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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

२७४- लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा

Page 624Permalink
६१४संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

उनकी नाभिसे सम्पूर्ण जगत्‌का आश्रयभूत हिरण्मय पद्म प्रादुर्भूत हुआ। इसे प्राकृत सृष्टिके रूपमें समझना चाहिये। उस सृष्टिकी अभिमानिनी देवता भूदेवी थीं। वह पद्म असंख्य सूर्योंके समान प्रकाशवाला कहा गया है। चिदानन्दमय विष्णु उससे भिन्न हैं, उस पद्मको भगवान्‌के किरीट आदि आभूषणोंके समान समझना चाहिये।

हरिके किरीट आदि भी दो प्रकारके हैं—एक स्वरूपभूत तथा दूसरे स्वरूपभिन्न। उस पद्मसे सभी लोकोंके विधायक ब्रह्माण्डकी सृष्टि हुई। उस हिरण्मय पद्मसे चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। किसने मेरी सृष्टि की है, वह प्रभु कौन है? ऐसी जिज्ञासावश ब्रह्मा उस पद्मके नालमें प्रविष्ट हो गये। किंतु अज्ञानवश जब वे नारायणके विषयमें कुछ जान न सके तब उस समय उन्हें 'तप', 'तप' इस प्रकार ये दो शब्द सुनायी दिये। उन शब्दोंके अभिप्रायको ठीक-ठीक समझते हुए विष्णुमें एकमात्र निष्ठा रखनेवाले ब्रह्माने हरिकी प्रीति प्राप्त करनेकी इच्छासे दिव्य हजार वर्षतक तपस्या की। हे खगेन्द्र! तपस्यासे प्रसन्न होकर हरि भक्तश्रेष्ठ ब्रह्माको दिव्य वर प्रदान करनेके लिये प्रकट हो गये। भगवान्‌ चतुर्भुजधारी थे, कमलके समान उनके नेत्र थे, वक्षःस्थल श्रीवत्ससे सुशोभित था तथा गला कौस्तुभमणिकी मालासे अलंकृत था, वे अत्यन्त प्रसन्न मुद्रामें थे, उनके नेत्र करुणासे आर्द्र थे। ऐसे उन नारायणका ब्रह्माको दर्शन हुआ।

भक्तोंके वशमें रहनेवाले, अत्यन्त दयालु परब्रह्मस्वरूप नारायणको अपने समक्ष देखकर ब्रह्माने बड़ी ही श्रद्धा-भक्तिसे उनकी पूजा की और उनके पादतीर्थको मस्तकपर धारण किया। तदनन्तर भक्तिमानोंमें श्रेष्ठ तथा महाभागवतोंमें प्रधान ब्रह्माने उन हरिकी अनेक प्रकारसे स्तुति की और उनके सामने वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

श्रीकृष्णने पुनः कहा—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुति किये जानेपर दयाके सागर भगवान्‌ मधुसूदन मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—हे ब्रह्मन्‌! मेरे प्रसादसे इन देवताओंकी वैसी ही सृष्टि आप करें, जिस प्रकार पूर्वकालमें आपके द्वारा हुई थी। यद्यपि इस सृष्टि-कार्यसे आपका कोई प्रयोजन नहीं है, फिर भी मेरी प्रसन्नताके लिये आप ऐसा करें। हरिके ऐसा कहनेपर ब्रह्माने उन हरिकी स्तुति करके उनकी प्रसन्नताके लिये मनमें सृष्टि करनेका निर्णय लिया। तब महत्तत्वात्मक ब्रह्माने सर्वप्रथम जीवके अभिमानी देवता वायुदेवकी सृष्टि की। हे गरुड! वे ही प्रथम सृष्टिके पुरुषात्मा हैं। तदनन्तर ब्रह्माने अपने दाहिने हाथसे ब्रह्माणी तथा भारती नामक दो देवियोंकी सृष्टि की। बायें हाथसे सत्यके पुत्र महत्तत्वात्मक अनलको उत्पन्न किया। ब्रह्माके दाहिने हाथसे ही अहंकारात्मक हरकी सृष्टि हुई। इसी प्रकार गरुड, शेष, वायु, गायत्री, वारुणी, सौपर्णी, चन्द्र, इन्द्र, कामदेव, इन्द्रियोंके अभिमानी देवताओं, मनु-शतरूपा, दक्ष, नारदादि ऋषियों, कश्यप, अदितिदेवी, वसिष्ठ आदि ब्रह्मज्ञानी ऋषियों, कुबेर, विष्वक्सेन तथा पर्जन्य आदि देवसृष्टिका उनसे प्रादुर्भाव हुआ। हे खगेश्वर! मेरी कृपासे ही ब्रह्मा इस सृष्टि-कार्यमें समर्थ हो सके।

(अध्याय १०—१३)