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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages
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काण्ड ] स्वरोदय-विज्ञान ११३


नाम भगवान् अनन्त कहा गया है। जो शिलामूर्ति सबसे सुन्दर हो, उसका पूजन करना चाहिये, ऐसी सुदर्शन मूर्तियाँ पूजित होनेपर सभी कामनाओंको पूर्ण करती हैं।

जहाँ शालग्राम और द्वारका-शिला रहती हैं और इन दोनों शिलाओंका जहाँ संगम है, वहाँ मुक्ति रहती है, इसमें संशय नहीं है—

शालग्रामशिला यत्र देवो द्वारवतीभवः।
उभयोः संगमो यत्र तत्र मुक्तिर्न संशयः॥

<div align="right">(६६। ५)</div>

हे शंकर! शालग्राम, द्वारका, नैमिष, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र, गङ्गा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा महाकालका अधिष्ठान उज्जयिनी—ये सभी तीर्थ सब प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।*

प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, विषु, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकार, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन एवं अक्षय—ये साठ संवत्सर अपने नामके अनुसार शुभ और अशुभ फल प्रदान करनेवाले हैं। (अध्याय ६६)


स्वरोदय-विज्ञान

स्वरके उदयसे कार्योंके शुभ और अशुभका ज्ञान होता है। शरीरमें बहुत प्रकारकी नाड़ियोंका विस्तार है। नाभि-प्रदेशके नीचे जो कन्दस्थान अर्थात् मूलाधार है, वहींसे उन नाड़ियोंका अङ्कुरण होकर सम्पूर्ण शरीरमें विस्तार होता है। बहत्तर हजार नाडियाँ नाभिके मध्यमें चक्राकार अवस्थित रहती हैं। उन नाड़ियोंमें वामा, दक्षिणा और मध्यमा नामक तीन श्रेष्ठ नाडियाँ हैं। (उन्हींको क्रमशः—इडा, पिंगला और सुषुम्णा कहा जाता है।) इनमें वामा सोमात्मिका, दक्षिणा सूर्यके समान तथा मध्यमा नाडी अग्निके समान फलदायिनी एवं कालरूपिणी है।

वामा नाडी अमृतरूपा है, वह जगत्को आप्यायित करती रहती है। दक्षिणा नाडी अपने रौद्रगुणसे सदैव जगत्का शोषण करती रहती है। जब शरीरमें इन दोनोंका एक साथ प्रवाह होता है, उस समय समस्त कार्योंका विनाश करनेवाली मृत्यु आ पहुँचती है।

यात्रादिके लिये प्रस्थानकालमें वामा तथा प्रवेशके अवसरपर दक्षिणा नाडीप्रवाहको शुभ माना गया है। इडा अर्थात् वामाके श्वास-प्रवाह-कालमें ऐसा सौम्य शुभकारी कार्य करना चाहिये, जो चन्द्रके समान जगत्के लिये भी शुभकारी हो तथा पिंगला अर्थात् दक्षिणा नाडीमें प्राणवायुके प्रवाहित होनेके समय सूर्यके समान तेजस्वी क्रूर कार्य करना चाहिये। यात्रामें, सभी कार्योंमें तथा विषको दूर करनेमें इडा नाडीका चलना अच्छा होता है। भोजन, मैथुन, युद्धारम्भमें, पिंगला नाडी सिद्धिदायक


* शालग्रामो द्वारका च नैमिषं पुष्करं गया। वाराणसी प्रयागश्च कुरुक्षेत्रं च सूकरम्॥
गङ्गा च नर्मदा चैव चन्द्रभागा सरस्वती। पुरुषोत्तमो महाकालस्तीर्थान्येतानि शङ्कर॥
सर्वपापहराण्येव भुक्तिमुक्तिप्रदानि वै।

<div align="right">॥ (६६। ६–८)</div>

५३-मरकतमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

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११४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

होती है। उच्चाटनादि अभिचार कर्मोंमें भी पिंगला नाडीका चलना उत्तम होता है।

मैथुन, संग्राम और भोजन करते समय राजाओंको पिंगला नाडीके श्वास-प्रवाहपर ध्यान रखना चाहिये। शुभ कार्योंके सम्पादनमें, यात्रामें, विषापनोदनमें तथा शान्ति एवं मुक्तिकी सिद्धिमें राजाओंको इडा नाडीकी गतिपर विचार करना चाहिये।

पिंगला एवं इडा नामक दोनों नाडियाँ चल रही हों तो क्रूर तथा सौम्य दोनों प्रकारका कार्य न करे। विद्वान्‌को यह समय विषके समान मानना चाहिये।

सौम्यादि शुभ कार्योंमें, लाभादिके कर्मोंमें, विजयके लिये, जीवनके लिये तथा गमनागमनके लिये वामा नाडी सर्वत्र प्रशस्त मानी जाती है। घात-प्रतिघात, युद्धादिके क्रूर कार्य, भोजन और स्त्री-सहवासमें दक्षिणा नाडी प्रशस्त होती है। प्रवेश तथा क्षुद्र-कार्योंमें भी दक्षिणा नाडी श्रेष्ठ होती है।

शुभ-अशुभ, लाभ-हानि, जय-पराजय तथा जीवन और मृत्युके विषयमें प्रश्न करनेपर यदि प्रश्नकर्ताकी उस समय मध्यमा नाडी चल रही हो तो सिद्धि प्राप्त नहीं होती और यदि वामा तथा दक्षिणा नाडीके चलते समय प्रश्न हो तो निश्चित ही सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है।

इसी प्रकार प्रश्नकर्ताके स्वरमें उदय तथा प्रश्नकर्ताकी अवस्थिति आदिपर विचार करनेसे भी कार्यकी सिद्धि-असिद्धिका निर्णय तथा शुभ-अशुभकालका ज्ञान किया जाता है। इसके लिये स्वरोदय-विज्ञानकी जानकारी अपेक्षित होती है*।

(अध्याय ६७)


रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा

सूतजीने कहा— अब मैं रत्नपरीक्षाका वर्णन करता हूँ। प्राचीनकालमें बल नामक एक असुर था। उसने इन्द्रादि सभी देवोंको पराजित कर दिया था। उसको जीतनेमें देवगण समर्थ नहीं थे। अतः असमर्थ देवोंने एक यज्ञ करनेका विचार किया और उस असुरके सन्निकट पहुँचकर उससे यज्ञपशु बननेकी अभ्यर्थना की। वचनबद्ध बलासुरने अपना शरीर उन देवोंको दानमें दे दिया। अतः अपने वाग्वज्रसे वह पशुवत् मारा गया।

वचनपर अडिग, पशु-शरीरवाले उस असुरने संसारके कल्याणार्थ एवं देवताओंकी हितकामनाके कारण यज्ञमें शरीरका परित्याग किया था, उस विशुद्ध कर्मको करनेसे उसका शरीर भी विशुद्ध सत्त्वगुण सम्पन्न हो उठा था। अतः उसके शरीरके सभी अङ्ग रत्नोंके बीजके रूपमें परिणत हो गये।

इस प्रकार रत्नोंकी उत्पत्ति होनेपर देवता, यक्ष, सिद्ध तथा नागोंका उस समय बहुत बड़ा उपकार हुआ। जब वे सभी विमानके द्वारा उसके शरीरको आकाशमार्गसे ले जाने लगे तो यात्रावेगके कारण उसका शरीर स्वतः खण्ड-खण्ड होकर पृथिवीपर इधर-उधर गिरने लगा।

बलासुरके शरीरके अङ्ग खण्ड-खण्ड होकर समुद्र, नदी, पर्वत, वन अथवा जहाँ-कहीं रंचमात्र भी गिरे, वहाँ रत्नोंकी खान बन गयी और उन स्थानोंकी प्रसिद्धि उन्हीं रत्नोंके नामपर हो गयी। पृथिवीकी उन खानोंमें विविध प्रकारके रत्न उत्पन्न होने लगे; जो राक्षस, विष, सर्प, व्याधि तथा विविध प्रकारके पापोंको नष्ट करनेमें समर्थ थे।


* यहाँ स्वरोदय-विज्ञानका दिग्दर्शनमात्र किया गया है। विस्तृत जानकारी, प्रमाण एवं तथ्यातथ्यके स्पष्टीकरणके लिये तद्विषयक ग्रन्थोंका अवलोकन करना चाहिये।

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काण्ड ] रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा ११५


रत्नोंके विविध प्रकारोंको वज्र (हीरा), मुक्तामणि, पद्मराग, मरकत, इन्द्रनील, वैदूर्य, पुष्पराग, कर्केतन, पुलक, रुधिर, स्फटिक तथा प्रवालादि कहा गया है। पारदर्शी विद्वज्जनोंने उनका यह नामकरण तथा संग्रह यथायोग्य गुणोंको दृष्टिमें रखकर किया है।

अतः रत्नपारखी विद्वानोंको सर्वप्रथम रत्नोंके आकार, वर्ण, गुण, दोष, फल, परीक्षा तथा मूल्य आदिका ज्ञान तत्सम्बन्धित सभी शास्त्रोंके द्वारा विधिवत् प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि कुत्सित लग्न या अनेक कुयोगोंसे बाधित अशुभ दिनोंमें जिन रत्नोंकी उत्पत्ति होती है, वे सभी दोषपूर्ण होकर अपनी गुण-क्षमताको नष्ट करते हैं।

ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह परीक्षासे किये गये अत्यन्त शुद्ध रत्नोंको धारण करे अथवा उनका संग्रह करे।

जो रत्नशास्त्रोंके ज्ञाता, कुशल, रत्नसंग्रही तथा परीक्षण-कार्यमें दक्ष होते हैं, उन्हींको रत्नोंके मूल्य और मात्राको जाननेवाले कहा गया है। वज्र (हीरा)-को महाप्रभावशाली कहा गया है, इसलिये सर्वप्रथम उसीकी परीक्षाको बतायेंगे।

वज्रायुध इन्द्रपर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उस बल नामक असुरके अस्थिभाग पृथिवीके जिन-जिन स्थानोंमें गिरे, वे हीरे बनकर उन स्थानोंमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले हो गये।

हिमाञ्चल, मातंग, सौराष्ट्र, पौण्ड्र, कलिंग, कोसल, वेण्वातट तथा सौवीर नामक आठ भूभाग हीरोंके क्षेत्र हैं। हिमालयसे उत्पन्न हीरे ताम्रवर्ण, वेणुकाके तटसे प्राप्त चन्द्रमाके समान श्वेत, सौवीर देशवाले नीलकमल तथा कृष्णमेघके समान, सौराष्ट्रप्रान्तीय ताम्रवर्ण एवं कलिंगदेशीय सोनेके समान आभावाले होते हैं। इसी प्रकार कोसल देशके हीरोंका वर्ण पीत, पुण्ड्रदेशीय श्याम तथा मतंगक्षेत्रवाले हलके पीतवर्णके होते हैं।

यदि इस संसारमें कहींपर भी अत्यन्त क्षुद्र वर्ण, पार्श्वभागोंमें भली प्रकारसे परिलक्षित होनेवाली रेखा, बिन्दु कालिमा, काकपदक<sup>१</sup> और त्रास<sup>२</sup> दोषसे रहित, परमाणुकी भाँति अत्यन्त लघु तथा तीक्ष्ण धारसे युक्त जो भी वज्र अर्थात् हीरा दिखायी देता है, उसमें निश्चित ही देवताका वास समझना चाहिये।

रंगके अनुसार हीरकोंमें देवताओंके विग्रहोंका निश्चय किया गया है। वर्णको ध्यानमें रखकर ही हीरोंका विभाजन करना चाहिये। हरित, श्वेत, पीत, पिंगल, श्याम तथा ताम्रवर्णके हीरे स्वभावतः सुन्दर होते हैं। उन हीरोंमें क्रमानुसार विष्णु, वरुण, इन्द्र, अग्नि, यम और मरुत्-देव प्रतिष्ठित रहते हैं।

ब्राह्मणके लिये शङ्ख, कुमुद अथवा स्फटिकके समान शुभ्रवर्णका हीरा प्रशस्त होता है। क्षत्रियके लिये शश (चन्द्रलाञ्छनके समान वर्णवाला), बभ्रु (पिंगल—भूरे वर्णके धातु विशेषके समान वर्णवाला), विलोचन<sup>३</sup> (आँखकी ताराके समान वर्णवाला), वैश्यवर्णके निमित्त कान्त (कुंकुम) अथवा कदलीदलके समान आभावाला तथा शूद्रवर्णके लिये धौत (चाँदी)-के समान अथवा तलवारके सदृश हीरा प्रशस्त है।

विद्वानोंने राजाओंके योग्य दो प्रकारके हीरोंको उत्तम माना है, जो अन्य लोगोंके लिये प्रशस्त नहीं होते हैं। जो हीरा जवावर्ण तथा प्रवालके समान रक्तवर्ण अथवा हल्दी-रसके सदृश पीतवर्णका होता


१-काकके पदके समान आभारविशेषसे युक्त।
२-त्रास—मणिके दोषविशेषको त्रास कहते हैं।
३-विलोचन (आँख) प्रसंगके अनुसार आँखकी तारा।

५४-इन्द्रनीलमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

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११६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

है, वह राजाओंके लिये लाभप्रद है। सभी वर्णोंका स्वामी होनेके कारण अथवा समस्त वर्णोंके गुणोंको अपनेमें समाविष्ट करनेके उद्देश्यसे राजाओंको सभीके कल्याणकी इच्छासे उक्त दो प्रकारके हीरोंको धारण करना चाहिये। ऐसे हीरोंको धारण करनेका अधिकार अन्यके लिये किसी भी प्रकारसे नहीं है।

जिस प्रकार लोकमें निम्न और उच्च वर्णका वर्णसांकर्य दोषावह एवं दुःखदायी होता है, रत्नोंका वर्णसांकर्य उससे भी अधिक दुःखदायी होता है।

केवल वर्णमात्रको देखकर ही विद्वानोंको रत्नका संचय नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो गुणवान् रत्न होता है, वही गुण और सम्पत्तिकी विभूति होता है, इसके विपरीत गुणहीन रत्न कष्टका हेतु होता है। जिस हीरेका एक भी शृंग टूटा हुआ अथवा छिन्न-भिन्न दिखायी दे तो गुणवान् होनेपर भी धनार्थीजनोंको उसे अपने घरमें नहीं रखना चाहिये।

अग्निके समान स्फुटित, विशीर्ण शृंगभागसे युक्त, मलिन वर्णवाले तथा मध्यमें विन्दुओंसें चिह्नित हीरकको धारण करनेपर इन्द्र भी श्रीहीन हो जाते हैं। ऐसे हीरेके संग्रह करनेकी लालसा नहीं करनी चाहिये। जिस हीरेका एक भाग अस्त्र-शस्त्रादिसे विदीर्ण क्षत-विक्षत शरीरकी आभाको प्राप्त हो तथा वह रक्तवर्णसे चित्रित हो तो वैसा हीरा इच्छा-मृत्युसे सम्पन्न शक्तिशाली व्यक्तिकी भी शीघ्र मृत्युको रोक नहीं सकता है। ऐसे हीरेको धारण नहीं करना चाहिये।

षट्कोण, अष्टकोण, द्वादशकोण, षट्पार्श्व, अष्टपार्श्व, द्वादशपार्श्व, षड्धारा, अष्टधारा, द्वादशधारा, उत्तुंग, सम एवं तीक्ष्णाग्र भाग हीरेके खानिक अर्थात् प्रकृतिगत गुण हैं।

जो हीरा षट्कोण, विशुद्ध, निर्मल, तीक्ष्ण धारवाला लघु, सुन्दर पार्श्वभागसे युक्त और निर्दोष है तथा इन्द्रायुध वज्रके समान स्फुरित अपनी प्रभाको विकीर्ण करनेमें समर्थ हो तो अन्तरिक्ष भागमें स्थित वह हीरा इस पृथिवीलोकमें सुलभ नहीं है।

जो मनुष्य तीक्ष्णाग्र, निर्मल तथा दोषशून्य हीरेको धारण करता है, वह जीवनपर्यन्त प्रतिदिन स्त्री, सम्पत्ति, पुत्र, धन-धान्य और गवाधिक पशुओंकी श्रीवृद्धिको प्राप्त करता है। सर्प, विष, व्याधि, अग्नि, जल तथा तस्करादिक भय एवं अभिचार-मन्त्रोंके उच्चाटनादिक प्रयोग उसके सन्निकट आनेके पूर्व दूरसे ही प्रत्यागमित हो जाते हैं।

यदि हीरा सभी दोषोंसे रहित तथा भारमें बीस तण्डुलके बराबर हो तो मणिशास्त्रके पण्डितोंने उसका मूल्य अन्य हीरेकी अपेक्षा द्विगुण अधिक कहा है। पूर्वोक्त परिमाणमें तीन भाग, अर्द्धभाग, चतुर्थांश, त्रयोदशांश और तीसवाँ अंश, साठवाँ अंश, अस्सीवाँ अंश, शतांश तथा सहस्त्रांश भाग न्यूनाधिक होनेपर मूल्यका निर्धारण भी उसके समान ही न्यूनाधिक होता है।

आठ गौर सरसोंके दानोंके भारके बराबर एक तण्डुलका भार होता है।

जो हीरा सभी गुणोंसे सम्पन्न होता है और जलमें डालनेपर तैरता है, वह सभी रत्नोंमें सर्वश्रेष्ठ होता है। उसीको धारण करना उचित है।

जिस हीरेमें अल्पमात्र भी स्पष्ट अथवा अस्पष्ट दोष होता है तो स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा उस हीरेको मनुष्य दशांश कम मूल्यमें ही प्राप्त कर लेता है। जिस हीरेमें छोटे अथवा बड़े अनेक दोष प्रकट रहते हैं, उस हीरेका मूल्य स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा शतांश ही माना गया है।

अलंकारके रूपमें प्रयुक्त हीरेमें यदि किसी भी प्रकारका दोष परिलक्षित होता है तो अपेक्षाकृत

५५- वैदूर्यमणिकी परीक्षा-विधि

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काण्ड ] मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि ११७


उसका मूल्य बहुत ही कम हो जाता है। यदा-कदा जो हीरा सबसे पहले गुण-सम्पत्तियोंसे परिपुष्ट माना जाता है, वही बादमें दोषयुक्त हो जाता है। राजाको ऐसे दोषपूर्ण हीरेसे बने आभूषणको धारण नहीं करना चाहिये। गुणहीन होनेपर तो मणि भी आभूषणके योग्य नहीं होती है।

पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रीके लिये सर्वगुण-सम्पन्न होनेपर भी हीरा प्रशस्त नहीं होता है। दीर्घ, चिपटा, ह्रस्व तथा अन्यान्य गुणोंसे रहित हीरेके विषयमें कुछ कहना ही नहीं, वह तो दोषपूर्ण होता ही है।

हीरेके कुशल विशेषज्ञ लौह, पुष्पराग, गोमेद, वैदूर्य, स्फटिक एवं विविध प्रकारके काँचोंसे हीरकके प्रतिरूपोंका निर्माण कर लेते हैं। अतः विद्वानोंको कुशल परीक्षकोंसे उनकी परीक्षा करवा लेनी चाहिये।

क्षारद्रव्यके द्वारा, उल्लेखन-विधिसे एवं शाण-प्रयोगसे हीरोंका परीक्षण करना चाहिये। पृथिवीमें जितने भी रत्न हैं अथवा लौहादिक जितनी अन्य धातुएँ हैं, हीरा उन सबमें चिह्नाङ्कन कर सकता है; किंतु अन्य कोई भी रत्न या धातु हीरेमें चिह्न करनेमें समर्थ नहीं है।

गुरुता समस्त रत्नोंके महत्त्वका कारण है, फिर भी रत्नशास्त्रज्ञ हीरेके विषयमें इस निर्देशके विपरीत ही कहते हैं।

पुष्परागादि जातिविशेषके रत्न दूसरी जातिके रत्नको काट सकते हैं, किंतु हीरक एवं कुरुविन्द* अपनी ही जातिके रत्नको काटनेमें सक्षम होते हैं। हीरेसे हीरा ही कट सकता है, अन्य रत्नोंसे वह हीरा काटा नहीं जा सकता है।

स्वाभाविक हीरेके अतिरिक्त हीरक तथा मुक्तादि जितने प्रकारके रत्न हैं, उनमें किसी भी रत्नकी प्रभा ऊर्ध्वगामिनी नहीं होती है। मात्र हीरा ही ऐसा रत्न है, जिसकी प्रभा ऊपरकी ओर जाती है।

यदि हीरा टूटे हुए किनारोंसे दोषयुक्त हो या विन्दु तथा रेखासे समन्वित हो अथवा विशेष वर्णसे रहित हो तो भी इन्द्रायुध-चिह्नसे अङ्कित होनेपर वह मनुष्यको धन-धान्य एवं पुत्रादिसे परिपूर्ण करता है।

जो राजा विद्युत्-तुल्य, समुज्ज्वल एवं चमकते हुए शोभा-सम्पन्न हीरेको धारण करता है, वह अपने पराक्रमसे दूसरेके प्रतापको आक्रान्त करनेमें समर्थ होता है तथा अपने समस्त सामन्तोंको वशमें रखकर वह पृथिवीका उपभोग करता है। (अध्याय ६८)


मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि

सूतजीने कहा— श्रेष्ठ हाथी, जीमूत (मेघ), वराह, शङ्ख, मत्स्य, सर्प, शुक्ति तथा बाँसमें उत्पन्न मुक्ताफलोंकी संसारमें प्रसिद्धि है; किंतु इनमें शुक्ति (सीप)-में प्रादुर्भूत मुक्ताएँ ही अधिक उपलब्ध हैं।

मुक्ताशास्त्री कहते हैं कि इन मुक्ताओंमें मात्र एक ही ऐसी मुक्ता होती है, जिसको रत्नपदपर अधिष्ठित किया जा सकता है। वह शुक्तिसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता है। यह सूचिकादि यन्त्रोंसे वेध्य होती है, शेष मुक्ताएँ अवेध्य हैं।

प्रायः बाँस, हाथी, मत्स्य, शङ्ख एवं वराहसे उत्पन्न मुक्ताएँ प्रभावहीन होती हैं; फिर भी माङ्गलिक होनेसे वे प्रशस्त मानी जाती हैं।

रत्ननिर्णायक विद्वानोंने मुक्ताओंके जिन आठ


* कुरुविन्द—माणिक्य अथवा कुरुबिल्व नामका रत्नविशेष।

५६-पुष्पराजमणिकी परीक्षा -विधि

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१९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रकारोंका वर्णन किया है, उनमें शङ्खसे उत्पन्न और हाथीसे प्राप्त होनेवाली मुक्ताको अधम कहा है।

शङ्खसे उत्पन्न मुक्ता, अपने मूल कारणके मध्यभागमें अवस्थित वर्णके समान वर्णवाली तथा परिमाणमें बृहल्लोल फलके सदृश होती है। जो मुक्ता हाथीके कुम्भस्थलसे निकलती है, वह पीतवर्णवाली एवं प्रभाविहीन होती है। जो शङ्खोद्भव मुक्ताएँ हैं, वे शार्ङ्गधनुषके तुल्य वर्णको प्राप्त पीतशङ्खोंके श्रेष्ठ गोत्रमें ही उत्पन्न होती हैं। जो गजमुक्ताएँ हैं, उनका भी जन्म विशुद्ध वंशवाले मदमत्त गजराजोंमें होता है, उन्हें मौक्तिकप्रभव अर्थात् गजमुक्ता नामसे अभिहित किया गया है। इनसे प्राप्त मुक्ता पूर्णतया पीतवर्णसे युक्त एवं प्रभाविहीन होती है।

मत्स्यसे उत्पन्न मुक्ता पाठीन मत्स्यके पीठके समान वर्णवाली, अत्यन्त सुन्दर, वृत्ताकार, लघु एवं अत्यधिक सूक्ष्म होती है। यह जलचर प्राणियोंके मुखोंमें प्राप्त होती है, उनमें भी जो मत्स्य अथाह समुद्रकी जलराशिमें विचरण करते हैं, वे इसके जनक होते हैं।

वराहके दाँतसे उत्पन्न मुक्ता उसके ही दन्ताङ्कुरोंके सदृश वर्णवाली होती है, किंतु ऐसी मुक्ता प्रदान करनेवाले विशिष्ट वराहराज कहीं किसी विशेष भूप्रदेशमें ही पाये जाते हैं।

बाँसके पर्वोंसे उत्पन्न मुक्ताएँ वर्षोपल (ओले)-के समान समुज्ज्वल वर्णकी सुन्दर शोभासे सुशोभित रहती हैं। ऐसी मुक्ताओंके जनक बाँसोंके वंश दिव्यजनोंके लिये उपभोग्य विशेष स्थानमें अङ्कुरित होते हैं। वे सार्वजनिक स्थानोंमें नहीं पाये जाते।

सर्पमुक्ता मत्स्यमुक्ताके सदृश विशुद्ध तथा वृत्ताकार होती है। स्थान-विशेषके कारण उसकी अत्यन्त उज्ज्वल शोभा होती है। इसकी कान्ति शाणपर चढ़ायी गयी तलवारकी धारके समान अत्यन्त स्वच्छ होती है। सर्पके सिरसे प्राप्त होनेवाली इस मुक्ताको अर्जित करनेवाले मनुष्य अतिशय प्रभासम्पन्न, राज्यलक्ष्मीसे युक्त तथा दुःसाध्य महान् ऐश्वर्यसम्पन्न, तेजस्वी एवं पुण्यवान् होते हैं।

रत्नोंके गुण एवं अवगुणोंको जाननेकी इच्छासे यदि रत्न-विधियोंमें पूर्ण अधिकार रखनेवाले विद्वानोंके द्वारा शुभ मुहूर्तमें प्रयत्नपूर्वक समस्त रक्षाविधिसे सम्पन्न भवनके ऊपर उस मुक्ताको स्थापित करा दिया जाय तो उस समय आकाशमें देव-दुन्दुभियोंकी ध्वनि परिव्याप्त हो उठती है। इन्द्रधनुषकी टंकार, विद्युल्लताओंके संघर्षण एवं सघन पयोधरोंकी पारस्परिक टकराहटसे अन्तरिक्ष आच्छादित हो उठता है।

जिसके कोशागारमें यह सर्पमुक्ता रहती है, उसकी मृत्यु सर्प, राक्षस, व्याधि या अन्य आभिचारिक दोषके कारण नहीं होती।

मेघसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता पृथ्वीतक आ ही नहीं पाती। देवगण आकाशमें ही उसका हरण कर लेते हैं। उस मेघमुक्ताके तेजकी दिव्य कान्तिसे अनावृत समस्त दिशाएँ आलोकित हो उठती हैं। सूर्यके समान देदीप्यमान उसका परिमण्डल देखनेमें कष्टसाध्य होता है। अग्नि, चन्द्र, नक्षत्र तथा ताराओंके तेजको तिरस्कृत करके जैसे सूर्यके कारण दिन प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार गहन अन्धकारसे भरी हुई रात्रियोंमें भी उस मेघमुक्ताका तेज दिनकी प्रभाके समान ही प्रभाको विकीर्ण करता है। विचित्र रत्नकान्तिको प्राप्त सुन्दर आभूषणको प्रशस्त बनानेके लिये जलराशिवाले चारों समुद्रोंसे इस मुक्ताका जन्म हुआ है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह जिसके पास रहती है, वह राजा होता है। उसके राज्यकी सम्पूर्ण भूमि सोनेसे परिपूर्ण होती है। कदाचित् शुभ तथा महान् कर्मविपाकसे यदि

५७- कर्केतनमणिकी परीक्षा-विधि

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काण्ड ] मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि ११९


कोई दरिद्र भी इस मेघमुक्ताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्तिके पास जबतक यह रहती है, तबतक वह शत्रुओंसे रहित सम्पूर्ण पृथिवीका उपभोग करता है।

यह मेघमणि मात्र राजाके लिये ही शुभप्रद है, ऐसा नहीं है, अपितु प्रजाओंके भाग्यसे भी इसका जन्म होता है। यह अपने चारों ओर सहस्र योजनपर्यन्त क्षेत्रमें अनर्थोंको आने नहीं देती।

दैत्यराज बलासुरके मुखसे विशीर्ण हुई दन्तपंक्ति आकाशमें फैली हुई नक्षत्रमालाके समान प्रतीत होती थी। विचित्र वर्णोंमें भी अपना विशुद्ध स्थान रखनेवाली वह दन्तावलि आकाशसे उस समुद्रकी जलराशिमें गिरी, जो पूर्णिमाके चन्द्रकी समस्त षोडशकलाओंको तिरस्कृत करनेमें समर्थ महागुणसम्पन्न मणिरत्नका निधान है। समुद्रके जलमें उसे शुक्तिमें स्थान प्राप्त हुआ। अतः वह सामुद्रिक मुक्ताका प्राचीन बीज बन गया, जिससे अन्य मुक्ताओंका उद्भव हुआ। समुद्रके जिस जल-प्रदेशमें सुन्दर रत्न मुक्तामणिके बीज गिरे, उसी प्रदेशमें वे बीज फैलकर शुक्तियोंमें स्थित होनेके कारण मुक्तामणि (मोती) हो गये। अतएव सिंहल, परलोक, सौराष्ट्र, ताम्रपर्ण, पारशव, कुबेर, पाण्ड्य, हाटक और हेमक—ये मुक्ताओंके खजाने हैं।

वर्धन, पारसीक, पाताल, लोकान्तर तथा सिंहलादिकी शुक्ति-मुक्ताएँ प्रमाण, स्थान, गुण और कान्तिकी दृष्टिसे अन्य क्षेत्रोंमें प्राप्त होनेवाली मुक्ताओंकी तुलनामें अत्यधिक हीन वर्णकी नहीं होती हैं। अतः विद्वान् व्यक्तिको उनके मूल उत्पत्ति-स्थानको लेकर चिन्तन नहीं करना चाहिये, बल्कि उनके रूप एवं प्रमाणपर ही विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता होती है। इस प्रकारकी मुक्तासे सम्बन्धित गुण-अवगुणकी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। ये सर्वत्र सब प्रकारकी आकृतियोंमें पायी जाती हैं।

शुक्तिसे उत्पन्न एक मुक्ताफलका मूल्य एक हजार तीन सौ पाँच मुद्रा होता है। आधे तोले भारवाली मुक्ताका मूल्य उक्त मूल्यकी अपेक्षा २/५ भाग कम होता है। जिस मुक्ताका भार तीन माशा अधिक हो, उसका मूल्य दो हजार मुद्रा कहा गया है।

ढाई माशा परिमाणवाली मुक्ताका मूल्य तेरह सौ मुद्रा होता है। जो मुक्ता दो माशा परिमाणकी होती है, उसका मूल्य आठ सौ मुद्रा है। जिसका परिमाण आधा माशा है, उसका मूल्य तीन सौ बीस मुद्रा है। जो मुक्ता भारमें छः गुंजाके बराबर है, पण्डितोंने उसका मूल्य दो सौ मुद्रा स्वीकार किया है। जिसका परिमाण तीन गुंजा है, वह एक सौ मुद्राकी होती है। जो मुक्ता उक्त परिमाणमें सोलहवाँ भाग है, विद्वानोंने उसको दार्विका कहा है। उसका मूल्य एक सौ दस मुद्रा होता है।

जिस मुक्ताका कथित परिमाणकी तुलनामें भार १/२० भाग होता है, उसको विद्वानोंने भवककी संज्ञा प्रदान की है। यदि वह मुक्ता गुणहीन न हो तो उसका मूल्य सत्तानबे मुद्रा होता है। जो मुक्ता उक्त स्वाभाविक परिमाणमें १/३० भागकी होती है, उसको शिक्य कहा जाता है। उसका मूल्य चालीस मुद्रा होता है। जिसका परिमाण कहे गये परिमाणकी अपेक्षा १/४०वाँ अंश हो तो उसका मूल्य तीस मुद्रा है। जो मुक्ता १/५०वाँ अंश परिमित होती है, उसे सोम कहा जाता है। उसका मूल्य बीस मुद्रा है। जो मुद्रा १/६० अंशके बराबर होती है, उसको निकरशीर्ष कहा जाता है। वह चौदह मुद्रा मूल्यकी होती है। १/८० तथा १/९० अंश परिमित मुक्ताको कूप्य नामसे अभिहित किया गया है। उनका मूल्य क्रमशः ग्यारह और नौ मुद्रा है।

५९- पुलकमणिके लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

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१२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विशुद्धताके लिये मुक्ताओंको अन्नपात्र (अर्थात् अन्न रखनेवाले मटके)-में भरे हुए जम्बीर-रसमें डालकर पकाना चाहिये। तत्पश्चात् उनकी मूल आकृतियोंको घिसकर चिक्कण एवं समुज्ज्वल आकार प्रदान करके उनमें यथाशीघ्र छेद भी कर देना चाहिये।

सर्वप्रथम पूर्णतया आर्द्र मिट्टीसे लिप्त मत्स्य पुटपाक और फिर बिडाल पुटपाकमें मुक्ताओंका पाचन करे। उसके बाद उन्हें चिकना और उज्ज्वल बनानेके लिये उसमेंसे निकालकर दूध अथवा जल या सुधारसमें पकाया जाता है। तदनन्तर स्वच्छ वस्त्रसे घिस-घिसकर उन्हें उज्ज्वल और चमकदार रूप प्रदान किया जाता है। ऐसा करनेसे वह मौक्तिक अत्यधिक गुणवान् तथा कान्तिसे युक्त हो जाता है। महाप्रभावशाली, सिद्ध एवं संतप्तजनोंके हितमें लगे रहनेवाले, दयावान् आचार्य व्याडिने ऐसा ही कहा है।

रसविशेषमें शोधित वही मुक्ता शरीरका अलङ्कार होती है—जो श्वेत काँचके समान हो, स्वर्णजटित हो तथा रत्नशास्त्रके अनुसार सुपरीक्षित होनेके कारण (तार) कष्टका निवारण करनेवाली हो। सिंहल-देशके कुशलजन ऐसा ही (शोधनादि कार्य) करते हैं।

यदि किसी मुक्ताके कृत्रिम होनेका संदेह हो तो उसको लवणमिश्रित उष्ण, स्नेह द्रव्यमें एक रात रखकर सूखे वस्त्रमें वेष्टित करके यथायोग्य धान्यके साथ उसका मर्दन करे। ऐसा करनेसे यदि उसमें विवर्ण भाव नहीं आता है तो उसको स्वाभाविक मुक्ता ही मानना चाहिये।

यथोक्त प्रमाणवाली गुरु, श्वेत, स्निग्ध, स्वच्छ, निर्मल एवं तेजसम्पन्न, सुन्दर एवं वृत्ताकार मुक्ता गुणसम्पन्न मानी गयी है। प्रमाणमें बड़ी-बड़ी, सुन्दर, रश्मि-कान्तिसे परिपूर्ण, श्वेत, सुवृत्ताकार, समान एवं सूक्ष्म छिद्रसे युक्त जो मुक्ता होती है, वह क्रय न करनेवाले व्यक्तिको भी आनन्दित करती है*। अतः ऐसी मुक्ताको प्रशस्त मानना चाहिये।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि रत्नशास्त्रीय परीक्षा-विधिके अनुसार जिस मुक्तामें सभी गुणोंका उदय हो गया है, यदि वह मुक्ता किसी पुरुषका योग (संयोग) प्राप्त कर लेती है तो वह अपने स्वामीको किसी भी प्रकारके एक भी अनर्थोत्पादक दोषके सम्पर्कमें नहीं आने देती। (अध्याय ६९)


पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने कहा—**भगवान् भास्कर जब महामहिम दैत्यराज बलासुरके उस श्रेष्ठ रत्नबीजरूप शरीरके रक्तको लेकर स्वच्छ नीले आकाश-मार्गसे देवलोकको जा रहे थे; उसी समय निरन्तर देवोंपर विजय प्राप्त करनेसे अहंकारमें भरे हुए लंकाधिपति रावणने आकर बलात् उनको शत्रुके समान आधे मार्गमें ही रोक लिया। भयवश सूर्यने बलासुरके रत्नबीजरूपी रक्तको लंका देशकी एक श्रेष्ठ नदीके जलमें छोड़ दिया, जो उस देशकी सुन्दर रमणियोंके कान्तिमय नितम्बोंकी प्रतिच्छायासे झिलमिलाते हुए अगाधजलसे परिपूर्ण तथा सुपारीकी वृक्ष-पंक्तियोंसे आच्छादित अपने दोनों तटोंसे सुशोभित हो रही थी। गङ्गाके समान पवित्र एवं उत्तम फलोंको प्रदान करनेमें सक्षम उस नदीका नाम रावणगङ्गा प्रसिद्ध हो गया।


* उत्तम मुक्ताका क्रय-(मुक्ता विक्रय) करनेसे रुपये मिलते हैं, उससे आनन्दानुभूति होती है। क्रय किये बिना भी अपनी उत्तमताके कारण यथाविधि यदि मुक्ता धारण की जाय तो वह स्वयं विविध ऐश्वर्य देती ही है। इसलिये आनन्दानुभूति दोनों दशा (क्रय करने, न करने)-में समान है।

६१- स्फटिक-परीक्षा

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काण्ड ]पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि१२१

बलासुरके रत्नबीजरूपी रक्तके गिरनेसे उस नदीके तटपर उसी समयसे रात्रिमें रत्नराशियाँ स्वयं आकर एकत्र होने लगीं। अतएव नदीका अन्तःभाग एवं बाह्यभाग सैकड़ों स्वर्ण-बाणोंके समान अपनी प्रभाको बिखेरनेमें समर्थ रत्नोंसे प्रतिभासित होने लगा। उस रावणगङ्गाके दोनों तट सदैव रत्नोंकी उज्ज्वल प्रभासे सुशोभित रहते हैं। उसके जलमें उत्पन्न पद्मराग नामक रत्न सौगन्धिक (शापमाल-विकसित होनेवाला श्वेतमाल), कुरुविन्दज (रत्नविशेष) तथा स्फटिक रत्नोंके प्रधान गुणोंको धारण करते हैं। उनका स्वरूप बन्धूकपुष्प, गुञ्जाफल, वीरबहूटी कीट तथा जवाकुसुम और अष्टक (कुंकुम)-के वर्णोंकी कान्तियोंसे सुशोभित रहता है। कुछ पद्मराग दाड़िम-बीजकी आभासे सम्पन्न तथा कुछ किंशुक (पलाश)-पुष्पके समान रक्तवर्णकी कान्तिसे युक्त रहते हैं। सिन्दूर, रक्तकमल, नीलोत्पल, कुंकुम और लाक्षारसके समान रंगवाले भी पद्मराग होते हैं। गहरा वर्ण होनेपर भी उन पद्मरागरत्नोंमें स्फुरित शोभासम्पन्न कान्तियाँ सुन्दर आभाको फैलाती रहती हैं।

स्फटिकसे उद्भूत पद्मराग सूर्यकी किरणोंसे सम्पृक्त होकर अपनी रश्मियोंके द्वारा दूर रहते हुए भी पार्श्वभागोंको अनुरञ्जित करते हैं। कुछ रत्न कुसुम्भवर्ण एवं नीलवर्णकी मिश्रित आभासे सम्पन्न रहते हैं तो कुछ रत्नोंका वर्ण नये विकसित कमलके सदृश शोभाको धारण करता है। कुछ रत्न भल्लान्तक तथा कण्टकारी-पुष्पके समान कान्ति प्राप्त करनेवाले हैं और कुछ रत्न हिंगुल अर्थात् हींग-वृक्षके पुष्पोंकी शोभासे सुशोभित रहते हैं। कतिपय रत्नोंका वर्ण चकोर, पुंस्कोकिल तथा सारस पक्षियोंके नेत्रोंके समान होता है। कुछ रत्न कुमुद-पुष्पके सदृश होते हैं। प्रायः गुण-प्रभाव, शारीरिक काठिन्य एवं गुरुत्वमें स्फटिकोद्भूत पद्मरागमणियाँ समान होती हैं।

सौगन्धिक मणियोंसे प्रादुर्भूत पद्मरागमणिका वर्ण नीले और लाल कमलके समान होता है। कुरुविन्दकसे उत्पन्न पद्मरागमणियोंमें वैसी आभा नहीं होती है, जैसी आभा स्फटिकसे उद्भूत पद्मराग मणियोंमें रहती है। अधिकांश मणियोंमें प्रभा अन्तर्निहित होती है। फिर भी वे अपनी समस्त पुञ्जीभूत रश्मि-प्रभाओंसे लोगोंपर अपना अत्यधिक प्रभाव डालती हैं।

उस रावणगङ्गामें जो भी कुरुविन्दक रत्न पाये जाते हैं, वे सभी सघन, रक्ताभवर्ण तथा स्फटिक प्रभाववाले होते हैं। उन रत्नोंकी वर्ण-समानताको प्राप्त करनेवाले अन्य रत्न आन्ध्रादिक किसी दूसरे देशमें दुर्लभ हैं। उन स्थानोंमें जो भी कुरुविन्दक रत्न प्राप्त होते हैं, उनका मूल्य इस रावणगङ्गा नदीसे प्राप्त रत्नोंकी अपेक्षा बहुत ही कम होता है। उसी प्रकार यहाँपर उत्पन्न स्फटिकमणियोंसे प्रादुर्भूत पद्मरागकी समानतामें तुम्बुरु देशसे प्राप्त होनेवाली मणियोंका भी मूल्य कम ही माना गया है।

वर्णाधिक्य, गुरुता, स्निग्धता, समता, निर्मलता, पारदर्शिता, तेजस्विता एवं महत्ता श्रेष्ठ मणियोंका गुण है। जिन मणियोंमें करकराहट, छिद्र, मल, प्रभाहीनता, परुषता तथा वर्णविहीनता होती है, वे सभी जातीय गुणोंके रहनेपर प्रशस्त नहीं मानी जातीं।

यदि अज्ञानतावश कोई मनुष्य ऐसी दोषयुक्त मणियोंको धारण कर लेता है तो उनके कुप्रभावसे उत्पन्न शोक, चिन्ता, रोग, मृत्यु तथा धननाशादि आपदाएँ उसको घेर लेती हैं।

पूर्वकथित श्रेष्ठ मणियोंकी तुलनामें अत्यधिक सौन्दर्य-सम्पन्न एवं उनके प्रतिरूप होनेपर भी पाँच जातियोंकी मणियोंको विजातीय माना गया है। जिनका परीक्षण विद्वान् पुरुषको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। कलशपुर, सिंहल, तुम्बुरु, मुक्तपाणि तथा

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१२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

श्रीपूर्णकमें उत्पन्न पद्मरागका रावणगङ्गासे प्राप्त शुभप्रद पद्मरागमणियोंसे सादृश्य होनेपर भी वे विजातीय ही माने गये हैं।

तुष-सदृश (मलिन वर्णका) होनेसे कलशपुर, अल्प ताम्रवर्णके कारण तुम्बुरु देश, कृष्णवर्णके रहनेसे सिंहल, नीलवर्णके होनेसे मुक्त तथा कान्तिविहीन होनेसे श्रीपूर्णककी मणियोंमें (रावणगङ्गाकी मणियोंकी अपेक्षा) विजातीय रूप होनेसे ही भेद स्पष्ट होता है।

जो पद्मराग ताम्रिका (गुञ्जा)-के वर्णको धारण करता है, तुष (बहेड़ा)-के समान मध्यमें पूर्णतासे युक्त (गोलाकार) होता है तथा स्नेहसे प्रदिग्ध (स्वभावतः स्नेहिल) होता है और अत्यन्त घिसनेके कारण कान्तिविहीन हो जाता है, मस्तक-संघर्षण अथवा हाथोंकी अँगुलियोंके स्पर्शसे जिसके पार्श्वभाग काले हो जाते हैं, हाथमें लेकर बार-बार ऊपरकी ओर उछालनेपर जो मणि प्रत्येक बार एक ही वर्णको धारण करती है, वह सभी गुणोंसे युक्त होती है। समान प्रमाण, समान जाति अथवा गुरुत्व धर्मसे दो वस्तुओंमें तुलना होती है। अतः विशेष रत्नाकरसे प्राप्त रत्नोंकी स्वजातिका निर्धारण गुरुत्व और गुण-धर्मके अनुसार विद्वान् व्यक्तिको करना चाहिये। यदि उनमें संदेह उत्पन्न हो जाय तो उनको शाणपर चढ़ाकर खरादना चाहिये। वज्र या कुरुविन्दक रत्नको छोड़कर अन्य किसी भी रत्नके द्वारा पद्मराग एवं इन्द्रनीलमणिमें चिह्न-विशेष टंकित नहीं किया जा सकता है।

जातिविशेषमें उत्पन्न सभी मणियाँ विजातीय नहीं होती हैं। उनका वर्ण समान होता है, फिर भी उनके पृथक्करणके लिये उनमें विभिन्न भेद बताये गये हैं। गुणयुक्त मणिके साथ गुणरहित मणिको धारण नहीं करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको कौस्तुभ-मणिके साथ विजातीय मणिको धारण नहीं करना चाहिये; क्योंकि अनेक गुणोंसे सम्पन्न मणियोंको एक ही विजातीय मणि नष्ट करनेमें समर्थ होती है।

शत्रुओंके बीच निवास करने तथा प्रमाद-वृत्तिमें आसक्त रहनेपर भी विशुद्ध महागुणसम्पन्न पद्मरागमणिका स्वामी होनेसे किसी भी व्यक्तिको आपदाएँ स्पर्शतक नहीं कर सकतीं। जो गुणोंसे परिपूर्ण तेजस्वी सुन्दर वर्णवाले पद्मरागमणिको धारण करता है, उसके समीपमें उपस्थित होकर दोष-संसर्गजनित उपद्रव कोई कष्ट देनेमें अपनेको सक्षम नहीं कर पाते हैं।

जिस प्रकार तण्डुल-परिमाणके अनुसार हीरेका मूल्य निर्धारित होता है, उसी प्रकार महागुणसम्पन्न पद्मरागमणिके मूल्यका निर्धारण उड़दके परिमाणका आकलन करके करना चाहिये।

जो मणि या रत्न उत्तम वर्ण एवं श्रेष्ठ कान्तियोंसे सम्पन्न रहते हैं, उन्हींको प्रशस्त माना जाता है। यदि उनमें तनिक भी दोषके कारण भ्रष्टता आ जाती है तो उनका मूल्य घट जाता है। (अध्याय ७०)


मरकतमणि*का लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने कहा—**नागराज वासुकि उस असुरपति बलासुरके पित्तको लेकर अत्यन्त वेगसे मानो आकाशमार्गको दो भागोंमें विभक्त करते हुए देवलोकको जा रहे थे। उस समय वे अपने ही सिरपर अवस्थित मणिकी प्रभासे देदीप्यमान होनेके कारण आकाशरूपी समुद्रपर बने हुए एक अद्वितीय रजतसेतुके समान सुशोभित हो रहे थे। उसी समय अपने पंख-निपातसे पृथिवी एवं आकाशको आतंकित


* मरकतमणि—पन्ना।

६४- गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल

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काण्ड ] मरकतमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि १२३


करते हुए पक्षिराज गरुडने सर्पदेव वासुकिपर प्रहार करनेका प्रयत्न किया।

भयभीत वासुकिने सहसा उस रत्नबीजरूप पित्तको मधुर-सुस्वादु जलसे परिपूर्ण सरिता एवं वृक्षोंसे सुशोभित तथा पुष्पोंकी नवकलिकाओंकी सान्द्र गन्धसे सुवासित तुरुष्कदेशकी एक श्रेष्ठ माणिक्योंसे परिपूर्ण पर्वतकी उपत्यकामें छोड़ दिया। वह पित्त उस पर्वतसे निकलनेवाले जल-प्रपातके समान ही था। अतः उसीकी जलधाराके साथ बहता हुआ वह पित्त भगवती महालक्ष्मीके समीपमें स्थित उनके श्रेष्ठ भवन अर्थात् समुद्रको प्राप्त करके उसकी तटवर्ती भूमिके समीप मरकतमणियोंका खजाना बन गया।

फणिराज वासुकिने जिस समय उस पित्तका परित्याग किया था, उसी समय गरुडने गिरते हुए उस पित्तका कुछ अंश ग्रहण (पान)-कर लिया। जिससे वे मूर्च्छित हो गये और सहसा उन्होंने अपने दोनों नासाछिद्रोंसे उस पित्तको बाहर कर दिया। उस स्थानपर प्राप्त होनेवाली मरकत-मणियाँ कोमल शुकपक्षीके कण्ठ, शिरीषपुष्प, खद्योतके पृष्ठप्रदेश, हरित तृणक्षेत्र, शैवाल, कल्हारपुष्प, (श्वेतकमल) नयी निकली हुई घास, सर्पभक्षिणी मयूरी तथा हरितपत्रकी कान्तिसे सुशोभित होकर लोगोंको कल्याण देनेवाली होती हैं।

वहाँपर नागभक्षी गरुडके द्वारा पान किया गया जो दैत्याधिपति बलासुरका पित्त गिरा था, वह स्थान मरकतमणियोंका आकर अर्थात् खजाना बन गया। वह देश सामान्य जनोंके लिये दुर्लभ और गुणयुक्त हो गया। उस मरकतमणियोंके देशमें जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह सब विष-व्याधियोंको शान्त करनेवाला कहा गया है। सभी मन्त्रों एवं औषधियोंसे जिस नागके महाविषके उपचारमें सफलता नहीं प्राप्त हो सकती है, उस प्रभावको वहाँपर उत्पन्न वस्तुओंसे शान्त किया जा सकता है।

वहाँ जो मरकतमणियाँ उत्पन्न होती हैं, वे अन्यान्य देशोंकी मणियोंसे उत्तम कही गयी हैं। जो मणि अत्यन्त हरितवर्णवाली, कोमल कान्तिवाली, जटिल, मध्यभागमें सुवर्ण-चूर्णसे परिपूर्ण-सी दिखायी देती है, जो अपने स्थानविशेषके गुणोंसे समन्वित, समान कान्तिवाली, उत्तम तथा सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे अपनी प्रभाके द्वारा सभी स्थानोंको आलोकित करती है, हरितभावको छोड़कर जिसके मध्यभागमें एक समुज्ज्वल कान्ति विद्यमान रहती है और जो अपनी नवनवोदित प्रभारशिसे नवीन निकले हुए हरित तृणकी कान्तिको तिरस्कृत करती है तथा जो देखनेमात्रसे ही लोगोंके मनको अत्यधिक आह्लादित करनेमें समर्थ होती है, वह मरकतमणि बहुत गुणवती मानी जाती है। ऐसा रत्नविद्या-विशारद विद्वज्जनोंका विचार है।

वर्णकी अत्यधिक व्यापकताके कारण जिस मरकतमणिके अन्तर्भागकी निर्मल स्वच्छ किरणें परिधानके रूपमें परिलक्षित होती हैं, जिसकी उज्ज्वल कान्ति घनीभूत, स्निग्ध, विशुद्ध, कोमल, मयूरकण्ठकी आभाके समान शोभाको प्राप्त करती है तथा अपने वर्णकी उज्ज्वल कान्तिकी सान्द्रतासे एकाकार होकर सुशोभित रहती है। ऐसी मरकतमणि भी उसी गुणसम्पन्न मणिकी संज्ञाको प्राप्त करती है, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है।

जो मरकतमणि चित्र वर्णवाली, कठोर, मलिन, रूक्ष, कड़े पत्थरके समान एवं खुरदुरी तथा शिलाजीतके समान दग्ध होती है, ऐसी मरकतमणि गुणरहित होती है। जो मरकतमणि सन्धि-प्रदेशमें शुष्क हो तथा उससे अन्य रत्नका प्रादुर्भाव होता हो तो कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिके लिये वह रत्न धारण करने अथवा खरीदनेयोग्य नहीं होता है।

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१२४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भल्लातकी (शैलविशेष) और पुत्रिका (शैलविशेष)—वर्ण अथवा उन दोनों वर्णोंका एक ही मणिमें संयोग हो तो उसे भी मरकतमणिका विजातीय लक्षण ही समझना चाहिये। क्षौमवस्त्रके द्वारा मार्जन करनेपर पुत्रिका लक्षणवाली मरकतमणि अपनी कान्तिका परित्याग कर देती है। जिस प्रकार काँचमें लघुता होती है, उसी प्रकार उसकी लघुताके द्वारा ही उसमें अवस्थित विजातीय भावनाको पहचाना जा सकता है। अनेक प्रकारके रूप या गुण अथवा वर्णके द्वारा मरकतमणिका अनुगमन करनेवाली मणियाँ भल्लातकीकी शब्द-ध्वनिसे विपरीत वर्णको प्राप्त हो जाती हैं। जो हीरे-मोती विजातीय होते हैं, यदि वे किसी रत्नौषधि विशेषके लेप पदार्थसे रहित हैं तो उनके वर्णोंकी प्रभा ऊर्ध्वगामिनी होती है।

ऋजुताके कारण किन्हीं मणियोंमें ऊर्ध्वगामिनी प्रभा दीख सकती है, किंतु तिर्यक् दृष्टिसे उनका अवलोकन करनेसे उनकी वह प्रभा शीघ्र ही नष्ट हो जाती है।

स्नान, आचमन, जप तथा रक्षामन्त्रकी क्रिया-विधिमें, गौ-सुवर्णका दान देते हुए और अन्यान्य प्रकारकी साधना करते समय, देव, पितृ, अतिथि तथा गुरुकी पूजाके समय, विषसे उत्पन्न विविध दोषोंसे पीड़ित होनेपर, संग्राममें विचरण करते हुए दोषोंसे हीन और गुणोंसे युक्त सोनेके सूत्रमें पिरोये उस मरकतको विद्वानोंके द्वारा धारण किया जाना चाहिये।

सामान्यतः पद्मरागमणिका तौलके अनुसार जो मूल्य होता है, उस मूल्यकी अपेक्षा सर्वगुणसम्पन्न मरकतमणिका मूल्य अधिक होता है। जिस प्रकार दोष रहनेपर पद्मरागमणियोंका मूल्य न्यून हो जाता है, उसी प्रकार दोषसम्पन्न होनेपर मरकतमणियोंके मूल्यमें अत्यधिक न्यूनता आ जाती है।

(अध्याय ७१)


इन्द्रनीलमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

सूतजीने पुनः कहा—जिस स्थानपर सिंहल देशकी रमणियाँ अपने करपल्लवके अग्रभागसे नवीन लवली* कुसुम तथा प्रवालका चयन कर रही थीं, वहाँपर उस बलासुरके विकसित कमलसदृश शोभासम्पन्न दोनों नेत्र आकर गिर पड़े। समुद्रकी वह कछारभूमि, रत्नके समान चमकनेवाले नेत्रोंकी प्रभातंरगोंसे सुशोभित होकर एक विशाल क्षेत्रमें फैली हुई है। वहींपर विकसित केतकी नामक पुष्पोंके वनोंकी शोभाको फैलानेमें प्रतिक्षण लगी रहनेवाली इन्द्रनीलमणियोंकी एक भूमि है। उस वनस्थलीपर अवस्थित पर्वतकी जो कर्णिकाभूमि है, उसमें प्रादुर्भूत होनेवाली वे मरकतमणियाँ नीलकमलसदृश कृष्ण एवं हलधर बलरामके द्वारा धारण किये जानेवाले पीत और नील वर्णोंकी आभासे सम्पन्न हैं। काले भ्रमरके समान हैं, शार्ङ्गधनुषसे सुशोभित स्कन्ध-प्रदेशवाले भगवान् विष्णुकी कान्तिसे युक्त हैं तथा भगवान् शिवके कण्ठके समान (नीलवर्ण) और नवीन कषाय पुष्पोंके समान आभावाली हैं।

उन मणियोंमें कोई स्वच्छ तरङ्गायित जलके समान, कोई मयूरके समान, कोई नीलीरसके समान, कोई जल-बुद्बुदके समान और कोई मणि मदमस्त कोकिल पक्षीके कण्ठकी प्रभासे आभासित रहती है। उन सभी मणियोंमें एक प्रकारकी ही


* सुगन्धित पुष्पवाला वृक्षविशेष।

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काण्ड ] वैदूर्यमणिकी परीक्षा-विधि १२५


निर्मलता तथा प्रभाशक्तिकी भास्वरता विद्यमान रहती है, उस पर्वतके रत्नगर्भसे प्राप्त होनेवाली मणियोंमें इन्द्रनीलमणि नामके रत्न अत्यधिक गुणशाली होते हैं।
जिन मणियोंमें मिट्टी, पत्थर, छिद्र और करकराहटकी ध्वनि तथा नीलगगनपर आच्छादित सघन मेघच्छायाकी आभा रहती है, वे वर्णदोषसे दूषित मानी जाती हैं। किंतु वहाँपर वे ही इन्द्रनीलमणियाँ अत्यधिक उत्पन्न होती हैं, जिनकी प्रशंसा रत्नशास्त्रके सुविज्ञजनोंके द्वारा की जाती है।
धारण करनेयोग्य पद्मरागमणिमें जो गुण दिखायी देते हैं; मनुष्य इन्द्रनीलमणिको धारण करके उसमें उन सभी गुणोंको प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार पद्मरागमणियोंकी तीन जातियाँ हैं, उसी प्रकार सामान्यरूपसे इन्द्रनीलमणियोंमें भी तीन जातियाँ देखी जा सकती हैं। जिन उपायोंके द्वारा पद्मरागमणिका परीक्षण किया जाता है, उन्हीं उपायोंसे इन्द्रनीलमणिका भी परीक्षण होता है।
पद्मरागमणिको उपयोगयोग्य बनानेके लिये जितनी अग्निके साथ उसका सन्निधान अपेक्षित है, उसकी अपेक्षा अधिक अग्निका सन्निधान इन्द्रनीलमणिके साथ होना चाहिये। तब भी परीक्षण अथवा गुणोंकी अभिवृद्धिके लिये किसी भी प्रकारकी मणिको अग्निमें डालकर संतप्त नहीं करना चाहिये। अज्ञानतावश भी यदि कोई ऐसा करता है तो अग्निकी सम्यक् मात्राके परिज्ञानसे रहित प्रदाहमें जलानेके कारण उत्पन्न दोषोंसे प्रदूषित वह मणि ऐसा कृत्य करनेवाले कर्ता एवं कारयिता (करवानेवाला) दोनोंके लिये अनिष्टकारी होती है।
काँच, उत्पल, करवीर, स्फटिक एवं वैदूर्य आदि मणियाँ इन्द्रनीलमणिके सदृश होनेपर भी रत्नविशेषज्ञोंके अनुसार विजातीय ही मानी जाती हैं। अतएव इन उक्त सभी मणियोंके गुरुत्व एवं काठिन्य धर्मकी अवश्य परीक्षा लेनी चाहिये। जिस प्रकार कोई इन्द्रनीलमणि ताम्रवर्णको धारण कर लेती है, उसी प्रकार ताम्रवर्णवाले करवीर तथा उत्पल नामक दोनों मणियोंकी भी रक्षा करनी चाहिये। जिस इन्द्रनीलमणिके मध्य इन्द्रायुधकी प्रभा अवभासित होती रहती है, उस इन्द्रनीलमणिको पृथ्वीपर अत्यन्त दुर्लभ एवं अत्यधिक मूल्यवाली कहा गया है।
सौगुना अधिक परिमाणवाले दूधमें रखनेपर भी जिसकी सान्द्रवर्णकी कान्तिसे वह दूध स्वयं नीलवर्णका हो जाता है, उसीको महानीलमणि कहते हैं।
जिस प्रकार माशादिसे की गयी तौलके द्वारा महागुणशाली पद्मरागमणिका मूल्य निर्धारित किया जाता है, उसी प्रकार सुवर्ण परिमाण (अस्सी रत्ती)—की तौलसे महागुणशाली इन्द्रनीलमणिका मूल्य निर्धारित होता है। (अध्याय ७२)


वैदूर्यमणिकी परीक्षा-विधि

सूतजीने कहा— हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं ब्रह्माके द्वारा बतायी हुई तथा व्यासजीद्वारा कही हुई वैदूर्य, पुष्पराग, कर्केतन तथा भीष्मकमणियोंकी परीक्षा-विधिको पृथक्-पृथक् कहता हूँ।
कल्पान्तकालमें क्षुब्ध अगाध समुद्रकी जलराशिके गम्भीर महानादके समान दिति-पुत्र बलासुरके नादसे विभिन्न वर्णोंवाली, अत्यन्त सौन्दर्य-सम्पन्न वैदूर्यमणियोंका बीज उत्पन्न हुआ था।
उतुंग शिखरोंवाले विदूर नामक पर्वतके सन्निकट स्थित कामभूतिक सीमासे मिले हुए क्षेत्रमें उस वैदूर्यबीजका अवधान होनेसे एक रत्नगर्भकी उत्पत्ति हुई।

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१२६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

बलासुरके नादसे उत्पन्न यह रत्नाकर महागुणसम्पन्न तथा तीनों लोकोंका श्रेष्ठतम आभूषणस्वरूप है। उस रत्नाकरमें दैत्यराजके महानादका अनुकरण करनेवाली, वर्षाकालीन श्रेष्ठ मेघोंकी आभावाली बड़ी ही सुन्दर विचित्र प्रकारकी मणियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे प्रभाके स्फुलिङ्गोंका समूह निकलता रहता है।

पृथिवीपर पद्मरागमणियोंके जो वर्ण हैं, उन सभी वर्णोंकी शोभाका अनुगमन वैदूर्यमणि करती है। उन मणियोंमें जो मणि मयूरकण्ठके सदृश अथवा वंशपत्रके समान वर्णवाली होती है, उसको श्रेष्ठ माना गया है। जिन मणियोंका वर्ण चषक नामक पक्षीके सदृश होता है, उन वैदूर्यमणियोंको मणिशास्त्रवेत्ताओंने प्रशस्त नहीं कहा है।

गुणयुक्त वैदूर्यमणि अपने स्वामीको परम सौभाग्यसे सम्पन्न बनाती है और दोषयुक्त मणि अपने स्वामीको दोषोंसे संयुक्त कर देती है। अतएव प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करनी चाहिये।

वैदूर्यमणिके अतिरिक्त गिरिकाँच, शिशुपाल, काँच तथा स्फटिक—ये चार विजातीय मणियाँ हैं, जो वैदूर्यके समान ही आभा फैलाती हैं। किंतु लेखनकी सामर्थ्यसे रहित होनेके कारण काँच, गुरुत्वभावसे हीन होनेके कारण शिशुपाल, कान्तियुक्त होनेसे गिरिकाँच एवं अपने समुज्ज्वल वर्णके कारण स्फटिकमणिसे इस मणिमें भेद होता है। महागुणसम्पन्न इन्द्रनीलमणिका सुवर्ण (अस्सी रत्ती मात्रा) परिमाणके अनुसार जो मूल्य निर्धारित किया गया है, वही मूल्य दो पल भारयुक्त वैदूर्यमणिका कहा गया है।

एक विजातीयमणिमें वे सभी वर्ण समान होते हैं, जो वर्ण मणियोंमें पाये जाते हैं; फिर भी उनमें महान् भेद माना गया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वे विशेष भेदक तत्त्वपर विचार करें। स्नेह, लघुता और मृदुताके द्वारा सजातीय और विजातीय-मणियोंके चिह्नोंका भेद सार्वजनीन है।

मणिशोधनमें कुशल या अकुशलजनोंके द्वारा प्रयुक्त उचित एवं अनुचित उपायोंके कारण भी विभिन्न प्रकारकी मणियोंमें उत्पन्न हुए गुण-दोषके अनुसार उनके मूल्यमें न्यूनाधिक्य हो जाता है।

मणिबन्धक अर्थात् मणिवेत्ताके द्वारा भली प्रकारसे शोधित मणियाँ यदि दोषरहित होती हैं तो उनका सामान्य मूल्यकी अपेक्षा छःगुना अधिक मूल्य होता है। समुद्रके तीरकी सन्निधिमें स्थित आकरसे प्राप्त हुई मणियोंका जो मूल्य होता है, पृथिवीपर सर्वत्र मणियोंका वही मूल्य नहीं रहता।

मनुने सोलह माशेका एक ‘सुवर्ण’ (भार) बताया है*। उसका सातवाँ हिस्सा संज्ञारूप प्राप्त करता है। चार माशेका एक ‘शाण’, पाँच कृष्णलका एक ‘माशा’ और एक पलका दशम भाग ‘धरण’ कहलाता है। इस प्रकार रत्नोंके मूल्य निश्चयके लिये यह मणिविधि कही गयी है। (अध्याय ७३)


पुष्परागमणिकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने पुनः कहा—**देवशत्रु बलासुरके शरीरकी त्वचा हिमालय पर्वतपर गिरी थी, जिनसे महागुणसम्पन्न पुष्परागमणियोंका प्रादुर्भाव हुआ। जो पाषाण पूर्णपीत एवं पाण्डुवर्णकी सुन्दर आभासे समन्वित रहता है, उसका नाम ‘पद्मराग’ है। यदि वह लोहित और पीतवर्णकी आभासे युक्त है तो उसको ‘कौकण्टक’ नामसे जानना चाहिये।

जो पाषाण पूर्ण लोहित एवं सामान्य पीतवर्णसे संयुक्त होता है, उसे ‘काषायकमणि’ कहते हैं।


* मनुस्मृति ८। १३४

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काण्ड ] भीष्मकमणिकी परीक्षा-विधि १२७


जिस पत्थरका वर्ण पूर्णरूपसे नीला और शुक्लवर्णसमन्वित तथा स्निग्ध होता है, वह सोमालक गुणयुक्त मणि है। जो पत्थर अत्यन्त लोहित वर्णका होता है, उसीको 'पद्मराग' कहा जाता है। जो पूर्ण नीलवर्णकी सुन्दर आभासे सम्पन्न रहता है, उसे 'इन्द्रनीलमणि' कहते हैं।

मणिशास्त्रवेत्ताओंने वैदूर्यमणिके समान ही पुष्पराजमणिका मूल्य स्वीकार किया है। इसको धारण करनेसे वही फल प्राप्त होते हैं, जो वैदूर्यमणिके धारणसे होते हैं। नारियोंके द्वारा धारण किये जानेपर यह मणि उन्हें 'पुत्र' प्रदान करती है।
(अध्याय ७४)


कर्केतनमणिकी परीक्षा-विधि

सूतजीने कहा—पवनदेवने रत्नबीजरूप उस दैत्यराज बलासुरके नखोंको प्रसन्नतापूर्वक लेकर कमल-वनप्रान्तमें बिखेर दिया। वायुद्वारा विकीर्ण उन नखोंसे पृथिवीपर कर्केतन नामक पूज्यतम मणिका जन्म हुआ। उसका वर्ण रक्त, चन्द्र एवं मधुसदृश, ताम्र, पीत, अग्निवत् प्रज्वलित, समुज्ज्वल, नील तथा श्वेत होता है। रत्न-व्याधि आदि दोषोंके कारण वह कठोर एवं विभिन्न वर्णोंमें भी प्राप्त होती है।

जो कर्केतनमणियाँ स्निग्ध, स्वच्छ, समराग, अनुरञ्जित, पीत, गुरुत्व धर्मसे संयुक्त एवं विचित्र आभासे व्याप्त तथा संताप, व्रण और व्याधि आदि दोषोंसे रहित होती हैं, उन्हें विशुद्ध या परम पवित्र माना जाता है।

स्वर्णपत्रमें सम्पुटितकर जब उन मणियोंको अग्निमें शोधित किया जाता है तो वे अत्यधिक देदीप्यमान हो उठती हैं। ऐसी विशुद्ध कर्केतनमणि रोगका नाश करनेवाली, कलिके दोषोंको नष्ट करनेवाली, कुलकी वृद्धि करनेवाली तथा सुख प्रदान करनेवाली होती है।

जो मनुष्य अपने शरीरको अलंकृत करनेके लिये इस प्रकारके बहुत-से गुणोंवाली कर्केतन नामक मणिको धारण करते हैं, वे पूजित, प्रचुर धनसे परिपूर्ण तथा अनेक बन्धु-बान्धवोंसे सम्पन्न होते हैं और नित्य उज्ज्वल कीर्तिसे सम्पन्न तथा प्रसन्न रहते हैं।

अन्य दूषित कर्केतनमणिको धारण करनेवाले विकृत, व्याकुल, नीली कान्तिवाले, मलिन द्युतिवाले, स्नेहरहित, कलुषित तथा विरूपवान् हो जाते हैं। वे तेज, दीप्ति, कुल, पुष्टि आदिसे विहीन होकर दूषित कर्केतनके सदृश शरीरको धारण करते हैं।
(अध्याय ७५)


भीष्मकमणिकी परीक्षा-विधि

सूतजीने पुनः कहा—उस देवशत्रु बलासुरका वीर्य हिमालय पर्वतके उत्तरी प्रान्तमें गिरा था। अतः वह देश उत्तम भीष्मकमणियोंका रत्नाकर बन गया। वहाँसे प्राप्त होनेवाली भीष्मकमणियाँ शङ्ख एवं पद्मके समान समुज्ज्वल, मध्याह्नकालीन सूर्यकी प्रभाके समान शोभावाली तथा वज्रके समान तरुण होती हैं।

जो मनुष्य अपने कण्ठादिक अङ्गोंमें स्वर्णसूत्रमें गुँथी हुई विशुद्ध भीष्मकमणिको धारण करता है, वह सदा सुख-समृद्धि प्रदान करनेवाली सम्पदाओंको प्राप्त करता है। वनोंमें भी ऐसी मणिसे सुशोभित मनुष्यको देखकर समीप आये हुए द्वीपी, भेड़िया, शरभ, हाथी, सिंह और व्याघ्रादि हिंसक वन्य प्राणी तत्काल भाग जाते हैं।

६५- गयाके तीर्थोंका माहात्म्य तथा गयाशीर्षमें पिण्डदानकी महिमामें विशालकी कथा

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१२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उस मणिको धारण करनेसे किसी भी प्रकारका भय नहीं रह जाता है। लोग भीष्मकमणिके स्वामीका उपहास नहीं कर पाते हैं।

भीष्मकमणिसे संयुक्त अँगूठीको धारण करके जो व्यक्ति अपने पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितरोंको बहुत वर्षोंतकके लिये संतुष्टि प्राप्त हो जाती है। इस रत्नके प्रभावसे सर्प, आखु (चूहा), बिच्छू आदि अण्डज जीवोंके विष स्वयं शान्त हो जाते हैं। जल, अग्नि, शत्रु और चोरोंके भयंकर भय भी नष्ट हो जाते हैं।

शैवाल एवं मेघकी आभासे युक्त, कठोर, पीत प्रभावाली, मलिन द्युति और विकृत वर्णवाली भीष्मकमणिका विद्वान् व्यक्तिको दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। पण्डितोंको देश-कालके परिज्ञानके अनुसार इन मणियोंके मूल्योंका निर्धारण करना चाहिये; क्योंकि दूर देशमें उत्पन्न हुई मणियोंका मूल्य अधिक तथा निकट देशमें उत्पन्न हुई मणियोंका मूल्य उसकी अपेक्षा कुछ कम होता है। (अध्याय ७६)

पुलकमणिके लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने कहा—**वायुदेवने दानवराज बलासुरके नखसे लेकर भुजापर्यन्त गतिमान् रत्नमयी प्रकाशकी विधिवत् पूजा करके उसको श्रेष्ठ पर्वतों, नदियों तथा उत्तरदेशके अन्य प्रसिद्ध स्थानोंमें स्थापित किया था। अतएव दशार्ण, वागदर, मेकल, कलिङ्ग आदि देशोंमें उस प्रकाशरूपी बीजसे उत्पन्न पुलकमणियाँ गुञ्जाफल, अञ्जन, क्षौद्र (मधु) और कमलनालके समान तथा गन्धर्व एवं अग्निदेशमें उत्पन्न हुई मणियाँ केलेके समान कान्तिवाली होती हैं। इन सभी पुलकमणियोंको प्रशस्त माना गया है।

कुछ पुलकमणियोंकी भंगिमा शंख, पद्म, भ्रमर तथा सूर्यके समान विचित्र होती है। ऐसी परम पवित्र मणियोंको सूत्रोंमें गूँथकर धारण करनेसे सब प्रकारका कल्याण होता है; क्योंकि वे पुलकमणियाँ माङ्गलिक एवं धन-धान्यादि ऐश्वर्यकी अभिवृद्धि करनेवाली होती हैं।

कौआ, घोड़ा, गधा, सियार, भेड़िया तथा भयंकर रूप धारण करनेवाले और मांस-रुधिरादिसे संलिप्त मुखवाले गृध्रोंके समान वर्णवाली जो पुलकमणियाँ होती हैं, वे मृत्युदायक होती हैं। विद्वान् व्यक्तिको उनका परित्याग कर देना चाहिये।

श्रेष्ठ एक पल प्रमाणवाली पुलकमणिका मूल्य पाँच सौ मुद्रा कहा गया है। (अध्याय ७७)

रुधिराक्ष रत्न-परीक्षा

**सूतजीने कहा—**अग्निदेवने दानवराजके अभीष्टरूपको ग्रहणकर कुछ अंश नर्मदा नदीके प्रान्तभागमें तथा कुछ अंश उस देशके निम्न भू-भागोंमें फेंक दिया था। अतः उन स्थानोंपर इन्द्रगोप (वीरबहूटी कीट) तथा शुक पक्षीके मुखकी भाँति वर्णवाली एवं प्रकट पीलु फलके समान वर्णवाली रुधिराक्ष मणियाँ प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त भी यहाँपर नाना प्रकारकी मणियाँ प्राप्त होती हैं, इनका आकार एक समान होता है।

जो मणि मध्यभागमें चन्द्रके सदृश पाण्डुर तथा अत्यन्त विशुद्ध वर्णवाली होती है, तुलनामें वह इन्द्रनीलमणिके समान होती है। इसे ऐश्वर्य, धन-धान्य एवं भृत्यादिकी अभिवृद्धि करनेवाली माना गया है। इस मणिका पाकक्रियासे शोधन होनेपर देववज्रके समान वर्ण होता है।

(अध्याय ७८)

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काण्ड ] गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा १२९


स्फटिक-परीक्षा

सूतजीने कहा—हलधारी बलरामने उस दैत्यराजके मेदाभागको लेकर कावेरी, विन्ध्य, यवन, चीन तथा नेपाल देशके भूभागोंमें प्रयत्नपूर्वक बिखेरा था। अतः उन स्थानोंपर आकाशके समान निर्मल तैल-स्फटिक नामक मणि उत्पन्न हुई। यह मणि मृणाल एवं शंखके सदृश धवल होती है, किंतु कुछ मणियाँ उक्त वर्णके अतिरिक्त अन्य वर्णोंको भी धारण करती हैं।

रत्नोंमें उस मणिके समान अन्य कोई नहीं है, जो पाप-विनाश करनेमें उसके बराबर क्षमता रखती हो। शिल्पकारके द्वारा संस्कारित होनेपर ही स्फटिकके मूल्यका कुछ आकलन किया जा सकता है।

(अध्याय ७९)


विद्रुममणिकी परीक्षा

सूतजीने पुनः कहा—हे शौनक! शेषनागने उस बलासुरके अन्त्रभागको ग्रहणकर केरल आदि देशोंमें छोड़ा था, अतएव उन स्थानोंपर महागुणसम्पन्न विद्रुममणियोंका जन्म हुआ। उन विद्रुममणियोंमें जो खरगोशके रक्तके समान लोहित होती हैं अथवा गुञ्जाफल या जपापुष्पकी आभाको धारण करती हैं, उन्हें श्रेष्ठ माना गया है। नील देश, देवक तथा रोमक नामक स्थान इन मणियोंकी जन्मभूमि है। उनमें उत्पन्न हुई विद्रुममणि अत्यन्त लाल वर्णकी होती है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त होनेवाली मणियाँ प्रशस्त नहीं मानी गयी हैं। शिल्पकलाके विशेष योग-कौशलपर ही इनके मूल्यका निर्धारण होता है।

जो विद्रुममणि सुन्दर, कोमल, स्निग्ध तथा लाल-लाल वर्णकी होती है, वह निश्चित ही इस संसारमें मनुष्यको धन-धान्यसम्पन्न बनानेवाली तथा उसके विषादिक दुःखोंको दूर करनेवाली होती है।

(अध्याय ८०)


गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा

सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं समस्त तीर्थोंका वर्णन करूँगा। जितने भी तीर्थ हैं, उनमें गङ्गा उत्तमोत्तम तीर्थ है। यद्यपि गङ्गा सर्वत्र सुलभ है, किंतु हरिद्वार, प्रयाग एवं गङ्गासागरके संगम—इन तीन स्थानोंमें वह दुर्लभ है*।

प्रयाग परम श्रेष्ठ तीर्थ है, जो मरनेवालेको मुक्ति और भुक्ति दोनों प्रदान करता है। इस महातीर्थमें स्नान करके जो अपने पितरोंके लिये पिण्डदान करते हैं, वे अपने समस्त पापोंका विनाशकर सभी अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त करते हैं।

वाराणसी परम तीर्थ है। इस तीर्थमें भगवान् विश्वनाथ और केशव सदैव निवास करते हैं। कुरुक्षेत्र भी बहुत बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थमें दानादि करनेसे यह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाला है। प्रभास श्रेष्ठतम तीर्थ है, जहाँपर भगवान् सोमनाथ विराजमान रहते हैं। द्वारका अत्यन्त सुन्दर नगरी है। यह मुक्ति-भुक्ति दोनोंको प्रदान करनेवाली है। पूर्व दिशामें अवस्थित सरस्वती पुण्यदायिनी तीर्थ है। इसी प्रकार सप्तसारस्वत परमतीर्थ है।

केदारतीर्थ समस्त पापोंका विनाशक है। सम्भलग्राम उत्तम तीर्थ है। बदरिकाश्रम भगवान्


* सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा॥ गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे। (८१।१-२)

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१३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नर-नारायणका महातीर्थ है, जो मुक्तिप्रदायक है।

श्वेतद्वीप, मायापुरी (हरिद्वार), नैमिषारण्य, पुष्कर, अयोध्या, चित्रकूट, गोमती, वैनायक, रामगिर्याश्रम, काञ्चीपुरी, तुंगभद्रा, श्रीशैल, सेतुबन्ध-रामेश्वर, कार्तिकेय, भृगुतुंग, कामतीर्थ, अमरकण्टक, महाकालेश्वरकी निवासभूमि उज्जयिनी, श्रीधर हरिका निवासस्थल कुब्जक, कुब्जाम्रक, कालसर्पि, कामद, महाकेशी, कावेरी, चन्द्रभागा, विपाशा, एकाग्र, ब्रह्मेश, देवकोटक, रम्य मथुरापुरी, महानद शोण तथा जम्बूसर नामक स्थानोंको महातीर्थ कहा गया है।

इन तीर्थोंमें सदा सूर्य, शिव, गणपति, महालक्ष्मी एवं भगवान् हरि निवास करते हैं। यहाँ और अन्यान्य पवित्र स्थानोंमें किया गया स्नान, दान, जप, तप, पूजा, श्राद्ध तथा पिण्डदानादि अक्षय होता है। इसी प्रकार शालग्राम तथा पाशुपततीर्थ भी परम पवित्र तीर्थ हैं, जो भक्तोंको सब कुछ प्रदान करते हैं।

कोकामुख, वाराह, भाण्डीर और स्वामि नामक तीर्थ महातीर्थके रूपमें विख्यात हैं। लोहदण्ड नामक तीर्थमें महाविष्णु तथा मन्दारतीर्थमें मधुसूदन निवास करते हैं।

कामरूप महान् तीर्थ है। इस स्थानमें कामाख्यादेवी सदा विराजमान रहती हैं। पुण्ड्रवर्धनतीर्थमें भगवान् कार्तिकेय प्रतिष्ठित रहते हैं। विरज, श्रीपुरुषोत्तम, महेन्द्रपर्वत, कावेरी, गोदावरी, पयोष्णी, वरदा, विन्ध्य और नर्मदाभेद नामक महातीर्थ समस्त पापोंके विनाशक हैं। गोकर्ण, माहिष्मती, कलिंजर एवं श्रेष्ठ शुक्लतीर्थको महातीर्थ माना गया है। यहाँपर स्नान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इस तीर्थमें भगवान् शार्ङ्गधारी हरि निवास करते हैं। भक्तोंको सब कुछ देनेवाले विरज तथा स्वर्णाक्षतीर्थ भी उत्तम तीर्थ हैं।

नन्दितीर्थ मुक्तिदायक और कोटितीर्थोंका फल प्रदान करनेवाला है। नासिक, गोवर्धन, कृष्णा, वेणी, भीमरथी, गण्डकी, इरावती, विंदुसर एवं विष्णुपादोदक महापुण्यप्रदायक परम तीर्थ हैं।

ब्रह्मध्यान और इन्द्रियनिग्रह महान् तीर्थ हैं, दम तथा भावशुद्धि श्रेष्ठ तीर्थ है। ज्ञानरूपी सरोवर और ध्यानरूपी जलमें, राग-द्वेषादि रूप मलका नाश करनेके लिये ऐसे मानस तीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है।

यह तीर्थ है, यह तीर्थ नहीं है—जो लोग इस प्रकारके भेद-ज्ञानको रखते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये तीर्थगमन और उसके उत्तम फलका विधान किया गया है, किंतु जो 'सर्वत्र ब्रह्ममय है' ऐसा स्वीकार करते हैं, उनके लिये कोई भी स्थान अतीर्थ नहीं है। इन सभीमें स्नान, दान, श्राद्ध, पिण्डदान आदि कर्म करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है। समस्त पर्वत, समस्त नदियाँ एवं देवता, ऋषि-मुनि तथा संतों आदिसे सेवित स्थान तीर्थ ही हैं—

इदं तीर्थमिदं नेति ये नरा भेददर्शिनः।
तेषां विधीयते तीर्थगमनं तत्फलं च यत्॥
सर्वं ब्रह्मेति यो वेत्ति नातीर्थं तस्य किञ्चन।
एतेषु स्नानदानानि श्राद्धं पिण्डमथाक्षयम्॥
सर्वा नद्यः सर्वशैलाः तीर्थं देवादिसेवितम्।
(८१।२५-२७)

श्रीरंगपत्तनम् भगवान् हरिका महान् तीर्थ है। ताप्ती एक श्रेष्ठ महानदी है। सप्तगोदावरी एवं कोणगिरि भी महातीर्थ हैं। कोणगिरितीर्थमें महालक्ष्मी नदीके रूपमें स्वयं विराजमान रहती हैं। सह्यपर्वतपर भगवान् देवदेवेश्वर एकवीर तथा महादेवी सुरेश्वरी निवास करती हैं।

गङ्गाद्वार, कुशावर्त, विन्ध्यपर्वत, नीलगिरि और कनखल—इन महातीर्थोंमें जो व्यक्ति स्नान करता है, वह पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता—

गङ्गाद्वारे कुशावर्ते विन्ध्यके नीलपर्वते॥
स्नात्वा कनखले तीर्थे स भवेन्न पुनर्भवे।
(८१।२९-३०)

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काण्ड ] गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल १३१


सूतजीने (आगे) कहा कि उपर्युक्त वर्णित और अन्य जो अवर्णित तीर्थ हैं, सभी स्नानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेपर सदैव सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं।
इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे तीर्थोंका माहात्म्य सुनकर ब्रह्माने दक्षप्रजापति आदिके साथ महामुनि व्यासको उनका श्रवण कराया और पुनः तीर्थोत्तम एवं अक्षय फल देनेवाले तथा ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले 'गया' नामक तीर्थका वर्णन किया।
(अध्याय ८१)


गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल

ब्रह्माजीने कहा—हे व्यासजी! मैं भुक्ति और मुक्ति प्राप्त करानेवाले परम सार-स्वरूप उत्तम गया-माहात्म्यको संक्षेपमें कहूँगा, आप सुनें।

पूर्वकालमें गय नामक परम वीर्यवान् एक असुर हुआ। उसने सभी प्राणियोंको संतप्त करनेवाली महान् दारुण तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतप्त देवगण उसके वधकी इच्छासे भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। श्रीहरिने उनसे कहा—आप लोगोंका कल्याण होगा, इसका महादेह गिराया जायगा। देवताओंने 'बहुत अच्छा' इस प्रकार कहा। एक समय शिवजीकी पूजाके लिये क्षीरसमुद्रसे कमल लाकर गय नामका वह बलवान् असुर विष्णुमायासे विमोहित होकर कीकटदेशमें शयन करने लगा और उसी स्थितिमें वह विष्णुकी गदाके द्वारा मारा गया।

भगवान् विष्णु मुक्ति देनेके लिये 'गदाधर'के रूपमें गयामें स्थित हैं। गयासुरके विशुद्ध देहमें ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह स्थित हैं, विष्णुने वहाँकी मर्यादा स्थापित करते हुए कहा कि इसका देह पुण्यक्षेत्रके रूपमें होगा। यहाँ जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान अथवा स्नानादि करेगा, वह स्वर्ग तथा ब्रह्मलोकमें जायगा, नरकगामी नहीं होगा। पितामह ब्रह्माने गयातीर्थको श्रेष्ठ जानकर वहाँ यज्ञ किया और ऋत्विक्-रूपमें आये हुए ब्राह्मणोंकी पूजा की।

ब्रह्माने वहाँ रसवती अर्थात् जलसे परिपूर्ण एक विशाल नदी, वापी, जलाशय आदि तथा विविध भक्ष्य, भोज्य, फल आदि और कामधेनुकी सृष्टि की। तदनन्तर ब्रह्माने इन सब साधनोंसे सम्पन्न पाँच कोशके परिक्षेत्रमें फैले हुए उस गया तीर्थका दान उन ब्राह्मणोंको कर दिया।

ब्राह्मणोंने उस धर्मयज्ञमें दिये गये धनादिक दानको लोभवश ही स्वीकार किया था। अतः उसी कालसे वहाँके ब्राह्मणोंके लिये यह शाप हो गया कि 'तुम्हारे द्वारा अर्जित विद्या और धन तीन पुरुषपर्यन्त अर्थात् तीन पीढ़ियोंतक स्थायी नहीं रहेगा। तुम्हारे इस गया परिक्षेत्रमें प्रवाहित होनेवाली रसवती नदी जल एवं पत्थरोंके पर्वतमात्रके रूपमें ही अवस्थित रहेगी।

संतप्त ब्राह्मणोंके द्वारा प्रार्थना करनेपर प्रभु ब्रह्माने अनुग्रह किया और कहा—गयामें जिन पुण्यशाली लोगोंका श्राद्ध होगा, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य यहाँ आकर आप सभीका पूजन करेंगे, उनके द्वारा मैं भी अपनेको पूजित स्वीकार करूँगा।

'ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—ये चारों मुक्तिके साधन हैं'—

ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा।
वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥
(८२।१५)

६६- गयातीर्थमें पिण्डदानकी महिमा

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१३२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


हे व्यासजी! सभी समुद्र, नदी, वापी, कूप, तडागादि जितने भी तीर्थ हैं; वे सब इस गयातीर्थमें स्वयमेव स्नान करनेके लिये आते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

'गयामें श्राद्ध करनेसे ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णकी चोरी, गुरुपत्नीगमन और उक्त संसर्ग-जनित सभी महापातक नष्ट हो जाते हैं'—
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः।
पापं तत्संगजं सर्वं गयाश्राद्धाद् विनश्यति॥
(८२।१७)

जिनकी संस्काररहित दशामें मृत्यु हो जाती है अथवा जो मनुष्य पशु तथा चोरद्वारा मारे जाते हैं या जिनकी मृत्यु सर्पके काटनेसे होती है, वे सभी गया-श्राद्धकर्मके पुण्यसे बन्धनमुक्त होकर स्वर्ग चले जाते हैं।

'गयातीर्थमें पितरोंके लिये पिण्डदान करनेसे मनुष्यको जो फल प्राप्त होता है, सौ करोड़ वर्षोंमें भी उसका वर्णन मेरे द्वारा नहीं किया जा सकता।'

ब्रह्माजीने पुनः व्यासजीसे कहा—कीकट-देशमें गया पुण्यशाली है। राजगृह, वन तथा विषयचारण परम पवित्र है एवं नदियोंमें पुनःपुना नामक नदी श्रेष्ठ है।

गयातीर्थमें पूर्व, पश्चिम, दक्षिण तथा उत्तरमें 'मुण्डपृष्ठ' नामक तीर्थ है, जिसका मान ढाई कोश विस्तृत कहा गया है। 'गयाक्षेत्रका परिमाण पाँच कोश और गयाशिरका परिमाण एक कोश है। वहाँपर पिण्डदान करनेसे पितरोंको शाश्वत तृप्ति हो जाती है'—
पञ्चक्रोशं गयाक्षेत्रं क्रोशमेकं गयाशिरः।
तत्र पिण्डप्रदानेन तृप्तिर्भवति शाश्वती॥
(८३।३)

विष्णुपर्वतसे लेकर उत्तरमानसतकका भाग गयाका सिर माना गया है। उसीको फल्गुतीर्थ भी कहा जाता है। यहाँपर पिण्डदान करनेसे पितरोंको परमगति प्राप्त होती है। गयागमनमात्रसे ही व्यक्ति पितृऋणसे मुक्त हो जाता है—
गयागमनमात्रेण पितॄणामनृणो भवेत्॥
(८३।५)

गयाक्षेत्रमें भगवान् विष्णु पितृदेवताके रूपमें विराजमान रहते हैं। पुण्डरीकाक्ष उन भगवान् जनार्दनका दर्शन करनेपर मनुष्य अपने तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। गयातीर्थमें रथमार्ग तथा रुद्रपद आदिमें कालेश्वर भगवान् केदारनाथका दर्शन करनेसे मनुष्य पितृऋणसे विमुक्त हो जाता है।

वहाँ पितामह ब्रह्माका दर्शन करके वह पापमुक्त और प्रपितामहका दर्शनकर अनामयलोककी प्राप्ति करता है। उसी प्रकार गदाधर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुको प्रयत्नपूर्वक प्रणाम करनेसे उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

हे ब्रह्मर्षि! गयातीर्थमें (मौन धारण करके जो) मौनादित्य और महात्मा कनकार्कका दर्शन करता है, वह पितृऋणसे विमुक्त हो जाता है और ब्रह्माकी पूजा करके ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठ करके गायत्रीदेवीका दर्शनकर विधि-विधानसे प्रातःकालीन संध्या सम्पन्न करता है, उसे सभी वेदोंका फल प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति मध्याह्नकालमें सावित्रीदेवीका दर्शन करता है, वह यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार जो सायंकालमें सरस्वतीदेवीका दर्शन करता है, उसे दानका फल प्राप्त होता है।

यहाँ पर्वतपर विराजमान भगवान् शिवका दर्शन करके मनुष्य अपने पितृऋणसे विमुक्त हो जाता है। धर्मारण्य और उस पवित्र वनके स्वामी धर्मस्वरूप देवका दर्शन करनेसे समस्त ऋण नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार गृध्रेश्वर महादेवका दर्शन