Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 126 of 634

Read in context
Page 126
११६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

है, वह राजाओंके लिये लाभप्रद है। सभी वर्णोंका स्वामी होनेके कारण अथवा समस्त वर्णोंके गुणोंको अपनेमें समाविष्ट करनेके उद्देश्यसे राजाओंको सभीके कल्याणकी इच्छासे उक्त दो प्रकारके हीरोंको धारण करना चाहिये। ऐसे हीरोंको धारण करनेका अधिकार अन्यके लिये किसी भी प्रकारसे नहीं है।

जिस प्रकार लोकमें निम्न और उच्च वर्णका वर्णसांकर्य दोषावह एवं दुःखदायी होता है, रत्नोंका वर्णसांकर्य उससे भी अधिक दुःखदायी होता है।

केवल वर्णमात्रको देखकर ही विद्वानोंको रत्नका संचय नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो गुणवान् रत्न होता है, वही गुण और सम्पत्तिकी विभूति होता है, इसके विपरीत गुणहीन रत्न कष्टका हेतु होता है। जिस हीरेका एक भी शृंग टूटा हुआ अथवा छिन्न-भिन्न दिखायी दे तो गुणवान् होनेपर भी धनार्थीजनोंको उसे अपने घरमें नहीं रखना चाहिये।

अग्निके समान स्फुटित, विशीर्ण शृंगभागसे युक्त, मलिन वर्णवाले तथा मध्यमें विन्दुओंसें चिह्नित हीरकको धारण करनेपर इन्द्र भी श्रीहीन हो जाते हैं। ऐसे हीरेके संग्रह करनेकी लालसा नहीं करनी चाहिये। जिस हीरेका एक भाग अस्त्र-शस्त्रादिसे विदीर्ण क्षत-विक्षत शरीरकी आभाको प्राप्त हो तथा वह रक्तवर्णसे चित्रित हो तो वैसा हीरा इच्छा-मृत्युसे सम्पन्न शक्तिशाली व्यक्तिकी भी शीघ्र मृत्युको रोक नहीं सकता है। ऐसे हीरेको धारण नहीं करना चाहिये।

षट्कोण, अष्टकोण, द्वादशकोण, षट्पार्श्व, अष्टपार्श्व, द्वादशपार्श्व, षड्धारा, अष्टधारा, द्वादशधारा, उत्तुंग, सम एवं तीक्ष्णाग्र भाग हीरेके खानिक अर्थात् प्रकृतिगत गुण हैं।

जो हीरा षट्कोण, विशुद्ध, निर्मल, तीक्ष्ण धारवाला लघु, सुन्दर पार्श्वभागसे युक्त और निर्दोष है तथा इन्द्रायुध वज्रके समान स्फुरित अपनी प्रभाको विकीर्ण करनेमें समर्थ हो तो अन्तरिक्ष भागमें स्थित वह हीरा इस पृथिवीलोकमें सुलभ नहीं है।

जो मनुष्य तीक्ष्णाग्र, निर्मल तथा दोषशून्य हीरेको धारण करता है, वह जीवनपर्यन्त प्रतिदिन स्त्री, सम्पत्ति, पुत्र, धन-धान्य और गवाधिक पशुओंकी श्रीवृद्धिको प्राप्त करता है। सर्प, विष, व्याधि, अग्नि, जल तथा तस्करादिक भय एवं अभिचार-मन्त्रोंके उच्चाटनादिक प्रयोग उसके सन्निकट आनेके पूर्व दूरसे ही प्रत्यागमित हो जाते हैं।

यदि हीरा सभी दोषोंसे रहित तथा भारमें बीस तण्डुलके बराबर हो तो मणिशास्त्रके पण्डितोंने उसका मूल्य अन्य हीरेकी अपेक्षा द्विगुण अधिक कहा है। पूर्वोक्त परिमाणमें तीन भाग, अर्द्धभाग, चतुर्थांश, त्रयोदशांश और तीसवाँ अंश, साठवाँ अंश, अस्सीवाँ अंश, शतांश तथा सहस्त्रांश भाग न्यूनाधिक होनेपर मूल्यका निर्धारण भी उसके समान ही न्यूनाधिक होता है।

आठ गौर सरसोंके दानोंके भारके बराबर एक तण्डुलका भार होता है।

जो हीरा सभी गुणोंसे सम्पन्न होता है और जलमें डालनेपर तैरता है, वह सभी रत्नोंमें सर्वश्रेष्ठ होता है। उसीको धारण करना उचित है।

जिस हीरेमें अल्पमात्र भी स्पष्ट अथवा अस्पष्ट दोष होता है तो स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा उस हीरेको मनुष्य दशांश कम मूल्यमें ही प्राप्त कर लेता है। जिस हीरेमें छोटे अथवा बड़े अनेक दोष प्रकट रहते हैं, उस हीरेका मूल्य स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा शतांश ही माना गया है।

अलंकारके रूपमें प्रयुक्त हीरेमें यदि किसी भी प्रकारका दोष परिलक्षित होता है तो अपेक्षाकृत