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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 128 of 634

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Page 128
१९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रकारोंका वर्णन किया है, उनमें शङ्खसे उत्पन्न और हाथीसे प्राप्त होनेवाली मुक्ताको अधम कहा है।

शङ्खसे उत्पन्न मुक्ता, अपने मूल कारणके मध्यभागमें अवस्थित वर्णके समान वर्णवाली तथा परिमाणमें बृहल्लोल फलके सदृश होती है। जो मुक्ता हाथीके कुम्भस्थलसे निकलती है, वह पीतवर्णवाली एवं प्रभाविहीन होती है। जो शङ्खोद्भव मुक्ताएँ हैं, वे शार्ङ्गधनुषके तुल्य वर्णको प्राप्त पीतशङ्खोंके श्रेष्ठ गोत्रमें ही उत्पन्न होती हैं। जो गजमुक्ताएँ हैं, उनका भी जन्म विशुद्ध वंशवाले मदमत्त गजराजोंमें होता है, उन्हें मौक्तिकप्रभव अर्थात् गजमुक्ता नामसे अभिहित किया गया है। इनसे प्राप्त मुक्ता पूर्णतया पीतवर्णसे युक्त एवं प्रभाविहीन होती है।

मत्स्यसे उत्पन्न मुक्ता पाठीन मत्स्यके पीठके समान वर्णवाली, अत्यन्त सुन्दर, वृत्ताकार, लघु एवं अत्यधिक सूक्ष्म होती है। यह जलचर प्राणियोंके मुखोंमें प्राप्त होती है, उनमें भी जो मत्स्य अथाह समुद्रकी जलराशिमें विचरण करते हैं, वे इसके जनक होते हैं।

वराहके दाँतसे उत्पन्न मुक्ता उसके ही दन्ताङ्कुरोंके सदृश वर्णवाली होती है, किंतु ऐसी मुक्ता प्रदान करनेवाले विशिष्ट वराहराज कहीं किसी विशेष भूप्रदेशमें ही पाये जाते हैं।

बाँसके पर्वोंसे उत्पन्न मुक्ताएँ वर्षोपल (ओले)-के समान समुज्ज्वल वर्णकी सुन्दर शोभासे सुशोभित रहती हैं। ऐसी मुक्ताओंके जनक बाँसोंके वंश दिव्यजनोंके लिये उपभोग्य विशेष स्थानमें अङ्कुरित होते हैं। वे सार्वजनिक स्थानोंमें नहीं पाये जाते।

सर्पमुक्ता मत्स्यमुक्ताके सदृश विशुद्ध तथा वृत्ताकार होती है। स्थान-विशेषके कारण उसकी अत्यन्त उज्ज्वल शोभा होती है। इसकी कान्ति शाणपर चढ़ायी गयी तलवारकी धारके समान अत्यन्त स्वच्छ होती है। सर्पके सिरसे प्राप्त होनेवाली इस मुक्ताको अर्जित करनेवाले मनुष्य अतिशय प्रभासम्पन्न, राज्यलक्ष्मीसे युक्त तथा दुःसाध्य महान् ऐश्वर्यसम्पन्न, तेजस्वी एवं पुण्यवान् होते हैं।

रत्नोंके गुण एवं अवगुणोंको जाननेकी इच्छासे यदि रत्न-विधियोंमें पूर्ण अधिकार रखनेवाले विद्वानोंके द्वारा शुभ मुहूर्तमें प्रयत्नपूर्वक समस्त रक्षाविधिसे सम्पन्न भवनके ऊपर उस मुक्ताको स्थापित करा दिया जाय तो उस समय आकाशमें देव-दुन्दुभियोंकी ध्वनि परिव्याप्त हो उठती है। इन्द्रधनुषकी टंकार, विद्युल्लताओंके संघर्षण एवं सघन पयोधरोंकी पारस्परिक टकराहटसे अन्तरिक्ष आच्छादित हो उठता है।

जिसके कोशागारमें यह सर्पमुक्ता रहती है, उसकी मृत्यु सर्प, राक्षस, व्याधि या अन्य आभिचारिक दोषके कारण नहीं होती।

मेघसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता पृथ्वीतक आ ही नहीं पाती। देवगण आकाशमें ही उसका हरण कर लेते हैं। उस मेघमुक्ताके तेजकी दिव्य कान्तिसे अनावृत समस्त दिशाएँ आलोकित हो उठती हैं। सूर्यके समान देदीप्यमान उसका परिमण्डल देखनेमें कष्टसाध्य होता है। अग्नि, चन्द्र, नक्षत्र तथा ताराओंके तेजको तिरस्कृत करके जैसे सूर्यके कारण दिन प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार गहन अन्धकारसे भरी हुई रात्रियोंमें भी उस मेघमुक्ताका तेज दिनकी प्रभाके समान ही प्रभाको विकीर्ण करता है। विचित्र रत्नकान्तिको प्राप्त सुन्दर आभूषणको प्रशस्त बनानेके लिये जलराशिवाले चारों समुद्रोंसे इस मुक्ताका जन्म हुआ है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह जिसके पास रहती है, वह राजा होता है। उसके राज्यकी सम्पूर्ण भूमि सोनेसे परिपूर्ण होती है। कदाचित् शुभ तथा महान् कर्मविपाकसे यदि

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