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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 129

काण्ड ] मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि ११९


कोई दरिद्र भी इस मेघमुक्ताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्तिके पास जबतक यह रहती है, तबतक वह शत्रुओंसे रहित सम्पूर्ण पृथिवीका उपभोग करता है।

यह मेघमणि मात्र राजाके लिये ही शुभप्रद है, ऐसा नहीं है, अपितु प्रजाओंके भाग्यसे भी इसका जन्म होता है। यह अपने चारों ओर सहस्र योजनपर्यन्त क्षेत्रमें अनर्थोंको आने नहीं देती।

दैत्यराज बलासुरके मुखसे विशीर्ण हुई दन्तपंक्ति आकाशमें फैली हुई नक्षत्रमालाके समान प्रतीत होती थी। विचित्र वर्णोंमें भी अपना विशुद्ध स्थान रखनेवाली वह दन्तावलि आकाशसे उस समुद्रकी जलराशिमें गिरी, जो पूर्णिमाके चन्द्रकी समस्त षोडशकलाओंको तिरस्कृत करनेमें समर्थ महागुणसम्पन्न मणिरत्नका निधान है। समुद्रके जलमें उसे शुक्तिमें स्थान प्राप्त हुआ। अतः वह सामुद्रिक मुक्ताका प्राचीन बीज बन गया, जिससे अन्य मुक्ताओंका उद्भव हुआ। समुद्रके जिस जल-प्रदेशमें सुन्दर रत्न मुक्तामणिके बीज गिरे, उसी प्रदेशमें वे बीज फैलकर शुक्तियोंमें स्थित होनेके कारण मुक्तामणि (मोती) हो गये। अतएव सिंहल, परलोक, सौराष्ट्र, ताम्रपर्ण, पारशव, कुबेर, पाण्ड्य, हाटक और हेमक—ये मुक्ताओंके खजाने हैं।

वर्धन, पारसीक, पाताल, लोकान्तर तथा सिंहलादिकी शुक्ति-मुक्ताएँ प्रमाण, स्थान, गुण और कान्तिकी दृष्टिसे अन्य क्षेत्रोंमें प्राप्त होनेवाली मुक्ताओंकी तुलनामें अत्यधिक हीन वर्णकी नहीं होती हैं। अतः विद्वान् व्यक्तिको उनके मूल उत्पत्ति-स्थानको लेकर चिन्तन नहीं करना चाहिये, बल्कि उनके रूप एवं प्रमाणपर ही विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता होती है। इस प्रकारकी मुक्तासे सम्बन्धित गुण-अवगुणकी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। ये सर्वत्र सब प्रकारकी आकृतियोंमें पायी जाती हैं।

शुक्तिसे उत्पन्न एक मुक्ताफलका मूल्य एक हजार तीन सौ पाँच मुद्रा होता है। आधे तोले भारवाली मुक्ताका मूल्य उक्त मूल्यकी अपेक्षा २/५ भाग कम होता है। जिस मुक्ताका भार तीन माशा अधिक हो, उसका मूल्य दो हजार मुद्रा कहा गया है।

ढाई माशा परिमाणवाली मुक्ताका मूल्य तेरह सौ मुद्रा होता है। जो मुक्ता दो माशा परिमाणकी होती है, उसका मूल्य आठ सौ मुद्रा है। जिसका परिमाण आधा माशा है, उसका मूल्य तीन सौ बीस मुद्रा है। जो मुक्ता भारमें छः गुंजाके बराबर है, पण्डितोंने उसका मूल्य दो सौ मुद्रा स्वीकार किया है। जिसका परिमाण तीन गुंजा है, वह एक सौ मुद्राकी होती है। जो मुक्ता उक्त परिमाणमें सोलहवाँ भाग है, विद्वानोंने उसको दार्विका कहा है। उसका मूल्य एक सौ दस मुद्रा होता है।

जिस मुक्ताका कथित परिमाणकी तुलनामें भार १/२० भाग होता है, उसको विद्वानोंने भवककी संज्ञा प्रदान की है। यदि वह मुक्ता गुणहीन न हो तो उसका मूल्य सत्तानबे मुद्रा होता है। जो मुक्ता उक्त स्वाभाविक परिमाणमें १/३० भागकी होती है, उसको शिक्य कहा जाता है। उसका मूल्य चालीस मुद्रा होता है। जिसका परिमाण कहे गये परिमाणकी अपेक्षा १/४०वाँ अंश हो तो उसका मूल्य तीस मुद्रा है। जो मुक्ता १/५०वाँ अंश परिमित होती है, उसे सोम कहा जाता है। उसका मूल्य बीस मुद्रा है। जो मुद्रा १/६० अंशके बराबर होती है, उसको निकरशीर्ष कहा जाता है। वह चौदह मुद्रा मूल्यकी होती है। १/८० तथा १/९० अंश परिमित मुक्ताको कूप्य नामसे अभिहित किया गया है। उनका मूल्य क्रमशः ग्यारह और नौ मुद्रा है।