गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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बलासुरके नादसे उत्पन्न यह रत्नाकर महागुणसम्पन्न तथा तीनों लोकोंका श्रेष्ठतम आभूषणस्वरूप है। उस रत्नाकरमें दैत्यराजके महानादका अनुकरण करनेवाली, वर्षाकालीन श्रेष्ठ मेघोंकी आभावाली बड़ी ही सुन्दर विचित्र प्रकारकी मणियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे प्रभाके स्फुलिङ्गोंका समूह निकलता रहता है।
पृथिवीपर पद्मरागमणियोंके जो वर्ण हैं, उन सभी वर्णोंकी शोभाका अनुगमन वैदूर्यमणि करती है। उन मणियोंमें जो मणि मयूरकण्ठके सदृश अथवा वंशपत्रके समान वर्णवाली होती है, उसको श्रेष्ठ माना गया है। जिन मणियोंका वर्ण चषक नामक पक्षीके सदृश होता है, उन वैदूर्यमणियोंको मणिशास्त्रवेत्ताओंने प्रशस्त नहीं कहा है।
गुणयुक्त वैदूर्यमणि अपने स्वामीको परम सौभाग्यसे सम्पन्न बनाती है और दोषयुक्त मणि अपने स्वामीको दोषोंसे संयुक्त कर देती है। अतएव प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करनी चाहिये।
वैदूर्यमणिके अतिरिक्त गिरिकाँच, शिशुपाल, काँच तथा स्फटिक—ये चार विजातीय मणियाँ हैं, जो वैदूर्यके समान ही आभा फैलाती हैं। किंतु लेखनकी सामर्थ्यसे रहित होनेके कारण काँच, गुरुत्वभावसे हीन होनेके कारण शिशुपाल, कान्तियुक्त होनेसे गिरिकाँच एवं अपने समुज्ज्वल वर्णके कारण स्फटिकमणिसे इस मणिमें भेद होता है। महागुणसम्पन्न इन्द्रनीलमणिका सुवर्ण (अस्सी रत्ती मात्रा) परिमाणके अनुसार जो मूल्य निर्धारित किया गया है, वही मूल्य दो पल भारयुक्त वैदूर्यमणिका कहा गया है।
एक विजातीयमणिमें वे सभी वर्ण समान होते हैं, जो वर्ण मणियोंमें पाये जाते हैं; फिर भी उनमें महान् भेद माना गया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वे विशेष भेदक तत्त्वपर विचार करें। स्नेह, लघुता और मृदुताके द्वारा सजातीय और विजातीय-मणियोंके चिह्नोंका भेद सार्वजनीन है।
मणिशोधनमें कुशल या अकुशलजनोंके द्वारा प्रयुक्त उचित एवं अनुचित उपायोंके कारण भी विभिन्न प्रकारकी मणियोंमें उत्पन्न हुए गुण-दोषके अनुसार उनके मूल्यमें न्यूनाधिक्य हो जाता है।
मणिबन्धक अर्थात् मणिवेत्ताके द्वारा भली प्रकारसे शोधित मणियाँ यदि दोषरहित होती हैं तो उनका सामान्य मूल्यकी अपेक्षा छःगुना अधिक मूल्य होता है। समुद्रके तीरकी सन्निधिमें स्थित आकरसे प्राप्त हुई मणियोंका जो मूल्य होता है, पृथिवीपर सर्वत्र मणियोंका वही मूल्य नहीं रहता।
मनुने सोलह माशेका एक ‘सुवर्ण’ (भार) बताया है*। उसका सातवाँ हिस्सा संज्ञारूप प्राप्त करता है। चार माशेका एक ‘शाण’, पाँच कृष्णलका एक ‘माशा’ और एक पलका दशम भाग ‘धरण’ कहलाता है। इस प्रकार रत्नोंके मूल्य निश्चयके लिये यह मणिविधि कही गयी है। (अध्याय ७३)
पुष्परागमणिकी परीक्षा-विधि
**सूतजीने पुनः कहा—**देवशत्रु बलासुरके शरीरकी त्वचा हिमालय पर्वतपर गिरी थी, जिनसे महागुणसम्पन्न पुष्परागमणियोंका प्रादुर्भाव हुआ। जो पाषाण पूर्णपीत एवं पाण्डुवर्णकी सुन्दर आभासे समन्वित रहता है, उसका नाम ‘पद्मराग’ है। यदि वह लोहित और पीतवर्णकी आभासे युक्त है तो उसको ‘कौकण्टक’ नामसे जानना चाहिये।
जो पाषाण पूर्ण लोहित एवं सामान्य पीतवर्णसे संयुक्त होता है, उसे ‘काषायकमणि’ कहते हैं।
* मनुस्मृति ८। १३४