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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 141

काण्ड ] गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल १३१


सूतजीने (आगे) कहा कि उपर्युक्त वर्णित और अन्य जो अवर्णित तीर्थ हैं, सभी स्नानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेपर सदैव सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं।
इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे तीर्थोंका माहात्म्य सुनकर ब्रह्माने दक्षप्रजापति आदिके साथ महामुनि व्यासको उनका श्रवण कराया और पुनः तीर्थोत्तम एवं अक्षय फल देनेवाले तथा ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले 'गया' नामक तीर्थका वर्णन किया।
(अध्याय ८१)


गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल

ब्रह्माजीने कहा—हे व्यासजी! मैं भुक्ति और मुक्ति प्राप्त करानेवाले परम सार-स्वरूप उत्तम गया-माहात्म्यको संक्षेपमें कहूँगा, आप सुनें।

पूर्वकालमें गय नामक परम वीर्यवान् एक असुर हुआ। उसने सभी प्राणियोंको संतप्त करनेवाली महान् दारुण तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतप्त देवगण उसके वधकी इच्छासे भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। श्रीहरिने उनसे कहा—आप लोगोंका कल्याण होगा, इसका महादेह गिराया जायगा। देवताओंने 'बहुत अच्छा' इस प्रकार कहा। एक समय शिवजीकी पूजाके लिये क्षीरसमुद्रसे कमल लाकर गय नामका वह बलवान् असुर विष्णुमायासे विमोहित होकर कीकटदेशमें शयन करने लगा और उसी स्थितिमें वह विष्णुकी गदाके द्वारा मारा गया।

भगवान् विष्णु मुक्ति देनेके लिये 'गदाधर'के रूपमें गयामें स्थित हैं। गयासुरके विशुद्ध देहमें ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह स्थित हैं, विष्णुने वहाँकी मर्यादा स्थापित करते हुए कहा कि इसका देह पुण्यक्षेत्रके रूपमें होगा। यहाँ जो भक्ति, यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान अथवा स्नानादि करेगा, वह स्वर्ग तथा ब्रह्मलोकमें जायगा, नरकगामी नहीं होगा। पितामह ब्रह्माने गयातीर्थको श्रेष्ठ जानकर वहाँ यज्ञ किया और ऋत्विक्-रूपमें आये हुए ब्राह्मणोंकी पूजा की।

ब्रह्माने वहाँ रसवती अर्थात् जलसे परिपूर्ण एक विशाल नदी, वापी, जलाशय आदि तथा विविध भक्ष्य, भोज्य, फल आदि और कामधेनुकी सृष्टि की। तदनन्तर ब्रह्माने इन सब साधनोंसे सम्पन्न पाँच कोशके परिक्षेत्रमें फैले हुए उस गया तीर्थका दान उन ब्राह्मणोंको कर दिया।

ब्राह्मणोंने उस धर्मयज्ञमें दिये गये धनादिक दानको लोभवश ही स्वीकार किया था। अतः उसी कालसे वहाँके ब्राह्मणोंके लिये यह शाप हो गया कि 'तुम्हारे द्वारा अर्जित विद्या और धन तीन पुरुषपर्यन्त अर्थात् तीन पीढ़ियोंतक स्थायी नहीं रहेगा। तुम्हारे इस गया परिक्षेत्रमें प्रवाहित होनेवाली रसवती नदी जल एवं पत्थरोंके पर्वतमात्रके रूपमें ही अवस्थित रहेगी।

संतप्त ब्राह्मणोंके द्वारा प्रार्थना करनेपर प्रभु ब्रह्माने अनुग्रह किया और कहा—गयामें जिन पुण्यशाली लोगोंका श्राद्ध होगा, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य यहाँ आकर आप सभीका पूजन करेंगे, उनके द्वारा मैं भी अपनेको पूजित स्वीकार करूँगा।

'ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—ये चारों मुक्तिके साधन हैं'—

ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा।
वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥
(८२।१५)