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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 137

काण्ड ] भीष्मकमणिकी परीक्षा-विधि १२७


जिस पत्थरका वर्ण पूर्णरूपसे नीला और शुक्लवर्णसमन्वित तथा स्निग्ध होता है, वह सोमालक गुणयुक्त मणि है। जो पत्थर अत्यन्त लोहित वर्णका होता है, उसीको 'पद्मराग' कहा जाता है। जो पूर्ण नीलवर्णकी सुन्दर आभासे सम्पन्न रहता है, उसे 'इन्द्रनीलमणि' कहते हैं।

मणिशास्त्रवेत्ताओंने वैदूर्यमणिके समान ही पुष्पराजमणिका मूल्य स्वीकार किया है। इसको धारण करनेसे वही फल प्राप्त होते हैं, जो वैदूर्यमणिके धारणसे होते हैं। नारियोंके द्वारा धारण किये जानेपर यह मणि उन्हें 'पुत्र' प्रदान करती है।
(अध्याय ७४)


कर्केतनमणिकी परीक्षा-विधि

सूतजीने कहा—पवनदेवने रत्नबीजरूप उस दैत्यराज बलासुरके नखोंको प्रसन्नतापूर्वक लेकर कमल-वनप्रान्तमें बिखेर दिया। वायुद्वारा विकीर्ण उन नखोंसे पृथिवीपर कर्केतन नामक पूज्यतम मणिका जन्म हुआ। उसका वर्ण रक्त, चन्द्र एवं मधुसदृश, ताम्र, पीत, अग्निवत् प्रज्वलित, समुज्ज्वल, नील तथा श्वेत होता है। रत्न-व्याधि आदि दोषोंके कारण वह कठोर एवं विभिन्न वर्णोंमें भी प्राप्त होती है।

जो कर्केतनमणियाँ स्निग्ध, स्वच्छ, समराग, अनुरञ्जित, पीत, गुरुत्व धर्मसे संयुक्त एवं विचित्र आभासे व्याप्त तथा संताप, व्रण और व्याधि आदि दोषोंसे रहित होती हैं, उन्हें विशुद्ध या परम पवित्र माना जाता है।

स्वर्णपत्रमें सम्पुटितकर जब उन मणियोंको अग्निमें शोधित किया जाता है तो वे अत्यधिक देदीप्यमान हो उठती हैं। ऐसी विशुद्ध कर्केतनमणि रोगका नाश करनेवाली, कलिके दोषोंको नष्ट करनेवाली, कुलकी वृद्धि करनेवाली तथा सुख प्रदान करनेवाली होती है।

जो मनुष्य अपने शरीरको अलंकृत करनेके लिये इस प्रकारके बहुत-से गुणोंवाली कर्केतन नामक मणिको धारण करते हैं, वे पूजित, प्रचुर धनसे परिपूर्ण तथा अनेक बन्धु-बान्धवोंसे सम्पन्न होते हैं और नित्य उज्ज्वल कीर्तिसे सम्पन्न तथा प्रसन्न रहते हैं।

अन्य दूषित कर्केतनमणिको धारण करनेवाले विकृत, व्याकुल, नीली कान्तिवाले, मलिन द्युतिवाले, स्नेहरहित, कलुषित तथा विरूपवान् हो जाते हैं। वे तेज, दीप्ति, कुल, पुष्टि आदिसे विहीन होकर दूषित कर्केतनके सदृश शरीरको धारण करते हैं।
(अध्याय ७५)


भीष्मकमणिकी परीक्षा-विधि

सूतजीने पुनः कहा—उस देवशत्रु बलासुरका वीर्य हिमालय पर्वतके उत्तरी प्रान्तमें गिरा था। अतः वह देश उत्तम भीष्मकमणियोंका रत्नाकर बन गया। वहाँसे प्राप्त होनेवाली भीष्मकमणियाँ शङ्ख एवं पद्मके समान समुज्ज्वल, मध्याह्नकालीन सूर्यकी प्रभाके समान शोभावाली तथा वज्रके समान तरुण होती हैं।

जो मनुष्य अपने कण्ठादिक अङ्गोंमें स्वर्णसूत्रमें गुँथी हुई विशुद्ध भीष्मकमणिको धारण करता है, वह सदा सुख-समृद्धि प्रदान करनेवाली सम्पदाओंको प्राप्त करता है। वनोंमें भी ऐसी मणिसे सुशोभित मनुष्यको देखकर समीप आये हुए द्वीपी, भेड़िया, शरभ, हाथी, सिंह और व्याघ्रादि हिंसक वन्य प्राणी तत्काल भाग जाते हैं।