जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।
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पर कुशल समाचार पूछे जाने पर, यह समाचार वह निवेदन किया कि
भन्ते ! इस प्रकार देवदत्त ने अपने अयोग्य चीवर (=अर्हत्-ध्वजा) को
धारण किया। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने अयोग्य
चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय प्रदेश में हाथी के कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अस्सी हजार
मस्त हाथियों के नायक बन जंगल में रहने लगे।
एक गरीब आदमी ने वाराणसी में दन्तकार गली में हाथी-दाँत का काम
करने वालों को चूड़ी आदि बनाते देख कर पूछा—हाथी-दाँत मिलें तो लोगे ?
उन्होंने कहा—लेंगे। यह शस्त्र ले, काषाय वस्त्र पहन, प्रत्येक-सम्बुद्ध का वेष
बना, टोपा पहन, हाथियों की गली में जा, आयुध से हाथियों को मार, दाँत
ला, वाराणसी में बेच, जीविका चलाता था। आगे चलकर उसने बोधिसत्त्व
के दल के सबसे अन्तिम हाथी को मारना आरम्भ किया। रोज़ रोज़ हाथियों
को कम होते देख हाथियों ने बोधिसत्त्व से कहा—किस कारण से हाथी कम
हो रहे हैं ?
बोधिसत्त्व ने देखभाल करते हुए सोचा—एक आदमी प्रत्येक-बुद्ध का
वेष पहनकर हाथियों की कतार के सिरे पर रहता है। कहीं वही तो नहीं
मारता है ? उसका पता लगाऊँगा। एक दिन हाथियों को आगेकर स्वयं
पीछे पीछे चला। वह आदमी बोधिसत्त्व को देखते ही शस्त्र लेकर कूदा।
बोधिसत्त्व ने रुक कर खड़े हो, उसे ज़मीन पर गिरा कुचल कर मार डालने
के लिए सूण्ड उठाई। (लेकिन) उसके पहने काषाय वस्त्रों को देख सोचा—
इस अर्हत्-ध्वजा का मुझे आदर करना चाहिए। उसने सूण्ड लपेट कर 'भो
पुरुष ! यह अर्हत् ध्वजा तेरे योग्य नहीं है। तू इसे क्यों धारण करता है ?'
कहते हुए यह गाथाएँ कही—
अनिक्कसावो कासावं यो वत्थं परिदहेस्सति,
अपेतो दमसच्चेन न सो कासावमरहति ॥
कासाय ] ३७७
यो च वन्तकसावस्स सीलेसु सुसमाहितो,
उपेतो दमसच्चेन स वे कासावमरहति¹ ॥
[जो अपने मन को स्वच्छ किए बिना काषाय-वस्त्र को धारण करता है,
सत्य और संयम से रहित वह व्यक्ति काषाय-वस्त्र का अधिकारी नहीं।
जिसने अपने मन के मैल को दूर कर दिया है, जो सदाचारी है, सत्य
और संयम से युक्त वह व्यक्ति ही काषाय-वस्त्र का अधिकारी है।]
अनिक्कसावो, कसाव (=मैल) कहते हैं राग को, द्वेष को, मूढ़ता को,
म्रक्ष (=दूसरे के गुणों को मारना) को, प्लास (=अपनी दूसरे गुणी के साथ
तुलना करना) को, ईर्षा को, मात्सर्य्य को, माया को, शठता को, अकड को,
स्पर्द्धा को, मान को, अतिमान को, मद को, प्रमाद को—सभी अकुशल धर्मों
को, सभी दुश्चरित्तों को, संसार के सभी डेढ हज़ार बन्धन क्लेशों को। वे
जिस आदमी के प्रहीण नहीं हुए, जिसके (चित्त-) संतान से नहीं निकले, नहीं
उखड़े, वह आदमी अनिक्कसावो। कासाव, काषाय रस (रंग) पी हुई अर्हत्-
ध्वजा। यो वत्थं परिदहेस्सति, जो ऐसा होकर इस प्रकार का वस्त्र धारण
करेगा, पहनेगा। अपेतो दमसच्चेन, इन्द्रिय दमन नामक संयम से तथा निर्वाण
नामक परमार्थ-सत्य से दूर। अथवा अपादान (-विभक्ति) के अर्थ में कर्ण;
मतलब हुआ इस संयम-सत्य से दूर। सत्य का मतलब यहाँ वाणी का सत्य
और चार (आर्य-) सत्य भी हैं। न सो कासावमरहति, वह आदमी कासाव-
रहित न होने से काषाय रंग की अर्हंत ध्वजा का अधिकारी नहीं। वह इसके
योग्य नहीं। यो च वन्तकसावस्स, जो आदमी उक्त प्रकार के कासाव से
मुक्त होने के कारण काषाय-रहित है। सीलेसु सुसमाहितो, मार्ग-शील तथा
फल शील में सम्यक् स्थित, लाकर स्थापित कर दिए की तरह उनमें प्रतिष्ठित,
उन शीलों से युक्त के लिए यह प्रयोग है। उपेतो, सम्पन्न, युक्त। दमसच्चेन,
उक्त प्रकार के दमन से तथा सत्य से। स वे कासावमरहति, वह इस
प्रकार का आदमी ही इस काषायवर्ण की अर्हत्ध्वजा का अधिकारी है।
¹ धम्म पद (१/९,१०)