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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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८६ [ १.१४.१३४
दिया—नेवसञ्जानासञ्जी...तपस्वियों को ज्येष्ठ-शिष्य की बात समझ
मे नही आई। बोधिसत्व ने आभास्वर (-लोक) से आ आकाश में ठहर यह
गाथा कही—
ये सञ्जिनो तेपि दुग्गता
येपि असञ्जिनो तेपि दुग्गता,
एतं उभयं विवज्जय
तं समापत्तिसुखं अनङ्गणं ॥
[जो सञ्जि है, उनकी भी दुर्गति है। जो असञ्जि हैं, उनकी भी दुर्गति
है। इन दोनो को छोड़कर समापत्ति सुख दोष रहित है।]
ये सञ्जिनो, नेवसञ्जानासञ्जी प्राणियो को छोड़ शेष चित्त वाले
प्राणियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, उस समापत्ति के न होने से वह भी दुर्गति-
प्राप्त है। येपि असञ्जिनो, असञ्जा-भव में पैदा होनेवाले चित्त-रहित प्रा-
णियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, ये भी इसी समापत्ति को प्राप्त किए न
रहने से दुर्गति-प्राप्त हैं। एतं उभयं विवज्जय। इन दोनो सञ्जि-भाव तथा
असञ्जिभाव को छोड़, त्याग—यह शिष्यो को उपदेश देता है। तं समापत्ति
सुखं अनङ्गणं—नेवसञ्जानासञ्जायतन को प्राप्त करने वालो के शान्त होने
के कारण उसे सुख कहा, ध्यान सुख अङ्गण-रहित, दोष रहित होता है। चित्त
की बहुत एकाग्रता होने से भी वह अङ्गण-रहित कहलाया।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने धर्मोपदेश दिया। फिर शिष्य की प्रशंसा कर
ब्रह्मलोक गए। तब बाकी के तपस्वियो की ज्येष्ठ-शिष्य के प्रति श्रद्धा बड़ी।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
शिष्य सारिपुत्र था; महाब्रह्मा तो मै ही था।