह अङ्गण-रहित कहलाया।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने धर्मोपदेश दिया। फिर शिष्य की प्रशंसा कर
ब्रह्मलोक गए। तब बाकी के तपस्वियो की ज्येष्ठ-शिष्य के प्रति श्रद्धा बड़ी।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
शिष्य सारिपुत्र था; महाब्रह्मा तो मै ही था।