सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

कासाय ] ३७७
यो च वन्तकसावस्स सीलेसु सुसमाहितो,
उपेतो दमसच्चेन स वे कासावमरहति¹ ॥
[जो अपने मन को स्वच्छ किए बिना काषाय-वस्त्र को धारण करता है,
सत्य और संयम से रहित वह व्यक्ति काषाय-वस्त्र का अधिकारी नहीं।
जिसने अपने मन के मैल को दूर कर दिया है, जो सदाचारी है, सत्य
और संयम से युक्त वह व्यक्ति ही काषाय-वस्त्र का अधिकारी है।]
अनिक्कसावो, कसाव (=मैल) कहते हैं राग को, द्वेष को, मूढ़ता को,
म्रक्ष (=दूसरे के गुणों को मारना) को, प्लास (=अपनी दूसरे गुणी के साथ
तुलना करना) को, ईर्षा को, मात्सर्य्य को, माया को, शठता को, अकड को,
स्पर्द्धा को, मान को, अतिमान को, मद को, प्रमाद को—सभी अकुशल धर्मों
को, सभी दुश्चरित्तों को, संसार के सभी डेढ हज़ार बन्धन क्लेशों को। वे
जिस आदमी के प्रहीण नहीं हुए, जिसके (चित्त-) संतान से नहीं निकले, नहीं
उखड़े, वह आदमी अनिक्कसावो। कासाव, काषाय रस (रंग) पी हुई अर्हत्-
ध्वजा। यो वत्थं परिदहेस्सति, जो ऐसा होकर इस प्रकार का वस्त्र धारण
करेगा, पहनेगा। अपेतो दमसच्चेन, इन्द्रिय दमन नामक संयम से तथा निर्वाण
नामक परमार्थ-सत्य से दूर। अथवा अपादान (-विभक्ति) के अर्थ में कर्ण;
मतलब हुआ इस संयम-सत्य से दूर। सत्य का मतलब यहाँ वाणी का सत्य
और चार (आर्य-) सत्य भी हैं। न सो कासावमरहति, वह आदमी कासाव-
रहित न होने से काषाय रंग की अर्हंत ध्वजा का अधिकारी नहीं। वह इसके
योग्य नहीं। यो च वन्तकसावस्स, जो आदमी उक्त प्रकार के कासाव से
मुक्त होने के कारण काषाय-रहित है। सीलेसु सुसमाहितो, मार्ग-शील तथा
फल शील में सम्यक् स्थित, लाकर स्थापित कर दिए की तरह उनमें प्रतिष्ठित,
उन शीलों से युक्त के लिए यह प्रयोग है। उपेतो, सम्पन्न, युक्त। दमसच्चेन,
उक्त प्रकार के दमन से तथा सत्य से। स वे कासावमरहति, वह इस
प्रकार का आदमी ही इस काषायवर्ण की अर्हत्ध्वजा का अधिकारी है।
¹ धम्म पद (१/९,१०)