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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 127

काण्ड ] मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि ११७


उसका मूल्य बहुत ही कम हो जाता है। यदा-कदा जो हीरा सबसे पहले गुण-सम्पत्तियोंसे परिपुष्ट माना जाता है, वही बादमें दोषयुक्त हो जाता है। राजाको ऐसे दोषपूर्ण हीरेसे बने आभूषणको धारण नहीं करना चाहिये। गुणहीन होनेपर तो मणि भी आभूषणके योग्य नहीं होती है।

पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रीके लिये सर्वगुण-सम्पन्न होनेपर भी हीरा प्रशस्त नहीं होता है। दीर्घ, चिपटा, ह्रस्व तथा अन्यान्य गुणोंसे रहित हीरेके विषयमें कुछ कहना ही नहीं, वह तो दोषपूर्ण होता ही है।

हीरेके कुशल विशेषज्ञ लौह, पुष्पराग, गोमेद, वैदूर्य, स्फटिक एवं विविध प्रकारके काँचोंसे हीरकके प्रतिरूपोंका निर्माण कर लेते हैं। अतः विद्वानोंको कुशल परीक्षकोंसे उनकी परीक्षा करवा लेनी चाहिये।

क्षारद्रव्यके द्वारा, उल्लेखन-विधिसे एवं शाण-प्रयोगसे हीरोंका परीक्षण करना चाहिये। पृथिवीमें जितने भी रत्न हैं अथवा लौहादिक जितनी अन्य धातुएँ हैं, हीरा उन सबमें चिह्नाङ्कन कर सकता है; किंतु अन्य कोई भी रत्न या धातु हीरेमें चिह्न करनेमें समर्थ नहीं है।

गुरुता समस्त रत्नोंके महत्त्वका कारण है, फिर भी रत्नशास्त्रज्ञ हीरेके विषयमें इस निर्देशके विपरीत ही कहते हैं।

पुष्परागादि जातिविशेषके रत्न दूसरी जातिके रत्नको काट सकते हैं, किंतु हीरक एवं कुरुविन्द* अपनी ही जातिके रत्नको काटनेमें सक्षम होते हैं। हीरेसे हीरा ही कट सकता है, अन्य रत्नोंसे वह हीरा काटा नहीं जा सकता है।

स्वाभाविक हीरेके अतिरिक्त हीरक तथा मुक्तादि जितने प्रकारके रत्न हैं, उनमें किसी भी रत्नकी प्रभा ऊर्ध्वगामिनी नहीं होती है। मात्र हीरा ही ऐसा रत्न है, जिसकी प्रभा ऊपरकी ओर जाती है।

यदि हीरा टूटे हुए किनारोंसे दोषयुक्त हो या विन्दु तथा रेखासे समन्वित हो अथवा विशेष वर्णसे रहित हो तो भी इन्द्रायुध-चिह्नसे अङ्कित होनेपर वह मनुष्यको धन-धान्य एवं पुत्रादिसे परिपूर्ण करता है।

जो राजा विद्युत्-तुल्य, समुज्ज्वल एवं चमकते हुए शोभा-सम्पन्न हीरेको धारण करता है, वह अपने पराक्रमसे दूसरेके प्रतापको आक्रान्त करनेमें समर्थ होता है तथा अपने समस्त सामन्तोंको वशमें रखकर वह पृथिवीका उपभोग करता है। (अध्याय ६८)


मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि

सूतजीने कहा— श्रेष्ठ हाथी, जीमूत (मेघ), वराह, शङ्ख, मत्स्य, सर्प, शुक्ति तथा बाँसमें उत्पन्न मुक्ताफलोंकी संसारमें प्रसिद्धि है; किंतु इनमें शुक्ति (सीप)-में प्रादुर्भूत मुक्ताएँ ही अधिक उपलब्ध हैं।

मुक्ताशास्त्री कहते हैं कि इन मुक्ताओंमें मात्र एक ही ऐसी मुक्ता होती है, जिसको रत्नपदपर अधिष्ठित किया जा सकता है। वह शुक्तिसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता है। यह सूचिकादि यन्त्रोंसे वेध्य होती है, शेष मुक्ताएँ अवेध्य हैं।

प्रायः बाँस, हाथी, मत्स्य, शङ्ख एवं वराहसे उत्पन्न मुक्ताएँ प्रभावहीन होती हैं; फिर भी माङ्गलिक होनेसे वे प्रशस्त मानी जाती हैं।

रत्ननिर्णायक विद्वानोंने मुक्ताओंके जिन आठ


* कुरुविन्द—माणिक्य अथवा कुरुबिल्व नामका रत्नविशेष।