गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
१९६- प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान
| ३९६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
ऊर्ध्वमुख कुशके ऊपर स्थापित करके उसमें जल तथा पवित्रक भी (जो ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखा था) रख दे।
तत्पश्चात् 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मयज्ञोपवीतानि नमः' से विश्वेदेवोंको गन्धादि प्रदानकर समर्पित गन्ध आदिकी पूर्णताकी कामना 'गन्धादिदानमच्छिद्रमस्तु'—कहकर करे। विश्वेदेवोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से समर्पित चन्दनादिकी परिपूर्णता स्वीकार करे। ऋत्विक् ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से प्रत्युत्तर दे। श्राद्धकर्ता 'पितृपितामहप्रपितामहानां मातामह-प्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां सपत्नीकानां श्राद्धमहं करिष्ये' ऐसा कहकर पितरोंके श्राद्धकी अनुज्ञा माँगे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'कुरुष्व' इस वाक्यसे अनुज्ञात होनेपर 'ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च०' मन्त्रका तीन बार जप करे।
तदनन्तर पित्रादि एवं मातामहादिका नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'इदमासनं स्वधा' पदसे ब्राह्मणोंके वामपार्श्वमें आसन दानकर 'ॐ पितॄन् आवाहयिष्ये' से ब्राह्मणोंसे अनुज्ञाकी प्रार्थना करे और 'ॐ आवाहय' इस वाक्यसे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ उशन्तस्त्वा०' एवं 'ॐ आयान्तु नः पितरः०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितरोंका आवाहन करे। 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तिलका विकरण करे। पूर्वकी भाँति क्रमसे स्थापित अर्घ्यपात्रमें उदक दे तथा 'ॐ तिलोऽसि सोमदेवत्यो०' आदि मन्त्रोंसे तिल-दान करे।
इसके बाद दोनों हाथसे गन्ध, पुष्प प्रदानकर पितृपात्रको उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करके अन्तमें पित्रादिका गोत्र, नामका उल्लेख कर 'एष तेऽर्घ्यः स्वधा' से पवित्रीके साथ अर्घ्यपात्रको ग्रहण करनेके बाद वामपार्श्वमें कुशाके ऊपर 'ॐ पितृभ्यः स्थानमसि' मन्त्रसे अधोमुख अर्घ्यपात्रको स्थापित करे, फिर 'ॐ शुन्धन्तां लोकाः पितृसदनाः०' का पाठकर उस अधोमुख पात्रका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद पितृतीर्थसे पित्रादिके आसनपर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप वस्त्रयुग्म एवं यज्ञोपवीतादि देकर गोत्रनामोच्चारणपूर्वक सपत्नीक पितृ, पितामह एवं प्रपितामहको 'एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मसोत्तरीययज्ञोपवीतानि वः स्वधा' इस वाक्यको पढ़कर पितृतीर्थसे जल छोड़े। 'गन्धादिदानम् अक्षय्यम् अस्तु' ऐसा श्राद्धकर्ताके कहनेपर 'संकल्पसिद्धिरस्तु' इस प्रकार ब्राह्मण कहे। इसी प्रकार मातामहादिके लिये भी अनुज्ञापनादि कर्म करे। 'ॐ या दिव्या०' इस मन्त्रसे भूमिका सम्मार्जन करे। तदनन्तर घृतमिश्रित अन्न ग्रहणकर सव्य होकर 'ॐ अग्नौ करणमहं करिष्ये' द्वारा पितृब्राह्मणकी सेवामें अनुज्ञाकी प्रार्थना करे। 'ॐ कुरुष्व' इस वाक्यसे ब्राह्मणके द्वारा अनुज्ञात हो, 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें दो आहुति प्रदान करे। अवशिष्ट अन्न पिण्डार्थ स्थापित करके अन्नका आधा भाग पित्रादिके पात्रमें और मातामहादिके पात्रमें समर्पित करे।
इसके बाद जलपात्र मुद्रादि दक्षिणास्थापनपूर्वक भोजनपात्रके ऊपर कुशदान कर अधोमुख दोनों हाथोंके द्वारा भोजनपात्र स्पर्श करे। 'ॐ पृथिवी ते पात्रं०' इत्यादि मन्त्रपाठपूर्वक उस पात्रको अभिमन्त्रितकर उसपर अन्न परोसते हुए 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' मन्त्रका पाठ करे। 'विष्णो हव्यं रक्षस्व' से अन्नके मध्यमें अधोमुख अंगुष्ठसे स्पर्श करके 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तीन बार जौ एवं 'ॐ निहन्मि सर्वं०' से पीली सरसोंका विकरण करना चाहिये। तदनन्तर 'धूरिलोचनसंज्ञकेभ्यो देवेभ्य एतदन्नं सघृतं पानीयं सव्यञ्जनं स्वाहा' कहकर विश्वेदेवोंको अन्न निवेदन
कांड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१७
करते हुए उसके ऊपर सजल कुशपत्र रखकर श्राद्धकर्ता ‘ॐ अन्नमिदम् अक्षय्यम् अस्तु’ ऐसा उच्चारण करे एवं निमन्त्रित ब्राह्मण ‘ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’ इस प्रकार कहें।
तत्पश्चात् अपसव्य होकर पित्रादि-पात्रमें व्यञ्जनसहित घी मिले हुए अन्नको परोसकर उसके ऊपर भूमि-संलग्न कुशका स्थापन कर दोनों उत्तान हाथोंसे भोजनपात्र स्पर्श करते हुए ‘ॐ पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रका पाठ करे। ‘ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ एवं ‘ॐ विष्णोः कव्यं रक्षस्व’ इन मन्त्रोंसे समर्पित अन्नमें अंगुष्ठका स्पर्श करे। ‘ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः’ से अन्नके ऊपर तिल फैलाकर पृथ्वीपर बायाँ घुटना टिकाकर ‘अमुकगोत्रेभ्यः अस्मत् पितृपितामहेभ्यः सपत्नीकेभ्यः एतदन्नं सघृतं सपानीयं सव्यञ्जनं प्रतिषिद्धवर्जितं स्वधा’ इत्यादि वाक्यसे सपत्नीक पिता-पितामहादिको नाम-गोत्र-उच्चारणपूर्वक अन्नका निवेदन करे। अन्नका संकल्प करके ‘ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं०’ मन्त्रसे दक्षिणमुख होकर जलकी धारा प्रदान करे। ‘ॐ श्राद्धमिदमच्छिद्रमस्तु एवं ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’—इन दोनों मन्त्रोंका पाठकर ‘ॐ भूर्भुवः स्वः०’—इस व्याहृति-मन्त्रसे युक्त गायत्रीका उच्चारण कर विसर्जन करे। तदनन्तर ‘ॐ मधुवाता०’ मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करना चाहिये।
इसके साथ ‘यथासुखं वाग्यता जुषध्वम्’ का पाठकर ब्राह्मणोंके भोजन करते समय भक्तिपूर्वक ‘सप्तव्याधा०’ इत्यादि पितृस्तोत्रका पाठ करे<sup>१</sup>। इसके बाद ‘तृप्यस्व’ इस वाक्यका उच्चारण कर दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर ‘ॐ अग्निदग्धाश्च०<sup>२</sup>’ मन्त्रको पढ़कर भूमिमें कुशके ऊपर घीके साथ जलयुक्त अन्नको विकरित करे।
तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको मुखप्रक्षालनके लिये जल देकर प्रणवपूर्वक व्याहृतिके साथ गायत्री तथा ‘ॐ मधुवाता०’ इत्यादि मन्त्रोंका पाठकर मधु शब्दका तीन बार उच्चारण करे। ‘ॐ रुचितां भवद्भिः’ यह कहकर देव-ब्राह्मणोंसे विनम्रभावपूर्वक भोजनके रुचिपूर्ण (स्वादिष्ट) होनेका प्रश्न करे। देव-ब्राह्मणोंके द्वारा ‘सुरुचितम्’ यह उत्तर देनेपर ‘ॐ शेषमन्नम्’ यह विनम्रतासे प्रश्न करनेपर ब्राह्मण ‘ॐ इष्टैः सह भोजनम्’ अर्थात् इष्टजनोंके साथ आप भी भोजन करें—यह प्रत्युत्तर दें। तदनन्तर वामोपवीती (अपसव्य) होकर पित्रादि ब्राह्मणोंसे ‘ॐ तृप्ताः स्थ’ यह जिज्ञासा करे और उनके द्वारा ‘ॐ तृप्ताः स्मः’ इस वाक्यसे अनुज्ञात होकर भूमिका अभ्युक्षण और चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसमें तिल विकरित करे। ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः अमुकदेवशर्मन् सपत्नीकः एतत्ते पिण्डासनं स्वधा’ ऐसा कहकर पिण्डके लिये आसन दे और रेखाकरण करे। सप्रणव तथा व्याहृतिके साथ गाय्रीमन्त्र और ‘ॐ मधुवाता०’ आदि मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करते हुए घृतयुक्त अन्नसे पिण्डका निर्माण कर ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०’ इत्यादि वाक्यसे कुशोंके ऊपर पिता आदिके लिये पिण्ड प्रदान करे। पुनः रेखामध्यमें पहलेके समान पितामहको पिण्डदान तथा व्याहृतिपूर्वक गायत्री और ‘मधुवाता०’ का तीन बार जप करके पिण्डके समीपमें शेषान्नका विकरण करके ‘ॐ लेपभुजः पितरः प्रीयन्ताम्’ इस वाक्यसे (पिण्डाधार कुशमें)
१-सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्ीपे हंसाः सरसि मानसे॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं किमवसीदथ॥ (२१८।२०-२१)
२-अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम्॥ (२१८।२२)
| ३१८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
हाथका मार्जन करे। प्रक्षालित पिण्डजलसे 'ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०' इत्यादि वाक्यसे जलद्वारा पिण्डसेचन कर पिण्डपात्रको अधोमुख करके कृताञ्जलिपूर्वक 'ॐ पितरो मादयध्वं०' मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् जलस्पर्श करते हुए वामावर्तसे उत्तरमुख होकर प्राणवायुका तीन बार संयम करके 'ॐ षड्भ्य ऋतुभ्यो नमः' इस मन्त्रका पाठ करे।
इसके बाद वामावर्तसे दक्षिणमुख होकर भोजनपात्रमें पुष्प तथा 'अक्षतं चारिष्टं चास्तु०' से अक्षत दे। 'अमी मदन्तः पितरो यथाभागमावृषायिषत' इस मन्त्रका पाठ करते हुए वस्त्रको शिथिलकर अञ्जलि बनाकर 'ॐ नमो वः पितरो नमो वः०' इस मन्त्रका पाठ करे। तत्पश्चात् 'गृहान्नः पितरो दत्त' इस मन्त्रसे गृहका निरीक्षण करे। 'सदा वः पितरो द्वेष्मः' इस मन्त्रसे निरीक्षणकर 'एतद्वः पितरो वासः' यह मन्त्र पढ़कर 'अमुकगोत्र पितः एतत्ते वासः स्वधा' वाक्यसे पिण्डपर सूत्रदान करे।
तदनन्तर बायें हाथसे उदकपात्र ग्रहणकर 'ऊर्जं वहन्ती०' मन्त्रसे पिण्डके ऊपर जलधारा देकर पूर्वमें स्थापित अर्घ्यपात्रके बचे हुए जलसे प्रत्येक पिण्डका सेचन करे। फिर पिण्डावाहनपूर्वक पिण्डोंके ऊपर गन्ध और कुशदानकर 'अक्षन्नमीमदन्त०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। मातामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको आचमन कराये। 'ॐ सुप्रोक्षितमस्तु' इस वाक्यसे श्राद्धभूमिका भलीभाँति अभ्युक्षणकर 'अपां मध्ये स्थिता देवा सर्वमप्सु०' का उच्चारण करके 'शिवा आपः सन्तु' कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल दे। 'लक्ष्मीर्वसति०' आदिका पाठकर 'ॐ सौमनस्यमस्तु' यह मन्त्र पढ़कर ब्राह्मणोंके हाथमें पुष्प समर्पित करे। इसके बाद 'अक्षतं चास्तु०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर 'अक्षतं चारिष्टं चास्तु' यह कहते हुए यव और तण्डुल भी ब्राह्मणोंके हाथमें दे। तदनन्तर 'अमुकगोत्राणामस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां सपत्नीकानामिदमन्नपानादिकमक्षय्यमस्तु' इस वाक्यसे पित्रादि ब्राह्मणके हाथमें तिल और जलका दान करे। ब्राह्मण 'अस्तु' कहकर प्रतिवचन बोलें। इसी क्रममें मातामह आदिको अक्षत आदि दानकर उनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। तत्पश्चात् 'ॐ अघोराः पितरः सन्तु', 'गोत्रं नो वर्द्धतां०', 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे।
श्राद्धकर्ता 'सौमनस्यमस्तु' इस वाक्यका उच्चारण करे। ब्राह्मण 'अस्तु' यह कहें। तदनन्तर दिये गये पिण्डोंके स्थानमें अर्घ्यपात्रोंमें पवित्रकोंको छोड़ दे। बादमें कुशनिर्मित पवित्रक लेकर उससे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंका स्पर्शकर 'ॐ स्वधां वाचयिष्ये' इस वाक्यसे स्वधावाचनकी आज्ञा प्राप्त करे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'ॐ वाच्यताम्' इस वचनसे अनुज्ञात हो श्राद्धकर्ता 'ॐ पितृपितामहेभ्यो यथानामशर्मभ्यः सपत्नीकेभ्यः स्वधा उच्चताम्' ऐसा कहे। तदनन्तर ब्राह्मण 'अस्तु स्वधा' का उच्चारण करें।
श्राद्धकर्ता 'अस्तु स्वधा' इस वाक्यसे अनुज्ञात हो 'ऊर्जं वहन्तीरमृतं०' इस मन्त्रसे पिण्डके ऊपर जलधारा दे। फिर 'ॐ विश्वेदेवा अस्मिन् यज्ञे प्रीयन्ताम्' से देव-ब्राह्मणोंके हाथमें यव और जल प्रदान करे। 'ॐ प्रीयन्ताम्' इस वाक्यसे ब्राह्मणद्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ देवताभ्यः०' मन्त्रका तीन बार जप करे।
अधोमुख होकर पिण्डपात्रको हिलाकर आचमनपूर्वक दक्षिणोपवीती (सव्य) होकर पूर्वाभिमुख 'ॐ अमुकगोत्राय अमुकदेवशर्मणे०' इत्यादि मन्त्रसे देव-ब्राह्मणको दक्षिणा दे। तत्पश्चात् पितृ-ब्राह्मणोंकी सेवामें 'ॐ पिण्डाः सम्पन्नाः' यह निवेदन करनेपर 'ॐ सुसम्पन्नाः' इस प्रकार