जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
आगे चार आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो
गुण ] १६५
प्राप्त करते हुए अन्त में दसो सञ्योजनो का नाश होने पर पैदा होने के कारण
सर्वसञ्योजनक्षय स्वरूप कहे जाने वाले अर्हत्त्व को प्राप्त करता है।
क्योकि निर्वाण प्राप्त होने पर सभी सञ्योजनो का क्षय हो जाता है, इस लिए
उसे भी सञ्योजनक्षय ही कहा जा सकता है। इस लिए यह अर्थ हुआ कि
निर्वाण कहे जाने वाले सभी सञ्योजनो के क्षय को प्राप्त करता है।
इस प्रकार भगवान् ने अमृतमहानिर्वाण को धर्मोपदेश में मुख्य स्थान दे
आगे चार आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो
का प्रकाशन समाप्त होने पर हिम्मत-हारा भिक्षु अर्हत्व पद लाभी हुआ।
उस समय माता महामाया, पिता शुद्धोदन महाराजा था। राज्य लेकर
देने वाला यह हिम्मतहारा भिक्षु था। हाथी का पिता सारिपुत्र। अलीनचित्त
कुमार तो मैं ही था।
१५७. गुण जातक
"येन काम पणामेति " यह (उपदेश) शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय आनन्द स्थविर को एक हजार वस्त्र मिलने के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा
आनन्द स्थविर की कोशल-नरेश के महल में धर्मोपदेश करने की कथा
पहले महासार जातक¹ में आ ही गई है।
जिस समय स्थविर राजा के महल में धर्मोपदेश दे रहे थे राजा के लिए
¹ महासार जातक (६२)
गुण ] १६७
"पुराने उत्तरासंग का क्या करेंगे ?"
"अन्तरवासक¹ बना लेंगे।"
"पुराने अन्तरवासक का क्या करेंगे ?"
"बिछावन बना लेंगे।"
"पुराने बिछौने का क्या करेंगे ?"
"जमीन पर बिछा लेंगे।"
"जमीन पर जो पहले बिछाते थे, उसका क्या करेंगे ?"
"पाँव-झाड़ने का काम लेंगे।"
"पाँव झाड़ने के पुराने कपड़े का क्या करेंगे ?"
"महाराज ! जो श्रद्धापूर्वक दिया गया है, वह फेंका नहीं जा सकता ।
इस लिए पाँव झाड़ने के पुराने कपडे को कुल्हाडी से कूटकर मिट्टी में मिलाकर
शयनासन की जगहो पर मिट्टी का लेप करेंगे।"
"भन्ते ! आपको दिया हुआ वस्त्र पाँव झाडने का कपडा बनने पर भी
फेका नहीं जा सकता ?"
"महाराज ! हाँ, हमें दिया फेंका नही जा सकता । उपयोग में ही
लाया जाता है।"
राजा ने सन्तुष्ट हो प्रसन्नता के मारे घर पर रक्खे दूसरे पाँच सौ वस्त्र
भी मँगवा कर स्थविर को दिए । स्थविर ने दान का अनुमोदन किया । उसे
सुन स्थविर को प्रणाम कर राजा स्थविर की प्रदक्षिणा कर चला गया ।
स्थविर ने जो पाँच सौ चीवर पहले मिले थे वह उन भिक्षुओं को बाँट
दिए जिनके चीवर पुराने हो गए थे ।
स्थविर के पाँच सौ शिष्य थे । उनमें एक छोटी आयु का भिक्षु स्थविर की
बहुत सेवा करता था । परिवेण में झाडू लगाता । पीने और काम में लाने
का पानी लाकर उपस्थित करता । दातुन लाकर देता । मुख धोने तथा
स्नान करने के लिए जल देता । पाखाने अग्नि-शाला तथा सोने-बैठने के
स्थान को ठीक-ठाक करके रखता । हाथ-पैर दबाना तथा पीठ मलना आदि
¹ नीचे पहनने का चीवर, जैसे धोती ।
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करता। स्थविर ने यह सोच कि इसने मेरा बडा उपकार किया है पीछे मिले
सब वस्त्र उसी को देना उचित समझ दे डाले। उसने भी वह सब वस्त्र बांट
कर अपने गुरु-भाइयो को दिए।
वे सभी भिक्षु जिन्हें वस्त्र मिला वस्त्र के टुकडे टुकडे कर उन्हें रज कर्णिकार
पुष्प के सदृश काषाय वस्त्र पहन शास्ता के पास गए। वहां प्रणाम कर एक
ओर बैठे भिक्षु कहने लगे-
"भन्ते ! क्या श्रोतापन्न आर्य-श्रावक भी मुंह देखकर दान देते है ?"
"भिक्षुओ, आर्य-श्रावक मुंह देखकर दान नही देते।"
"भन्ते ! हमारे उपाध्याय धर्म-भण्डागारिक स्थविर ने हजार हजार की
कीमत के पांच सौ वस्त्र एक ही छोटी आयु के भिक्षु को दे दिए। उसने जो
उसे मिले बांट कर हमे दिए।"
"भिक्षुओ, आनन्द मुख देखकर दान नही देता। उस भिक्षु ने इसकी बहुत
सेवा की। उसने अपने उपकार का प्रत्युपकार करने के विचार से गुणवान होने
के ख्याल से, उचित होने से सोचा कि उपकारी का प्रत्युपकार करना चाहिए,
और इसी लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए दिए। पुराने पण्डितों ने
भी अपना उपकार करने वाले का बदले मे उपकार किया है।" उनके प्रार्थना
करने पर पूर्व-जन्म की बात कही -
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
सिंह की योनि मे पैदा हो पर्वत-गुफा मे रहते थे।
उन्होने एक दिन गुफा से निकल पर्वत के नीचे की ओर देखा। उस पर्वत
के चारो ओर बडा भारी तालाब था। उस के एक (तरफ) ऊंची जगह पर
कडे दलदल के ऊपर कोमल हरी घास उगी थी। खरगोश, हरिण, और हलके
मृग उसके ऊपर विचर कर उसे खाते। उस दिन भी एक मृग उन तिनकों को
खाता हुआ घूम रहा था। सिंह उस मृग को पकडने के लिए पर्वत पर से उछल
कर मृग की तरफ कूदा ! मृग मरने के भय से डरकर चिल्लाता हुआ भाग
गया। सिंह वेग को न रोक सकने के कारण दलदल पर गिरकर नीचे चला
गया। उलट न आ सकने के कारण चारो पैर खंभे की तरह हो गए। उसे एक
गुण ] १६६
सप्ताह तक वही निराहार खडा रहना पडा।
एक सियार शिकार खोज रहा था। उसे देख भय से भागा। सिंह ने
उसे बुलाकर कहा—"भो ! सियार ! भाग मत। मै दलदल में फँसा हूँ।
मेरे जीवन की रक्षा कर।" सियार उस के पास जाकर बोला—"मै तो तुझे
निकालूँ, लेकिन डर लगता है कि तू निकलकर मुझे खा न जाए।
"डर मत। मै तुझे नही खाऊँगा। तेरा बडा उपकार करूँगा। मुझे
किसी उपाय से निकाल।"
सियार ने उससे प्रतिज्ञा करवा चारो पैरो के इर्द-गिर्द से दलदल हटा
चारो पैरो से चार नालियाँ पानी की ओर बना दीं। पानी ने घुस कर गारे को
नरम कर दिया।
उसी समय सियार ने सिंह के पेट के नीचे घुस कर चिल्लाया—
स्वामी ! जोर लगाएँ। स्वय सिंह के पेट में सिर से टक्कर लगाई।
सिंह जोर लगाने से गारे के ऊपर आया और कूद कर स्थल पर जा खडा
हुआ।
थोडी देर विश्राम कर, तालाब में उतर गारे को धो, स्नान कर सिंह ने
एक भैंसे का वध किया। उसे दाढो से चीर उसका मास उधेड सियार के आगे
रख कहा—'सौम्य ! ले खा। सियार के खा चुकने पर अपने खाया। सियार
ने एक मास-पेशी मुंह में ली।
शेर ने पूछा—"सौम्य ! यह किसके लिए ?"
सियार बोला—"तुम्हारी दासी है। यह उसके लिए।"
सिंह बोला—'ले ले।' स्वय भी सिंहनी के लिए मास लेकर उसने सियार
से कहा—"सौम्य ! आ अपने पर्वत के शिखर पर जाकर वहाँ से सखि
के निवास स्थान पर जाएँगे।" वहाँ पहुँच, मास खिला चुकने पर उसने सियार
और सियारनी को आश्वासन दिया—अब से मैं तुम्हारी देख-भाल करूँगा।
वह उन्हें अपन निवास स्थान पर ले गया। वहाँ गुफा के द्वार पर ही दूसरी
गुफा में बसाया।
उसके बाद से सिंह सिंहनी और सियारनी को छोड सियार के साथ शिकार
के लिए जाता। वहाँ नाना पशुओ को मार कर दोनो वही खाते। सिंहनी
और सियारनी को भी ला कर देते। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा।
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सिंहनी ने तथा सियारनी ने भी दो दो पुत्रो को जन्म दिया। वे सब इकट्ठे
रहने लगे।
एक दिन सिंहनी के मन में आया—यह सिंह सियार को, सियारनी को,
तथा उसके बच्चो को बहुत प्यार करता है। इसका सियारनी से सम्बन्ध अवश्य
होगा। इसी लिए उससे स्नेह करता है। मैं इसे कष्ट देकर, डराकर भगाऊँ।
जिस समय सिंह सियार को साथ ले शिकार के लिए जाता सिंहनी सियारनी
को डराती, धमकाती—तू यहाँ क्यो रहती है? यहाँ से भागती क्यो नही?
उसके बच्चे भी सियारनी के बच्चो को वैसे ही तग करते, धमकाते।
सियारनी ने सियार से सब हाल कहा और बोली—"पता नही, सिंहनी
सिंह के ही कहने से ऐसा व्यवहार करती है। हम यहाँ बहुत दिन रह चुके।
वह हमारी जान भी ले सकता है। अपने निवास स्थान पर ही चले।"
सियार ने उसकी बात सुन सिंह के पास आकर कहा—
"स्वामी ! हम तुम्हारे पास बहुत समय रहे। अधिक देर तक
समीप रहने वाले अप्रिय हो जाते हैं। हमारे शिकार के लिए चले जाने पर
सिंहनी सियारनी को तग करती है। उसे डराती है कि यहाँ क्यो रहती है?
यहाँ से भाग। सिंह-बच्चे भी सियार-बच्चो को डराते धमकाते है। यदि किसी
को किसी का अपने पास रहना अच्छा न लगे तो 'जाओ' कह कर उसे निकाल
देना चाहिए, तग करने की क्या जरूरत है।"
इतना कह यह पहली गाथा कही—
येन काम पणामेति धम्मो बलवत मिगो!
उन्नदन्ति विजानाहि जात सरणतो भयं ॥
[ हे सिंह ! बलवान् का यही स्वभाव है कि जहाँ चाहता है भगा देता है।
हे उन्नत दाँत वाले (सिंह) ! यह जान ले कि शरण-स्थल से ही भय पैदा हो
गया।]
येन कामं पणामेति धम्मो बलवतं बलवान अथवा ऐश्वर्यशाली अपने सेवक
को जिस दिशा में चाहता है उस दिशा में भगा देता है, निकाल देता है, यह
बलवानो का धर्म है। यह ऐश्वर्य-शालियो का स्वभाव है। यही परम्परा है।
गुण ] १७१
इस लिए यदि हमारा रहना अच्छा न लगता हो, तो हमें सीधा निकाल दे।
कष्ट देने से क्या लाभ ? —यही अर्थ प्रकट करने के लिए यह कहा। मिगो,
सिंह को सम्बोधन करता है। वह मृगराज होने से मृगो का मालिक है, इसी
लिए मिगी। उन्नदन्ति—यह भी उसी का सम्बोधन है। ऊँचे दांतो वाला
होने से उन्नदन्ति। उन्नतदन्ति, यह भी पाठ है। विजानाहि, यही ऐश्वर्य-
शालियो का स्वभाव है, यह जान लें। जात सरणतो भय, हमें तुमसे प्रतिष्ठा
मिली, इससे तुम्ही हमारे शरण। अब तुम्हारे ही पास से भय पैदा हो गया।
इस लिए हम अपने निवास-स्थान को जायेंगे।
दूसरा अर्थ—मिगी (सिंहनी) उन्नदन्ती मेरे बच्चो और स्त्री को ताडती
है। येन काम पणमेति, जिस जिस तरह से चाहता है उस उस तरह से निकाल
देता है, प्रर्वतित करता है तग करता है—इसे तू जान ले। इसमे हम क्या कर
सकते हैं ? धम्मो बलवत, यह बलवानो का स्वभाव है। हम जाते हैं।
किस लिए ? क्योकि जात सरणतो भय ।
उसकी बात सुनकर सिंह ने सिंहनी से पूछा—"भद्रे ! अमुक समय मे
शिकार के लिए गया था और सातवें दिन इस सियार और सियारनी के साथ
लोटा था, इसकी कुछ याद है ?"
"हाँ, याद है।"
'मेरे एक सप्ताह तक न आ सकने का कारण जानती है।"
"स्वामी ! नही जानती हूँ।"
'भद्रे ! मैं एक मृग को पकडने जाकर चूक कर दलदल में फँस गया।
उसमें से न निकल सकने के कारण सप्ताह भर भूखा खडा रहा। अरे, इस सियार
ने मेरे प्राण बचाए। यह मुझे जीवन-दान देने वाला मित्र है। जो मित्र का
धर्म पूरा कर सके वह मित्र दुर्बल नही माना जाता। इस के बाद मेरे मित्र,
मेरी सखी तथा उसके बच्चो का इस प्रकार अपमान न करना।"
इतना कह सिंह ने दूसरी गाथा कही—
अपिचेपि दुब्बलो मित्तो मित्तधम्मेसु तिट्ठति
सो जातको च बन्धू च सो मित्तो सो च मे सखा,
दाठिनि ! मातिमिन्र्ञत्थो सिगालो मम पाणदो ॥