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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

About this granth

The Garuda Purana (गरुड़ पुराण) is one of the eighteen Mahapuranas. As the Gita Press introduction notes, its presiding deity is Vishnu, which makes it a Vaishnava Purana. Its Pretakalpa is widely recited in the days after a death, but the Purana as a whole covers much more.

This is the Gita Press abridged edition (Sankshipt Garudapuran, book no. 1189), illustrated, in large type and in Hindi only. The first part, the Acharakanda, covers creation, the lineages of Dhruva and of Daksha's daughters, rites of Vishnu worship, the Vishnu Panjara hymn, meditation, the Vishnu Sahasranama, the Mrityunjaya mantra, the worship of Shiva, Tripura, Ganesha, Gopala, the Sudarshana discus and Hayagriva, mantras against snake poison, and the Gayatri nyasa and sandhya. The second part, the Pretakalpa of the Dharmakanda, describes death, the journey of the soul and the rites for the departed.

The copy here is the 32nd reprint, of Samvat 2076, and runs to 634 pages, a way to read the whole Purana in simple Hindi without the Sanskrit.

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काण्ड ] ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन १०३

ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन

श्रीहरिने कहा—लग्नसे सप्तम भाव तथा उपचयमें स्थित चन्द्रमा सर्वत्र मङ्गलकारी होता है। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथि तथा पञ्चम और नवम भावमें स्थित चन्द्रमा गुरुके सदृश पूज्य है।

हे शिव! चन्द्रमाकी बारह अवस्थाएँ हैं। आप उनके विषयमें भी सुनें। अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रोंसे एक-एक अवस्था बनती है। अतः उन अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रोंके क्रमसे 'प्रवासावस्था, दृष्टावस्था, मृतावस्था, जयावस्था, हास्यावस्था, नतावस्था, प्रमोदावस्था, विषादावस्था, भोगावस्था, ज्वरावस्था, कम्पावस्था तथा सुखावस्था'—ये चन्द्रकी बारह अवस्थाएँ होती हैं।

इन्हीं अवस्थाओंके क्रममें चन्द्रकी स्थिति होनेपर क्रमशः—प्रवास, हानि, मृत्यु, जय, हास, रति, सुख, शोक, भोग, ज्वर, कम्प तथा सुख—ये फल प्राप्त होते हैं।

चन्द्रके जन्मलग्नमें होनेपर तुष्टि, द्वितीय भावमें रहनेपर सुख-हानि, तृतीय भावमें रहनेपर राजसम्मान, चतुर्थ भावमें कलह और पञ्चम भावमें रहनेपर स्त्रीका लाभ होता है। यदि चन्द्र षष्ठ (स्थान) भावमें रहता है तो धन-धान्यकी प्राप्ति, सप्तम भावमें रहनेपर प्रेम तथा सम्मानकी प्राप्ति होती है। चन्द्रमाके अष्टम भाव (स्थान)-में रहनेपर मनुष्यके प्राणोंको संकट बना रहता है। नवम भावमें उसकी स्थिति रहनेपर कोषमें धनकी वृद्धि होती है। दशम भावमें चन्द्रके रहनेपर कार्यसिद्धि और एकादश भावमें होनेपर विजय निश्चित है। जब वह द्वादश भावमें रहता है तो जातककी निश्चित ही मृत्यु होती है। इसमें संदेह नहीं है।

कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा—इन सात नक्षत्रोंमें पूर्व दिशाकी यात्रा करनी चाहिये। मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती तथा विशाखा—इन सात नक्षत्रोंमें दक्षिणकी यात्रा करनी चाहिये। अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ, श्रवण और धनिष्ठा—इन सात नक्षत्रोंमें पश्चिमकी यात्रा करनी चाहिये। धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती, अश्विनी और भरणी—इन सात नक्षत्रोंमें उत्तरकी यात्रा प्रशस्त होती है।

अश्विनी, रेवती, चित्रा तथा धनिष्ठा नक्षत्र नवीन अलंकारोंको धारण करनेके लिये श्रेष्ठ हैं। मृगशिरा, अश्विनी, चित्रा, पुष्य, मूल और हस्त नक्षत्र कन्यादान, यात्रा तथा प्रतिष्ठादि कार्योंमें शुभप्रद होते हैं।

जन्मलग्नमें शुक्र और चन्द्रके रहनेपर शुभ फलकी प्राप्ति होती है। उसी प्रकार ये दोनों ग्रह द्वितीय भावमें रहनेपर भी शुभ फल प्रदान करते हैं। तृतीय भावमें स्थित चन्द्र, बुध, शुक्र और बृहस्पति, चतुर्थ भावमें मंगल, शनि, चन्द्र, सूर्य और बुध श्रेष्ठ होते हैं। पञ्चम भावमें शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा और केतुके रहनेपर शुभ होता है। षष्ठ भावमें शनि, सूर्य और मंगल, सप्तम भावमें बृहस्पति तथा चन्द्रमा शुभ हैं। इसी प्रकार अष्टम भावमें बुध और शुक्र तथा नवम भावमें स्थित गुरु शुभ फल देनेवाला है। जन्मके दशम भावमें स्थित सूर्य, शनि एवं चन्द्रमा तथा एकादश भावमें सभी ग्रह शुभ फल देते हैं। ऐसे ही जन्मके द्वादश भावमें स्थित बुध और शुक्र सब प्रकारके सुखोंको प्रदान करते हैं।

४८- चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम

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१०४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सिंहके साथ मकर, कन्याके साथ मेष, तुलाके साथ मीन, कुम्भके साथ कर्क, धनुके साथ वृष और मिथुनके साथ वृश्चिकराशिका योग श्रेष्ठ होता है। यह षडष्टक योग है। यह योग प्रीतिकारक होता है,<sup>१</sup> इसमें संशय नहीं है।
(अध्याय ६१)


लग्न-फल, राशियोंके चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहोंका स्वभाव तथा सात वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य

श्रीहरिने कहा—हे शिव! सूर्य उदयकालसे मेषादि राशियोंपर अवस्थित रहते हैं। वे दिनमें क्रमशः छः राशियोंको पारकर रात्रिमें शेष छः राशियोंको पार करते हैं।

मेषलग्नमें कन्याका जन्म होनेपर वह वन्ध्या होती है। वृषलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या कामिनी होती है, मिथुनलग्नवाली सौभाग्यशालिनी तथा कर्कलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या वेश्या होती है। सिंहलग्नमें जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्रोंवाली, कन्यालग्नवाली रूपसे सम्पन्न, तुलालग्नवाली रूप और ऐश्वर्यसे युक्त तथा वृश्चिकलग्नवाली कर्कश स्वभावकी होती है। धनुलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या सौभाग्यवती तथा मकरलग्नवाली निम्न पुरुषोंके साथ गमन करनेवाली होती है। कुम्भलग्नमें जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्रों तथा मीनलग्नवाली वैराग्ययुक्त होती है<sup>२</sup>।

तुला, कर्क, मेष और मकर—ये चर राशियाँ हैं, इनमें यात्रादि चर कार्य करने चाहिये। सिंह, वृष, कुम्भ और वृश्चिक स्थिर राशि हैं। इनमें स्थिर कार्य करने चाहिये। कन्या, धनु, मीन एवं मिथुनराशि द्विस्वभावकी होती हैं। विद्वान् व्यक्तिको इन राशियोंमें द्विस्वभावसे युक्त कर्म करने चाहिये। यात्रा चरलग्नमें तथा गृह-प्रवेशादिका कार्य स्थिरलग्नमें करना चाहिये। देवताओंकी स्थापना और वैवाहिक संस्कारको द्विस्वभावके लग्नमें करना श्रेयस्कर है।

हे वृषभध्वज! प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी तिथियाँ नन्दा मानी जाती हैं। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ भद्रा कही गयी हैं। तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथियाँ जया कही गयी हैं। चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी—ये तीन रिक्ता तिथि हैं। ये शुभ कार्यके लिये वर्जित हैं।

सौम्य स्वभाववाला बुध ग्रह चर स्वभाव है। गुरु क्षिप्र, शुक्र मृदु और रवि ध्रुव स्वभावका है। शनि दारुण, मंगल उग्र तथा चन्द्रको समस्वभावका जानना चाहिये।

चर और क्षिप्र स्वभाववाले (अर्थात् बुध एवं बृहस्पति) वारमें यात्रा करनी चाहिये तथा मृदु और ध्रुव स्वभावसे संयुक्त शुक्र अथवा रविवारको गृह-प्रवेशादिका कार्य करना चाहिये। दारुण और उग्र स्वभाववाले शनि तथा मंगलवारको विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषासे क्षत्रियादि वीरोंको युद्धके लिये प्रस्थान करना चाहिये।


१-यहाँ षडष्टक योगको शुभ बताया गया है, किंतु मतान्तरसे वर-वधूके मेलापक चक्रमें यह षडष्टक योग अशुभ माना गया है। वर या वधूकी परस्पर जन्म-राशि एक-दूसरेसे छठी या आठवीं होना ही षडष्टक योग है। अर्थात् यदि एककी सिंह राशि हो और दूसरेकी मकरराशि तो ये राशियाँ गणना करनेपर एक-दूसरेसे छठी या आठवीं पड़ेंगी, ऐसे ही मेष-कन्या, वृष-तुला, मिथुन-वृश्चिक, कर्क-धनु आदिके विषयमें समझना चाहिये। प्रायः ऐसेमें विवाहादि नहीं किया जाता। षडष्टकके समान ही द्विर्द्वादश योग तथा नवम-पञ्चम योगपर भी विचार किया जाता है।
२-ज्योतिष-शास्त्रके अनुसार अन्य सभी योग एवं ग्रह-स्थितियोंको ध्यानमें रखकर ही इस फलपर विचार करना चाहिये। यहाँ दिग्दर्शनमात्र है।

४९- स्वरोदय-विज्ञान

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काण्ड ] सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण १०५


राज्याभिषेक और अग्निकार्य सोमवारको प्रशस्त माना गया है। सोमवारमें लिपाईका कार्य एवं गृहका शुभारम्भ करना श्रेयस्कर है। मंगलवारको सेनापतिका पद-भार वहन करना, शौर्य, पराक्रमका कार्य तथा शस्त्राभ्यासका प्रारम्भ करना शुभ है। बुधके दिन किसी कार्यकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करना, मन्त्रणा करना और यात्रा करना सफलतादायक माना गया है। बृहस्पतिवारको वेदपाठ, देवपूजा, वस्त्र तथा अलंकारादि धारणके कार्य करने चाहिये। शुक्रवारको कन्यादान, गजारोहण तथा स्त्रीसहवास उचित है। शनिवारको गृहारम्भ, गृहप्रवेश और गजबन्धनके कार्य शुभ माने गये हैं। (अध्याय ६२)

सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण, मस्तक एवं हस्तरेखासे आयुका परिज्ञान

श्रीहरिने कहा— हे शिव ! अब मैं स्त्री-पुरुषके लक्षणोंका वर्णन संक्षेपमें कर रहा हूँ, आप सुनें।

जिनके हाथ-पाँवके तल पसीनेसे रहित हों, कमलके भीतरी भागकी तरह मृदु एवं रक्त हों, अँगुलियाँ सटी हुई हों, नाखून ताँबेके वर्णके समान थोड़े रक्त हों, पाँव सुन्दर गुल्फवाले, नसोंसे रहित और कूर्मके समान उन्नत हों, उन्हें नृपश्रेष्ठ समझना चाहिये।

रूक्ष एवं थोड़ा पीलापन लिये, श्वेत नखवाले, वक्र तथा नसोंसे भरे हुए और विरल अँगुलियोंसे युक्त शूर्पाकार चरणोंवाले मनुष्य दुःखी एवं दरिद्र होते हैं।

अल्परोमसे युक्त, गलशुण्डके समान सुन्दर जंघाप्रदेश तथा एक-एक रोमसे भरे हुए रोमकूपोंवाला शरीर राजाओं और महात्माओंका माना गया है। प्रत्येक रोमकूपमें दो-दो रोम होनेपर मनुष्य श्रोत्रिय या पण्डित होता है। तीन-तीन रोमोंसे व्याप्त रोमकूप दरिद्रोंके होते हैं।

मांसरहित, अत्यन्त कृश जानुयुगलवाला मनुष्य रोगी होता है। समान उदरभागसे सुशोभित मनुष्य अतिशय भोगसे समृद्ध और कुम्भके सदृश उन्नत या सर्पके समान उदरभागवाले लोग अत्यन्त दरिद्र होते हैं।

रेखाओंके द्वारा आयुका निर्णय किया जाता है। जिसके ललाटपर समान आकारवाली तीन रेखाएँ स्पष्ट दिखायी देती हैं, वह पुत्रादिसे सम्पन्न रहकर सुखपूर्वक साठ वर्षतक जीवित रहता है। मस्तकपर दो रेखाओंके दृष्टिगोचर होनेपर मनुष्यकी आयु चालीस वर्षकी होती है। एक रेखाके होनेपर उस मनुष्यका जीवन बीस वर्ष मानना चाहिये, किंतु कर्णपर्यन्त एक रेखाके होनेपर वह शतायु होता है।

ललाटपर कानतक विस्तृत दो रेखाओंके होनेसे मनुष्यकी आयु सत्तर वर्ष तथा वैसी ही तीन रेखाओंके रहनेपर उसकी आयु साठ वर्ष होती है। ललाटपर रेखाओंकी व्यक्त (प्रकट)-अव्यक्त (अप्रकट) स्थिति होनेपर मनुष्य बीस वर्षकी अल्पायुको ही प्राप्त करता है। रेखाविहीन ललाटके होनेपर मनुष्य चालीस वर्षतक जीवित रहता है। रेखाओंके छिन्न-भिन्न रहनेपर मनुष्यकी अकालमृत्यु होती है।

जिसके मस्तकपर त्रिशूल अथवा फरसेके समान चिह्न दिखायी देता है, वह धन-पुत्रादिसे परिपूर्ण होकर सौ वर्षतक जीवित रहता है।

हे रुद्र ! तर्जनी और मध्यमा अंगुलीके मध्यभागतक

५०- रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा

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१०६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

आयुरेखाके पहुँचनेपर मनुष्य शतायु होता है। अंगुष्ठके मूलभागसे निकलनेवाली प्रथम रेखा ज्ञानरेखा है। मध्यमा अंगुलीके मूलसे जो रेखा जाती है, वह आयुरेखा है। यह रेखा कनिष्ठा अंगुलीके मूलसे निकलकर मध्यमाके मूल भागको पार करती है। यदि यह रेखा विच्छिन्न या किसी अन्य रेखासे विभक्त नहीं होती है तो ऐसे व्यक्तिकी आयु सौ वर्ष होती है।

हे रुद्र! जिसके हाथमें यह आयुरेखा स्पष्ट दिखायी देती है उसकी आयु सौ वर्ष अवश्य होती है, इसमें संदेह नहीं। जो रेखा कनिष्ठा अंगुलीके मूलसे होकर मध्यमा अंगुलीके मूलतक विस्तारको प्राप्त करती है, वह रेखा मनुष्यको साठ वर्ष आयु प्रदान करनेमें सक्षम होती है। (अध्याय ६३)

स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण

श्रीहरिने कहा—जिस कन्याके केश घुँघराले, मुख मण्डलाकार अर्थात् गोल एवं नाभि दक्षिणावर्त होती है, वह कुलकी वृद्धि करनेवाली होती है। जो स्वर्णसदृश आभावाली होती है, जिसके हाथ लाल कमलके समान सुन्दर होते हैं, वह हजारों स्त्रियोंमें अद्वितीय तथा पतिव्रता होती है।

जो कन्या वक्र केशोंवाली और गोल नेत्रवाली होती है, वह निश्चित ही दुःख भोगनेवाली होती है तथा उसका पति शीघ्र ही मर जाता है।

पूर्णचन्द्रके सदृश मुखमण्डलसे सुशोभित, बालसूर्यके समान लाल-लाल कान्तिवाली, विशाल नेत्रोंसे युक्त, बिम्बाफलकी भाँति ओष्ठवाली कन्या चिरकालतक सुखका उपभोग करती है। हस्ततलमें बहुत-सी रेखाओंके होनेपर कष्ट तथा अल्प रेखाओंके होनेपर वह धनहीनताका दुःख भोगती है। हाथमें रक्तवर्णकी रेखाओंके होनेसे वह सुखी जीवन व्यतीत करती है, किंतु कृष्णवर्णकी रेखाओंके होनेपर वह दास्यवृत्तिवाली दूतीका जीवन व्यतीत करती है।

अच्छी स्त्री वह है, जो पतिके कार्योंमें मन्त्रीके समान परामर्श देनेवाली होती है। सहयोगमें मित्रके समान बर्ताव करती है। स्नेहके व्यवहारमें भार्या अथवा माता तथा शयनकालमें वेश्याके समान सुख प्रदान करती है।

जिस कन्याके हाथमें अंकुश, कुण्डल और चक्रके चिह्न विद्यमान रहते हैं, वह पुत्रसे सम्पन्न होती है और राजाको पतिके रूपमें वरण करती है।

जिस स्त्रीके दोनों पार्श्व और स्तन-प्रदेश रोमसमन्वित होते हैं तथा अधरोष्ठ-भाग ऊँचा उठा हुआ होता है, वह निश्चित ही शीघ्र पतिका नाश करनेवाली होती है। जिसके हाथमें प्राकार और तोरणकी रेखाएँ दिखायी देती हैं, वह दासकुलमें भी उत्पन्न होकर रानीके पदको प्राप्त करती है। जिस कन्याकी नाभि ऊपरकी ओर उठी हुई, मण्डलाकार एवं कपिलवर्णकी रोमावलियोंसे आवृत्त रहती है, वह कन्या राजकुलमें उत्पन्न होकर दासीकी वृत्तिसे जीवनयापन करती है।

जिस स्त्रीके चलनेपर दोनों पैरकी अनामिका तथा अंगुष्ठ पृथिवीतलका स्पर्श नहीं करते हैं, वह शीघ्र ही पतिका नाश करती है तथा स्वयं स्वेच्छाचार-पूर्वक जीवन बितानेवाली होती है। जिस स्त्रीके चलनेसे पृथिवीमें कम्पन हो उठता है, वह शीघ्र ही पतिका नाश करके स्वेच्छाचारिणी बन जाती है।

सुन्दर मनोहारी नेत्रोंके होनेसे स्त्री सौभाग्यशालिनी, उज्ज्वल चमकते हुए दाँतोंके होनेपर उत्तम भोजन प्राप्त करनेवाली, शरीरकी त्वचा सुन्दर एवं कोमल होनेसे उत्तम प्रकारकी शय्या तथा कोमल स्निग्ध चरणोंके होनेपर वह श्रेष्ठ वाहनका सुख प्राप्त करती है।

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काण्ड ] स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण १०७

चिकने, ऊँचे उठे हुए ताम्रवर्णके समान लाल-लाल नखोंसे युक्त, मत्स्य, अंकुश, पद्म, चक्र तथा लाङ्गल (हल)-चिह्नसे सुशोभित एवं पसीनेसे रहित और कोमल तलवाले स्त्रीके चरण सौभाग्यशाली होते हैं।

सुन्दर रोमविहीन जंघा, गजशुण्डके सदृश ऊरु, पीपलपत्रके समान विशाल उत्तम गुह्यभाग, दक्षिणावर्त गम्भीर नाभि, रोमरहित त्रिवली और हृदयपर सुशोभित रोमरहित स्तन-प्रदेश—ये उत्तम स्त्रीके शुभ लक्षण हैं। (अध्याय ६४)


स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण

**श्रीहरिने कहा—**अब मैं सामुद्रिकशास्त्रमें कहे गये स्त्री और पुरुषके शुभाशुभ लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, जिन्हें जान लेनेसे भूत तथा भविष्यका ज्ञान हो जाता है।

मार्गमें गमन करनेपर विषम रूपसे पड़नेवाले, कषाय वर्णसे युक्त विचित्र प्रकारके बने हुए चरण वंशका नाश करते हैं। शङ्ख्वाकार चरणोंसे युक्त मनुष्य ब्रह्महत्या करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छा रखता है।

विरल रोमभागयुक्त जंघा तथा हाथीके सूँडके समान सुन्दर ऊरु भागोंवाले अंग राजाके शरीरमें सुशोभित होते हैं।

दरिद्रकी जंघाएँ सियारकी जंघाओंके समान होती हैं। कुंचित केशराशिवाले मनुष्यकी मृत्यु विदेशमें होती है।

मांसरहित जानु-प्रदेशवाला व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है। अल्प और छोटी-छोटी जानुओंके होनेसे मनुष्य स्त्री-प्रेमी तथा विशाल विकटाकार होनेपर दरिद्र होता है। मांससे भरपूर जानुओंके होनेपर मनुष्यको राज्यकी प्राप्ति होती है। बड़ी जानुओंके होनेपर मनुष्य दीर्घायु होता है।

मांसल स्फिक् (कूल्हा)-प्रदेशवाला व्यक्ति सुखी तथा सिंहके समान स्फिक् होनेपर वह राजपुरुष माना गया है। इसी प्रकार सिंहके सदृश कटिप्रदेशके होनेपर वह राजा होता है, किंतु कपिके समान कटिभागवाला व्यक्ति निर्धन होता है।

समान कक्ष (काँख)-प्रदेशवाले अत्यधिक भोग-विलासी होते हैं। निम्न कक्षाओंवाले धनहीन तथा उन्नत एवं विषम कक्षाओंवाले कुटिल होते हैं।

मत्स्यके समान उदरवाले प्रचुर धनवान् होते हैं। विस्तीर्ण नाभिप्रदेशसे सुशोभित जन सुखी एवं अत्यधिक गहरी नाभिके होनेपर कष्ट भोगनेवाले होते हैं।

त्रिवलीके मध्यभागमें नाभिके अवस्थित होनेपर प्राणी शूलरोगसे ग्रसित होते हैं। वामावर्त नाभिके होनेपर शक्तिसम्पन्न और दक्षिणावर्त होनेपर मेधावी होते हैं। पार्श्वदेशमें नाभिके विस्तृत होनेसे मनुष्य चिरंजीवी, उन्नत होनेपर ऐश्वर्यशाली, अधोमुख होनेपर गोधनसे सम्पन्न एवं पद्मकर्णिकाके सदृश सुन्दर होनेपर वे राजत्वको प्राप्त करते हैं।

उदरभागपर एक वलिके रहनेपर मनुष्य शतायु होता है। दो वलियोंके होनेसे वह ऐश्वर्यका भोग करनेवाला तथा त्रिवलियोंके होनेपर राजा या आचार्यकी पदवीको प्राप्त करता है। सरल वलियोंवाला मनुष्य सुखी होता है। वक्र वलिवाला व्यक्ति अगम्यागामी होता है।

जिसके दोनों पार्श्वभाग मांसल होते हैं, वह राजा होता है। मृदु, कोमल, सुन्दर और समभागकी दूरियोंपर अवस्थित दक्षिणावर्तीय रोमराशियोंसे सुशोभित व्यक्ति भी राजा होते हैं। यदि उदर-

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१०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रदेशपर इन लक्षणोंके विपरीत रोम-राशियाँ होती हैं तो ऐसे मनुष्य दूत-कर्म करनेवाले, निर्धन तथा सुखसे रहित होते हैं।

समुन्नत, मांसल तथा कम्पनरहित विशाल वक्षःस्थल राजाओंका होता है। अधमजनोंका वक्षःस्थल तो गर्दभोंकी रोमराशिके समान, कर्कश तथा रोमावलियोंसे युक्त स्पष्ट परिलक्षित होनेवाली नसोंसे व्याप्त रहता है।

समतल वक्षःस्थलवाले मनुष्य धन-सम्पन्न होते हैं। पीन (मांसल) वक्षःस्थलोंसे युक्त प्राणी शक्तिसम्पन्न होता है। विषम वक्षःस्थलके होनेपर मनुष्य निर्धन होता है और उसकी मृत्यु शस्त्राघातसे होती है।

स्कन्ध-प्रदेशके सन्धिस्थान (पखुरा)-में विषमता तथा अस्थि-संलग्नताके होनेपर भी मनुष्य निर्धन होते हैं। उन्नत स्कन्ध-प्रदेशके रहनेसे व्यक्ति भोगी, निम्न होनेपर धनहीन तथा स्थूल होनेपर धनी होते हैं।

चिपटाकार कण्ठसे युक्त मनुष्य निर्धन, शुष्क एवं उन्नत शिराओंसे व्याप्त गलेवाला सुखी होता है। महिषके सदृश ग्रीवावाला वीर तथा मृगके समान कण्ठवाला शास्त्रोंमें पारंगत होता है। शंखके समान ग्रीवावाला मनुष्य राजा और लम्बे कण्ठवाला बहुत भोजन करनेवाला होता है।

रोमरहित एवं मुड़ा हुआ पृष्ठ-प्रदेश शुभ तथा उसके विपरीत रहनेपर अशुभ माना गया है।

पीपल-पत्रके सदृश, सुगन्धित तथा मृगके सदृश रोमावलियोंवाली कक्षाएँ उत्तम होती हैं। इसके विपरीत कक्षाओंके जो लक्षण होते हैं, वे निर्धनोंकी दरिद्रताके कारण हैं।

मांसल, श्लिष्ट, विशाल, बलिष्ठ, वृत्ताकार तथा जानुपर्यन्त लम्बी सुन्दर भुजाएँ राजाकी होती हैं। प्रचुर रोमावलियोंसे युक्त छोटे-छोटे हाथ निर्धनके होते हैं। हाथीकी शुण्डके समान सुन्दर भुजाएँ श्रेष्ठ मानी गयी हैं।

भवनमें वायु-प्रवेशके लिये बने द्वारके समान बनी हुई अंगुलियाँ शुभ होती हैं। मेधावीजनोंकी अंगुलियाँ छोटी होती हैं। चिपटाकार अंगुलियाँ भृत्योंमें पायी जाती हैं। स्थूल अंगुलियोंके होनेपर मनुष्य निर्धन होते हैं। जब मनुष्यकी अंगुलियाँ कृश होती हैं तो वे विनयी होते हैं। बन्दरके सदृश हाथके होनेपर मनुष्य निर्धन और बाघके समान हाथ होनेपर बलवान् होते हैं।

करतल भागके निम्न होनेसे मनुष्य पिताके द्वारा संचित धनको नष्ट करनेवाले होते हैं। मणिबन्धके सुगठित, श्लिष्ट तथा सुगन्धयुक्त होनेपर व्यक्तियोंको राजपदकी प्राप्ति होती है। कटे-फटे कर-भागसे युक्त, शब्द करनेवाले मणिबन्धोंके रहनेसे मनुष्य धनहीन और नीच प्रकृतिके माने जाते हैं।

संवृत्त अर्थात् गोलाकार एवं गहरे करतलोंके होनेसे मनुष्योंको धनवान् कहा गया है। उन्नत करतलोंके होनेपर व्यक्ति दानी और विषम भागवाले व्यक्ति कठोर होते हैं। लाक्षारसके समान करतलोंके होनेसे प्राणी राजा होते हैं। पीतवर्णवाले करतलोंसे युक्त व्यक्ति परस्त्रीके साथ रमण करनेवाले होते हैं। जिनके हाथ और तल-प्रदेश रूखे हैं, वे मनुष्य निर्धन होते हैं।

तुष (भूसी)-के समान रंगसे युक्त नखवाले लोग नपुंसक, कुटिल तथा फटे हुए नखवाले धनहीन होते हैं। विवर्ण नखवाले दूसरेके साथ तर्क करनेवाले होते हैं।

ताम्रवर्णके सदृश रक्ताभ नखवाले मनुष्य राजा होते हैं। यव-चिह्नसे युक्त अंगुष्ठवाले व्यक्ति अत्यधिक धन-वैभवसे युक्त होते हैं। अंगुष्ठके मूलभागमें यव-चिह्नके होनेसे व्यक्ति पुत्रवान् होता है। लम्बे पर्वोंसे युक्त अँगुलियोंके होनेपर दीर्घायु तथा पुत्र-

५१- मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि

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काण्ड ] | स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण | १०९

पौत्रादिसे परिपूर्ण होता है, किंतु विरल अँगुलियोंवाला व्यक्ति निर्धन होता है। सघन अँगुलियोंके होनेसे मनुष्य धन-सम्पन्न होता है। मणिबन्धसे निकलकर तीन रेखाएँ जिसके करतल भागको पार कर जाती हैं, वह राजा होता है।

दो मत्स्याङ्कित करतलभागवाला पुरुष यज्ञकर्ता एवं दानी होता है। वज्राकार चिह्नवाले करतल धनीजनोंके होते हैं। विद्वान्‌का करतलभाग मीन-पुच्छके चिह्नसे अङ्कित होता है।

राजाके करतलमें शङ्ख, छत्र, शिविका (डोली), गज और पद्माकार चिह्न रहते हैं। अतुलनीय ऐश्वर्यसम्पन्न राजाके करतलमें कुम्भ, अङ्कुश, पताका तथा मृणालके समान चिह्न रहते हैं। गोधनके स्वामीजनोंके करतलोंमें रस्सीके चिह्न होते हैं। जिसके हाथमें स्वस्तिकका चिह्न होता है, वह सम्राट् होता है। राजाके हाथमें चक्र, कृपाण, तोमर, धनुष और भालेके आकारके चिह्न होते हैं।

ओखलीके चिह्नसे युक्त व्यक्ति यज्ञादिक कर्मकाण्डोंमें निष्णात होता है। जिनके हाथोंमें वेदिकाकार रेखा होती है, वे अग्निहोत्री होते हैं। वापी, देवकुल्या तथा त्रिकोण रेखाओंके रहनेपर मनुष्य धार्मिक होता है।

अंगुष्ठ-मूलतक रेखाके होनेसे व्यक्ति पुत्रवान् होते हैं। यदि वे रेखाएँ सूक्ष्म होती हैं तो उन्हें कन्याएँ होती हैं। कनिष्ठिकाके मूलसे निकलकर तर्जनीके मूलतक रेखाका विस्तार होनेपर मनुष्य शतायु होता है, किंतु किसी स्थानपर उसके विच्छिन्न होनेपर प्राणीको वृक्षसे गिरकर मृत्युका भय बना रहता है। बहुत-सी रेखाओंके होनेसे मनुष्य दरिद्र होते हैं। चिबुक (ठुड्डी)-के कृश होनेपर भी मनुष्योंको धनहीन समझना चाहिये, किंतु जिनकी ठुड्डियाँ मांसल होती हैं, वे धन-सम्पदाओंसे परिपूर्ण होते हैं। अरुणाभ, बिम्बाफलके समान सुन्दर अधरोंसे सुशोभित मुख राजाओंका माना गया है; किंतु जिसके ओष्ठ रूखे, खण्डित, फटे हुए तथा विषम होते हैं, वे निर्धन होते हैं।

स्निग्ध (चिकने), चमकते हुए, सघन एवं समान भागवाले सुन्दर तीक्ष्ण दाँतोंका होना शुभ है। रक्तवर्णकी समतल, चिकनी एवं दीर्घ जिह्वा श्रेष्ठ होती है। राजाओंका मुख कठोर, सम, सौम्य, गोल, मलरहित तथा स्निग्ध होता है। दुःख भोगनेवाले लोगोंमें इन लक्षणोंके विपरीत लक्षण होते हैं। कुत्सित एवं भाग्यहीनोंको स्त्रीमुखी पुत्र प्राप्त होता है। धनी लोगोंका मुख गोलाकार तथा निर्धनोंका मुख लम्बा होता है। पापकर्मका मुख भयाक्रान्त होता है। धूर्तोके मुख चौकोर, पुत्रहीनोंके निम्न एवं कंजूसोंके छोटे मुख होते हैं। भोगीजनोंका मुख सुन्दर, आभामय, मूँछोंसे युक्त, स्निग्ध, शुभ तथा कोमल होता है।

चौर-वृत्तिवाले व्यक्ति निस्तेज, मुरझायी हुई लालवर्णकी दाढ़ी और मूँछोंवाले होते हैं। रक्तवर्णके थोड़े तथा कड़े बालयुक्त दाढ़ीवाले और छोटे-छोटे कानोंवाले मनुष्योंकी मृत्यु पापकर्म करनेसे होती है। मांसरहित, चिपटे कानोंवाले लोग भोगी और अत्यन्त छोटे-छोटे कानोंसे युक्त मनुष्य कंजूस होते हैं। शङ्खाकार कानोंके होनेपर मनुष्य राजा होता है तथा रोमराशिसे भरे होनेपर उसे क्षीण आयुकी प्राप्ति होती है। बड़े कानोंवाले धनी अथवा राजा माने जाते हैं। स्निग्ध, विस्तृत, मांसल तथा दीर्घ कानोंवाले राजा होते हैं। निम्न गण्डस्थलवाला भोगी और पूर्ण सुडौल एवं सुन्दर होनेपर मनुष्य मन्त्री होता है।

सुग्गेकी नासिकाके समान सुन्दर नासिकावाला व्यक्ति सुखी और शुष्क नासिकावाला दीर्घजीवी होता है। नासिकाका अग्रभाग छिन्न तथा कूपके समान नासिकाके होनेपर मनुष्य अगम्या स्त्रीके

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११० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

साथ सहवास करता है। दीर्घ नासिकाके रहनेपर
सौभाग्यवान् एवं आकुंचित अर्थात् टेढ़ी नासिका
होनेसे व्यक्ति चौरकार्यमें प्रवृत्त होता है। नासिकाके
चिपटी होनेपर मनुष्यकी अकालमृत्यु होती है।
भाग्यवान्‌की नासिका छोटी होती है। चक्रवर्ती
सम्राट्‌की नासिकामें छोटे-छोटे गोल और सीधे
छिद्र होते हैं। दक्षिणभागकी ओर नासिकाके वक्र
होनेपर मनुष्योंमें क्रूर-स्वभाव होता है।

वक्र उपान्तभागोंसे युक्त तथा पद्म-पत्रके समान
सुन्दर नेत्र सुखी लोगोंके होते हैं। बिल्लीके सदृश
नेत्रोंके होनेपर मनुष्य पापात्मा तथा मधु-
पिंगलवर्णवाले नेत्रोंके होनेपर वह दुरात्मा होता
है। केकड़ेके नेत्रोंकी भाँति नेत्र होनेसे व्यक्ति क्रूर
और हरितवर्णके नेत्रवाले पापकर्ममें अनुरक्त होते
हैं। वक्र नेत्र बलवान् पुरुषोंका लक्षण है। हाथीके
समान नेत्रोंवाले मनुष्य सेनानी होते हैं। गम्भीर
नेत्रोंवाला पुरुष राजा तथा स्थूल नेत्रोंवाला मन्त्री
होता है। नीलकमलके सदृश नेत्रोंके होनेपर
व्यक्ति विद्वान् तथा श्यामवर्णके नेत्रवाले सौभाग्यशाली
होते हैं। कृष्णवर्णके तारक विन्दुओंसे युक्त नेत्रोंवाले
पुरुषोंमें उत्पाटन-क्षमता होती है। मण्डलाकार
नेत्रोंके होनेपर व्यक्ति पापी तथा दैन्यभावयुक्त
नेत्रवाले मनुष्य दरिद्र होते हैं। सुन्दर एवं विशाल
नेत्रोंवाले संसारमें विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग
करते हैं। जिनके नेत्र अधिक उन्नत अर्थात् ऊपरकी
ओर अधिक उठे होते हैं, वे अल्पायु होते हैं।
विशाल और उन्नत नेत्रोंके होनेपर मनुष्य सुखी
होते हैं।

विषम भौंहोंवाले दरिद्र होते हैं तथा दीर्घ,
सघन, एक-दूसरेसे संयुक्त, बालचन्द्रके सदृश
पतले, वक्र एवं उन्नत सुन्दर भौंहोंसे सुशोभित
प्राणी धन-वैभवसे सम्पन्न होते हैं। मध्यभागमें
कटी हुई भौंहोंके होनेपर मनुष्य निर्धन तथा झुकी
हुई भौंहोंके होनेसे अगम्या स्त्रियोंमें रत रहनेवाले
और पुत्रसे रहित होते हैं।

उन्नत, विशाल, शङ्खाकार एवं विषम मस्तक
होनेपर पुरुषोंमें निर्धनता और अर्द्धचन्द्राकार ललाटके
होनेपर वे धनसम्पन्नतासे परिपूर्ण रहते हैं। सीपके
समान आभावाले तथा विशाल मस्तकवाले आचार्यके
पदको सुशोभित करते हैं, जिनके मस्तकोंपर
शिराएँ स्पष्ट प्रतीत होती रहती हैं, वे पापकर्ममें
लगे रहते हैं। उन्नत शिराओंसे युक्त स्वस्तिकाकार,
सुन्दर ललाटके होनेपर मनुष्य धनवान् तथा निम्न
ललाटके होनेपर बन्दी बनाये जानेयोग्य होते हैं
और क्रूर कर्मोंको करते हैं। गोल ललाटवाले
कृपण और उन्नत भालवाले राजा होते हैं।

लोगोंका अश्रुरहित, दीनतारहित, स्निग्ध रुदन
मङ्गलकारी होता है तथा अविरल अश्रुधारवाला,
दैन्यभावको प्रकट करता हुआ रूखा रुदन सुखकारी
होता है।

कम्पनरहित हँसी श्रेष्ठ होती है। आँख मूँदकर
हँसनेवाला व्यक्ति पापी होता है। बार-बार हँसनेवाला
दुष्ट होता है और उन्मत्तकी हँसी अनेक प्रकारकी
होती है।

सौ वर्षतक जीवन प्राप्त करनेवाले लोगोंके
मस्तकपर तीन रेखाएँ होती हैं। मस्तकपर चार
रेखाओंके होनेपर मनुष्य राजा होता है और उसकी
आयु पंचानबे वर्षतक होती है। रेखारहित ललाटवाला
व्यक्ति नब्बे वर्ष जीवित रहता है। विच्छिन्न
रेखाओंसे व्याप्त मस्तकवाले पुरुष लम्पट होते हैं।
मस्तकपर केशपर्यन्त रेखाओंके होनेसे मनुष्यकी
आयु अस्सी वर्षकी होती है। पाँच, छः अथवा
सात रेखाओंके होनेसे प्राणीकी आयु पचास वर्ष
तथा सातसे अधिक रेखाओंके होनेपर चालीस
वर्षकी आयु माननी चाहिये। मस्तकपर रेखाओंकी
वक्रता एवं भौंहपर्यन्त स्थिति होनेसे पुरुष तीस

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काण्ड ]
स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण
१११


वर्ष तथा बाँयी ओर वक्र होनेपर बीस वर्षकी अल्पायुको प्राप्त करते हैं। रेखाओंके क्षुद्र होनेपर मनुष्य अल्पायु होता है।

छत्राकार सिरवाले मनुष्य राजा और निम्न सिरवाले धनी होते हैं। चिपटे सिरसे युक्त पुरुषोंके पिताकी मृत्यु शीघ्र होती है। मण्डलाकार सिर होनेपर व्यक्ति गौ आदि प्राणियोंसे सम्पन्न होते हैं। घटाकार मूर्द्धाभागके होनेपर मनुष्य पापमें अभिरुचि रखनेवाला तथा धनहीन होता है।

काले-काले घुँघराले, स्निग्ध, एक छिद्रमें एक-एक उत्पन्न, अभिन्न अग्रभागवाले, अत्यधिक, न छोटे न बड़े, सुन्दर केशोंवाले राजा होते हैं। एक छिद्रमें अनेक बालवाले, विषम, स्थूलाग्र तथा कपिलवर्णके केशोंसे युक्त पुरुष निर्धन होते हैं। अत्यन्त कुटिल, सघन एवं काले बालवाले भी निर्धन होते हैं।

मनुष्यके जो अङ्ग अतिशय रूक्ष, शिराओंसे व्याप्त तथा मांसरहित होते हैं, वे सभी अशुभ हैं। यदि वे अङ्ग इसके विपरीत होते हैं तो उन्हें शुभ मानना चाहिये।

मानव-शरीरमें तीन अङ्ग विशाल और तीन अङ्ग गम्भीर, पाँच अङ्ग दीर्घ तथा सूक्ष्म, छः अङ्ग उन्नत, चार ह्रस्व एवं सात अङ्ग रक्तवर्णके होनेपर वह राजा होता है।

नाभि, स्वर तथा सत्त्व (स्वभाव)*—ये तीन गम्भीर होने चाहिये। ललाट, मुख तथा वक्षःस्थल विशाल, नेत्र, कक्षा (काँख), नासिका तथा कृकाटिका अर्थात् गरदनका उठा हुआ भाग, सिर और गरदनका जोड़—इन छःको उन्नत होना चाहिये, ऐसा होनेपर मनुष्य राजा होता है। जंघा, ग्रीवा, लिङ्ग तथा पृष्ठभाग—ये चार अङ्ग ह्रस्व होने चाहिये। करतल, तालु, अधर और नख—ये चार रक्ताभ होने चाहिये। नेत्रान्तभाग, चरणतल, जिह्वा और दोनों ओष्ठ—ये पाँच सूक्ष्म होने चाहिये। दाँत, अँगुली, पर्व, नख, केश और त्वचा—ये पाँच अङ्ग दीर्घ होनेपर शुभकारी हैं। दोनों स्तनोंका मध्यभाग, दोनों भुजाएँ, दाँत, नेत्र और नासिकाका भी दीर्घ होना शुभ है।

इस प्रकार मनुष्योंका लक्षण कहकर अब स्त्रियोंका लक्षण कह रहा हूँ।

रानीके दोनों चरण स्निग्ध, समान पदतलवाले, ताम्रवर्णकी आभासे सुशोभित नखोंसे युक्त, सघन अँगुलियोंवाले तथा उन्नत अग्रभागवाले होते हैं। ऐसी स्त्रीको प्राप्तकर मनुष्य राजा बन जाता है।

गूढ गुल्फ-प्रदेशसे युक्त पद्मपत्रके समान चरणतल शुभ होते हैं। जिसके चरणतलोंमें पसीना नहीं छूटता है और वे कोमल होते हैं, उनमें मत्स्य, अंकुश, ध्वज, वज्र, पद्म तथा हलका चिह्न हो तो वह रानी होती है। इन लक्षणोंसे रहित चरणवाली स्त्री दासी होती है। स्त्रियोंकी रोमरहित, सुन्दर, शिराविहीन, गोल-गोल जंघाएँ शुभ हैं। सन्धिस्थान तथा दोनों जानु समान होने चाहिये, ऐसा शुभ होता है। गजशुण्डके सदृश, रोमरहित तथा समान भागवाले दोनों ऊरु श्रेष्ठ माने जाते हैं।

विस्तीर्ण, मांसल, गम्भीर, विशाल तथा दक्षिणावर्त नाभि तथा मध्यभागमें त्रिवलियाँ श्रेष्ठ होती हैं। स्त्रियोंके रोमरहित, विशाल, भरे हुए, सघन एवं समान भागवाले कठोर स्तन-प्रदेश शुभ हैं। रोमरहित, शङ्खके आकारवाली सुन्दर ग्रीवा प्रशस्त होती है। अरुणाभ अधरोष्ठवाला तथा वर्तुलाकार मांसल भरा हुआ मुख श्रेष्ठ होता है। कुन्द-पुष्पके समान दन्तपंक्ति तथा कोयलकी भाँति वाणी शुभ होती है, जो सदैव दाक्षिण्य भावसे परिपूर्ण रहती है, उसमें शठता नहीं होती, अपितु हंसोंके समान


* किरातार्जुनीय १२। ३९ के अनुसार 'सत्त्व' का अर्थ स्वभाव भी होता है।

५२-पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि

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११२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मधुर शब्दोंका प्रयोग करके वह दूसरोंको सुख प्रदान करती है, वही स्त्री श्रेष्ठ होती है। स्त्रियोंकी नासिका और नासिका-छिद्र समान होना मनोहर और मङ्गलदायी होता है।

स्त्रियोंके नीलकमलके समान नेत्र अच्छे होते हैं। बालचन्द्रके सदृश भौंहोंका होना शुभ है, किंतु उनका मोटा होना अच्छा नहीं है। उनका मस्तक अर्द्धचन्द्रके समान सुन्दर, समतल तथा रोमविहीन होना शुभ है।

सुन्दर, समान, मांसल एवं कोमल कान श्रेष्ठ होते हैं। स्त्रियोंके चिकने, नीलवर्णवाले, मृदु और घुँघराले केश प्रशस्त माने गये हैं। उनका सम आकारवाला सिर शुभ होता है। चरणतल अथवा करतलमें अश्व, हस्ति, श्री, वृक्ष, यूप, बाण, यव, तोमर, ध्वज, चामर, माला, पर्वत, कुण्डल, वेदी, शङ्ख, छत्र, पद्म, स्वस्तिक, रथ तथा अङ्कुश आदि चिह्नवाली स्त्रियाँ राजवल्लभा होती हैं।

स्त्रियोंके मांसल मणिबन्धवाले तथा कमलदलके समान हाथोंको शुभ माना जाता है। स्त्रियोंके करतलोंका न तो अधिक निम्न और न अधिक उन्नत होना अच्छा होता है। शुभ रेखाओंसे व्याप्त करतलवाली स्त्रियाँ आजीवन सधवा रहकर विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग करती हैं। हाथमें जो रेखा मणिबन्धसे निकलकर मध्यमा अँगुलीतक जाती है, वह ऊर्ध्वरेखा कही जाती है। ऐसी रेखा यदि स्त्री या पुरुषके करतल अथवा चरणतलमें अवस्थित रहती है तो वे स्त्री या पुरुष राज्य अथवा अन्य प्रकारके सुखोंका उपभोग करते हैं।

कनिष्ठिका अँगुलीके मूलसे निकलकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियोंके मध्यभागतक रेखाके पहुँचनेपर स्त्री या पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है। यदि इन अँगुलियोंके बीचतक आनेवाली रेखाका परिमाण उसकी अपेक्षा कम हो तो उसी अनुपातमें मनुष्यकी आयु भी कम होती है।

अङ्गुष्ठमूलक रेखाओंके रहनेपर स्त्री या पुरुष बहुत-से पुत्रों या कन्याओंवाले होते हैं। स्थान-स्थानपर आयुरेखाके छिन्न-भिन्न होनेसे मनुष्यकी आयु अल्प हो जाती है। यदि वह रेखा दीर्घ एवं अविच्छिन्न हो तो उस पुरुष अथवा स्त्रीको दीर्घायु माना जाता है। स्त्रियोंके विषयमें कहे गये ये सभी लक्षण शुभ हैं। इनके विपरीत लक्षणोंके होनेपर उन्हें अशुभ मानना चाहिये। (अध्याय ६५)


चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम

**श्रीहरिने कहा—**हे शिव! चक्राङ्कित शालग्राम-शिलाकी पूजा सब प्रकारके कल्याण-मङ्गल प्रदान करती है।

प्रथम शालग्राम-शिलाका नाम सुदर्शन है। (इसमें एक चक्रका चिह्न अङ्कित होता है।) दूसरी शिलाका नाम लक्ष्मीनारायण है। (इसमें दो चक्रोंके चिह्न होते हैं।) तीन चक्रोंवाली शिलाको अच्युत तथा चार चक्रोंवाली शिलाको चतुर्भुज कहा जाता है। इस प्रकार चक्रसमन्वित अन्य शालग्राम-शिलाओंको क्रमशः—वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण तथा पुरुषोत्तमके नामसे अभिहित किया गया है। नौ चक्रोंवाली शिलाको नवव्यूह और दस चक्रोंवाली शिलाको दशात्मक कहते हैं। एकादश चक्रोंसे युक्त शिलाको अनिरुद्ध एवं द्वादश चक्रोंसे समन्वित शिलाका नाम द्वादशात्मक है। उसके ऊपर चक्रोंकी चाहे जितनी संख्या हो, उनसे लक्षित शिलामूर्तिका

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काण्ड ] स्वरोदय-विज्ञान ११३


नाम भगवान् अनन्त कहा गया है। जो शिलामूर्ति सबसे सुन्दर हो, उसका पूजन करना चाहिये, ऐसी सुदर्शन मूर्तियाँ पूजित होनेपर सभी कामनाओंको पूर्ण करती हैं।

जहाँ शालग्राम और द्वारका-शिला रहती हैं और इन दोनों शिलाओंका जहाँ संगम है, वहाँ मुक्ति रहती है, इसमें संशय नहीं है—

शालग्रामशिला यत्र देवो द्वारवतीभवः।
उभयोः संगमो यत्र तत्र मुक्तिर्न संशयः॥

<div align="right">(६६। ५)</div>

हे शंकर! शालग्राम, द्वारका, नैमिष, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र, गङ्गा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा महाकालका अधिष्ठान उज्जयिनी—ये सभी तीर्थ सब प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।*

प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, विषु, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकार, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन एवं अक्षय—ये साठ संवत्सर अपने नामके अनुसार शुभ और अशुभ फल प्रदान करनेवाले हैं। (अध्याय ६६)


स्वरोदय-विज्ञान

स्वरके उदयसे कार्योंके शुभ और अशुभका ज्ञान होता है। शरीरमें बहुत प्रकारकी नाड़ियोंका विस्तार है। नाभि-प्रदेशके नीचे जो कन्दस्थान अर्थात् मूलाधार है, वहींसे उन नाड़ियोंका अङ्कुरण होकर सम्पूर्ण शरीरमें विस्तार होता है। बहत्तर हजार नाडियाँ नाभिके मध्यमें चक्राकार अवस्थित रहती हैं। उन नाड़ियोंमें वामा, दक्षिणा और मध्यमा नामक तीन श्रेष्ठ नाडियाँ हैं। (उन्हींको क्रमशः—इडा, पिंगला और सुषुम्णा कहा जाता है।) इनमें वामा सोमात्मिका, दक्षिणा सूर्यके समान तथा मध्यमा नाडी अग्निके समान फलदायिनी एवं कालरूपिणी है।

वामा नाडी अमृतरूपा है, वह जगत्को आप्यायित करती रहती है। दक्षिणा नाडी अपने रौद्रगुणसे सदैव जगत्का शोषण करती रहती है। जब शरीरमें इन दोनोंका एक साथ प्रवाह होता है, उस समय समस्त कार्योंका विनाश करनेवाली मृत्यु आ पहुँचती है।

यात्रादिके लिये प्रस्थानकालमें वामा तथा प्रवेशके अवसरपर दक्षिणा नाडीप्रवाहको शुभ माना गया है। इडा अर्थात् वामाके श्वास-प्रवाह-कालमें ऐसा सौम्य शुभकारी कार्य करना चाहिये, जो चन्द्रके समान जगत्के लिये भी शुभकारी हो तथा पिंगला अर्थात् दक्षिणा नाडीमें प्राणवायुके प्रवाहित होनेके समय सूर्यके समान तेजस्वी क्रूर कार्य करना चाहिये। यात्रामें, सभी कार्योंमें तथा विषको दूर करनेमें इडा नाडीका चलना अच्छा होता है। भोजन, मैथुन, युद्धारम्भमें, पिंगला नाडी सिद्धिदायक


* शालग्रामो द्वारका च नैमिषं पुष्करं गया। वाराणसी प्रयागश्च कुरुक्षेत्रं च सूकरम्॥
गङ्गा च नर्मदा चैव चन्द्रभागा सरस्वती। पुरुषोत्तमो महाकालस्तीर्थान्येतानि शङ्कर॥
सर्वपापहराण्येव भुक्तिमुक्तिप्रदानि वै।

<div align="right">॥ (६६। ६–८)</div>

५३-मरकतमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

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११४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

होती है। उच्चाटनादि अभिचार कर्मोंमें भी पिंगला नाडीका चलना उत्तम होता है।

मैथुन, संग्राम और भोजन करते समय राजाओंको पिंगला नाडीके श्वास-प्रवाहपर ध्यान रखना चाहिये। शुभ कार्योंके सम्पादनमें, यात्रामें, विषापनोदनमें तथा शान्ति एवं मुक्तिकी सिद्धिमें राजाओंको इडा नाडीकी गतिपर विचार करना चाहिये।

पिंगला एवं इडा नामक दोनों नाडियाँ चल रही हों तो क्रूर तथा सौम्य दोनों प्रकारका कार्य न करे। विद्वान्‌को यह समय विषके समान मानना चाहिये।

सौम्यादि शुभ कार्योंमें, लाभादिके कर्मोंमें, विजयके लिये, जीवनके लिये तथा गमनागमनके लिये वामा नाडी सर्वत्र प्रशस्त मानी जाती है। घात-प्रतिघात, युद्धादिके क्रूर कार्य, भोजन और स्त्री-सहवासमें दक्षिणा नाडी प्रशस्त होती है। प्रवेश तथा क्षुद्र-कार्योंमें भी दक्षिणा नाडी श्रेष्ठ होती है।

शुभ-अशुभ, लाभ-हानि, जय-पराजय तथा जीवन और मृत्युके विषयमें प्रश्न करनेपर यदि प्रश्नकर्ताकी उस समय मध्यमा नाडी चल रही हो तो सिद्धि प्राप्त नहीं होती और यदि वामा तथा दक्षिणा नाडीके चलते समय प्रश्न हो तो निश्चित ही सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है।

इसी प्रकार प्रश्नकर्ताके स्वरमें उदय तथा प्रश्नकर्ताकी अवस्थिति आदिपर विचार करनेसे भी कार्यकी सिद्धि-असिद्धिका निर्णय तथा शुभ-अशुभकालका ज्ञान किया जाता है। इसके लिये स्वरोदय-विज्ञानकी जानकारी अपेक्षित होती है*।

(अध्याय ६७)


रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा

सूतजीने कहा— अब मैं रत्नपरीक्षाका वर्णन करता हूँ। प्राचीनकालमें बल नामक एक असुर था। उसने इन्द्रादि सभी देवोंको पराजित कर दिया था। उसको जीतनेमें देवगण समर्थ नहीं थे। अतः असमर्थ देवोंने एक यज्ञ करनेका विचार किया और उस असुरके सन्निकट पहुँचकर उससे यज्ञपशु बननेकी अभ्यर्थना की। वचनबद्ध बलासुरने अपना शरीर उन देवोंको दानमें दे दिया। अतः अपने वाग्वज्रसे वह पशुवत् मारा गया।

वचनपर अडिग, पशु-शरीरवाले उस असुरने संसारके कल्याणार्थ एवं देवताओंकी हितकामनाके कारण यज्ञमें शरीरका परित्याग किया था, उस विशुद्ध कर्मको करनेसे उसका शरीर भी विशुद्ध सत्त्वगुण सम्पन्न हो उठा था। अतः उसके शरीरके सभी अङ्ग रत्नोंके बीजके रूपमें परिणत हो गये।

इस प्रकार रत्नोंकी उत्पत्ति होनेपर देवता, यक्ष, सिद्ध तथा नागोंका उस समय बहुत बड़ा उपकार हुआ। जब वे सभी विमानके द्वारा उसके शरीरको आकाशमार्गसे ले जाने लगे तो यात्रावेगके कारण उसका शरीर स्वतः खण्ड-खण्ड होकर पृथिवीपर इधर-उधर गिरने लगा।

बलासुरके शरीरके अङ्ग खण्ड-खण्ड होकर समुद्र, नदी, पर्वत, वन अथवा जहाँ-कहीं रंचमात्र भी गिरे, वहाँ रत्नोंकी खान बन गयी और उन स्थानोंकी प्रसिद्धि उन्हीं रत्नोंके नामपर हो गयी। पृथिवीकी उन खानोंमें विविध प्रकारके रत्न उत्पन्न होने लगे; जो राक्षस, विष, सर्प, व्याधि तथा विविध प्रकारके पापोंको नष्ट करनेमें समर्थ थे।


* यहाँ स्वरोदय-विज्ञानका दिग्दर्शनमात्र किया गया है। विस्तृत जानकारी, प्रमाण एवं तथ्यातथ्यके स्पष्टीकरणके लिये तद्विषयक ग्रन्थोंका अवलोकन करना चाहिये।

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काण्ड ] रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा ११५


रत्नोंके विविध प्रकारोंको वज्र (हीरा), मुक्तामणि, पद्मराग, मरकत, इन्द्रनील, वैदूर्य, पुष्पराग, कर्केतन, पुलक, रुधिर, स्फटिक तथा प्रवालादि कहा गया है। पारदर्शी विद्वज्जनोंने उनका यह नामकरण तथा संग्रह यथायोग्य गुणोंको दृष्टिमें रखकर किया है।

अतः रत्नपारखी विद्वानोंको सर्वप्रथम रत्नोंके आकार, वर्ण, गुण, दोष, फल, परीक्षा तथा मूल्य आदिका ज्ञान तत्सम्बन्धित सभी शास्त्रोंके द्वारा विधिवत् प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि कुत्सित लग्न या अनेक कुयोगोंसे बाधित अशुभ दिनोंमें जिन रत्नोंकी उत्पत्ति होती है, वे सभी दोषपूर्ण होकर अपनी गुण-क्षमताको नष्ट करते हैं।

ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह परीक्षासे किये गये अत्यन्त शुद्ध रत्नोंको धारण करे अथवा उनका संग्रह करे।

जो रत्नशास्त्रोंके ज्ञाता, कुशल, रत्नसंग्रही तथा परीक्षण-कार्यमें दक्ष होते हैं, उन्हींको रत्नोंके मूल्य और मात्राको जाननेवाले कहा गया है। वज्र (हीरा)-को महाप्रभावशाली कहा गया है, इसलिये सर्वप्रथम उसीकी परीक्षाको बतायेंगे।

वज्रायुध इन्द्रपर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उस बल नामक असुरके अस्थिभाग पृथिवीके जिन-जिन स्थानोंमें गिरे, वे हीरे बनकर उन स्थानोंमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले हो गये।

हिमाञ्चल, मातंग, सौराष्ट्र, पौण्ड्र, कलिंग, कोसल, वेण्वातट तथा सौवीर नामक आठ भूभाग हीरोंके क्षेत्र हैं। हिमालयसे उत्पन्न हीरे ताम्रवर्ण, वेणुकाके तटसे प्राप्त चन्द्रमाके समान श्वेत, सौवीर देशवाले नीलकमल तथा कृष्णमेघके समान, सौराष्ट्रप्रान्तीय ताम्रवर्ण एवं कलिंगदेशीय सोनेके समान आभावाले होते हैं। इसी प्रकार कोसल देशके हीरोंका वर्ण पीत, पुण्ड्रदेशीय श्याम तथा मतंगक्षेत्रवाले हलके पीतवर्णके होते हैं।

यदि इस संसारमें कहींपर भी अत्यन्त क्षुद्र वर्ण, पार्श्वभागोंमें भली प्रकारसे परिलक्षित होनेवाली रेखा, बिन्दु कालिमा, काकपदक<sup>१</sup> और त्रास<sup>२</sup> दोषसे रहित, परमाणुकी भाँति अत्यन्त लघु तथा तीक्ष्ण धारसे युक्त जो भी वज्र अर्थात् हीरा दिखायी देता है, उसमें निश्चित ही देवताका वास समझना चाहिये।

रंगके अनुसार हीरकोंमें देवताओंके विग्रहोंका निश्चय किया गया है। वर्णको ध्यानमें रखकर ही हीरोंका विभाजन करना चाहिये। हरित, श्वेत, पीत, पिंगल, श्याम तथा ताम्रवर्णके हीरे स्वभावतः सुन्दर होते हैं। उन हीरोंमें क्रमानुसार विष्णु, वरुण, इन्द्र, अग्नि, यम और मरुत्-देव प्रतिष्ठित रहते हैं।

ब्राह्मणके लिये शङ्ख, कुमुद अथवा स्फटिकके समान शुभ्रवर्णका हीरा प्रशस्त होता है। क्षत्रियके लिये शश (चन्द्रलाञ्छनके समान वर्णवाला), बभ्रु (पिंगल—भूरे वर्णके धातु विशेषके समान वर्णवाला), विलोचन<sup>३</sup> (आँखकी ताराके समान वर्णवाला), वैश्यवर्णके निमित्त कान्त (कुंकुम) अथवा कदलीदलके समान आभावाला तथा शूद्रवर्णके लिये धौत (चाँदी)-के समान अथवा तलवारके सदृश हीरा प्रशस्त है।

विद्वानोंने राजाओंके योग्य दो प्रकारके हीरोंको उत्तम माना है, जो अन्य लोगोंके लिये प्रशस्त नहीं होते हैं। जो हीरा जवावर्ण तथा प्रवालके समान रक्तवर्ण अथवा हल्दी-रसके सदृश पीतवर्णका होता


१-काकके पदके समान आभारविशेषसे युक्त।
२-त्रास—मणिके दोषविशेषको त्रास कहते हैं।
३-विलोचन (आँख) प्रसंगके अनुसार आँखकी तारा।

५४-इन्द्रनीलमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

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११६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

है, वह राजाओंके लिये लाभप्रद है। सभी वर्णोंका स्वामी होनेके कारण अथवा समस्त वर्णोंके गुणोंको अपनेमें समाविष्ट करनेके उद्देश्यसे राजाओंको सभीके कल्याणकी इच्छासे उक्त दो प्रकारके हीरोंको धारण करना चाहिये। ऐसे हीरोंको धारण करनेका अधिकार अन्यके लिये किसी भी प्रकारसे नहीं है।

जिस प्रकार लोकमें निम्न और उच्च वर्णका वर्णसांकर्य दोषावह एवं दुःखदायी होता है, रत्नोंका वर्णसांकर्य उससे भी अधिक दुःखदायी होता है।

केवल वर्णमात्रको देखकर ही विद्वानोंको रत्नका संचय नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो गुणवान् रत्न होता है, वही गुण और सम्पत्तिकी विभूति होता है, इसके विपरीत गुणहीन रत्न कष्टका हेतु होता है। जिस हीरेका एक भी शृंग टूटा हुआ अथवा छिन्न-भिन्न दिखायी दे तो गुणवान् होनेपर भी धनार्थीजनोंको उसे अपने घरमें नहीं रखना चाहिये।

अग्निके समान स्फुटित, विशीर्ण शृंगभागसे युक्त, मलिन वर्णवाले तथा मध्यमें विन्दुओंसें चिह्नित हीरकको धारण करनेपर इन्द्र भी श्रीहीन हो जाते हैं। ऐसे हीरेके संग्रह करनेकी लालसा नहीं करनी चाहिये। जिस हीरेका एक भाग अस्त्र-शस्त्रादिसे विदीर्ण क्षत-विक्षत शरीरकी आभाको प्राप्त हो तथा वह रक्तवर्णसे चित्रित हो तो वैसा हीरा इच्छा-मृत्युसे सम्पन्न शक्तिशाली व्यक्तिकी भी शीघ्र मृत्युको रोक नहीं सकता है। ऐसे हीरेको धारण नहीं करना चाहिये।

षट्कोण, अष्टकोण, द्वादशकोण, षट्पार्श्व, अष्टपार्श्व, द्वादशपार्श्व, षड्धारा, अष्टधारा, द्वादशधारा, उत्तुंग, सम एवं तीक्ष्णाग्र भाग हीरेके खानिक अर्थात् प्रकृतिगत गुण हैं।

जो हीरा षट्कोण, विशुद्ध, निर्मल, तीक्ष्ण धारवाला लघु, सुन्दर पार्श्वभागसे युक्त और निर्दोष है तथा इन्द्रायुध वज्रके समान स्फुरित अपनी प्रभाको विकीर्ण करनेमें समर्थ हो तो अन्तरिक्ष भागमें स्थित वह हीरा इस पृथिवीलोकमें सुलभ नहीं है।

जो मनुष्य तीक्ष्णाग्र, निर्मल तथा दोषशून्य हीरेको धारण करता है, वह जीवनपर्यन्त प्रतिदिन स्त्री, सम्पत्ति, पुत्र, धन-धान्य और गवाधिक पशुओंकी श्रीवृद्धिको प्राप्त करता है। सर्प, विष, व्याधि, अग्नि, जल तथा तस्करादिक भय एवं अभिचार-मन्त्रोंके उच्चाटनादिक प्रयोग उसके सन्निकट आनेके पूर्व दूरसे ही प्रत्यागमित हो जाते हैं।

यदि हीरा सभी दोषोंसे रहित तथा भारमें बीस तण्डुलके बराबर हो तो मणिशास्त्रके पण्डितोंने उसका मूल्य अन्य हीरेकी अपेक्षा द्विगुण अधिक कहा है। पूर्वोक्त परिमाणमें तीन भाग, अर्द्धभाग, चतुर्थांश, त्रयोदशांश और तीसवाँ अंश, साठवाँ अंश, अस्सीवाँ अंश, शतांश तथा सहस्त्रांश भाग न्यूनाधिक होनेपर मूल्यका निर्धारण भी उसके समान ही न्यूनाधिक होता है।

आठ गौर सरसोंके दानोंके भारके बराबर एक तण्डुलका भार होता है।

जो हीरा सभी गुणोंसे सम्पन्न होता है और जलमें डालनेपर तैरता है, वह सभी रत्नोंमें सर्वश्रेष्ठ होता है। उसीको धारण करना उचित है।

जिस हीरेमें अल्पमात्र भी स्पष्ट अथवा अस्पष्ट दोष होता है तो स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा उस हीरेको मनुष्य दशांश कम मूल्यमें ही प्राप्त कर लेता है। जिस हीरेमें छोटे अथवा बड़े अनेक दोष प्रकट रहते हैं, उस हीरेका मूल्य स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा शतांश ही माना गया है।

अलंकारके रूपमें प्रयुक्त हीरेमें यदि किसी भी प्रकारका दोष परिलक्षित होता है तो अपेक्षाकृत

५५- वैदूर्यमणिकी परीक्षा-विधि

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काण्ड ] मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि ११७


उसका मूल्य बहुत ही कम हो जाता है। यदा-कदा जो हीरा सबसे पहले गुण-सम्पत्तियोंसे परिपुष्ट माना जाता है, वही बादमें दोषयुक्त हो जाता है। राजाको ऐसे दोषपूर्ण हीरेसे बने आभूषणको धारण नहीं करना चाहिये। गुणहीन होनेपर तो मणि भी आभूषणके योग्य नहीं होती है।

पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रीके लिये सर्वगुण-सम्पन्न होनेपर भी हीरा प्रशस्त नहीं होता है। दीर्घ, चिपटा, ह्रस्व तथा अन्यान्य गुणोंसे रहित हीरेके विषयमें कुछ कहना ही नहीं, वह तो दोषपूर्ण होता ही है।

हीरेके कुशल विशेषज्ञ लौह, पुष्पराग, गोमेद, वैदूर्य, स्फटिक एवं विविध प्रकारके काँचोंसे हीरकके प्रतिरूपोंका निर्माण कर लेते हैं। अतः विद्वानोंको कुशल परीक्षकोंसे उनकी परीक्षा करवा लेनी चाहिये।

क्षारद्रव्यके द्वारा, उल्लेखन-विधिसे एवं शाण-प्रयोगसे हीरोंका परीक्षण करना चाहिये। पृथिवीमें जितने भी रत्न हैं अथवा लौहादिक जितनी अन्य धातुएँ हैं, हीरा उन सबमें चिह्नाङ्कन कर सकता है; किंतु अन्य कोई भी रत्न या धातु हीरेमें चिह्न करनेमें समर्थ नहीं है।

गुरुता समस्त रत्नोंके महत्त्वका कारण है, फिर भी रत्नशास्त्रज्ञ हीरेके विषयमें इस निर्देशके विपरीत ही कहते हैं।

पुष्परागादि जातिविशेषके रत्न दूसरी जातिके रत्नको काट सकते हैं, किंतु हीरक एवं कुरुविन्द* अपनी ही जातिके रत्नको काटनेमें सक्षम होते हैं। हीरेसे हीरा ही कट सकता है, अन्य रत्नोंसे वह हीरा काटा नहीं जा सकता है।

स्वाभाविक हीरेके अतिरिक्त हीरक तथा मुक्तादि जितने प्रकारके रत्न हैं, उनमें किसी भी रत्नकी प्रभा ऊर्ध्वगामिनी नहीं होती है। मात्र हीरा ही ऐसा रत्न है, जिसकी प्रभा ऊपरकी ओर जाती है।

यदि हीरा टूटे हुए किनारोंसे दोषयुक्त हो या विन्दु तथा रेखासे समन्वित हो अथवा विशेष वर्णसे रहित हो तो भी इन्द्रायुध-चिह्नसे अङ्कित होनेपर वह मनुष्यको धन-धान्य एवं पुत्रादिसे परिपूर्ण करता है।

जो राजा विद्युत्-तुल्य, समुज्ज्वल एवं चमकते हुए शोभा-सम्पन्न हीरेको धारण करता है, वह अपने पराक्रमसे दूसरेके प्रतापको आक्रान्त करनेमें समर्थ होता है तथा अपने समस्त सामन्तोंको वशमें रखकर वह पृथिवीका उपभोग करता है। (अध्याय ६८)


मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि

सूतजीने कहा— श्रेष्ठ हाथी, जीमूत (मेघ), वराह, शङ्ख, मत्स्य, सर्प, शुक्ति तथा बाँसमें उत्पन्न मुक्ताफलोंकी संसारमें प्रसिद्धि है; किंतु इनमें शुक्ति (सीप)-में प्रादुर्भूत मुक्ताएँ ही अधिक उपलब्ध हैं।

मुक्ताशास्त्री कहते हैं कि इन मुक्ताओंमें मात्र एक ही ऐसी मुक्ता होती है, जिसको रत्नपदपर अधिष्ठित किया जा सकता है। वह शुक्तिसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता है। यह सूचिकादि यन्त्रोंसे वेध्य होती है, शेष मुक्ताएँ अवेध्य हैं।

प्रायः बाँस, हाथी, मत्स्य, शङ्ख एवं वराहसे उत्पन्न मुक्ताएँ प्रभावहीन होती हैं; फिर भी माङ्गलिक होनेसे वे प्रशस्त मानी जाती हैं।

रत्ननिर्णायक विद्वानोंने मुक्ताओंके जिन आठ


* कुरुविन्द—माणिक्य अथवा कुरुबिल्व नामका रत्नविशेष।

५६-पुष्पराजमणिकी परीक्षा -विधि

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१९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रकारोंका वर्णन किया है, उनमें शङ्खसे उत्पन्न और हाथीसे प्राप्त होनेवाली मुक्ताको अधम कहा है।

शङ्खसे उत्पन्न मुक्ता, अपने मूल कारणके मध्यभागमें अवस्थित वर्णके समान वर्णवाली तथा परिमाणमें बृहल्लोल फलके सदृश होती है। जो मुक्ता हाथीके कुम्भस्थलसे निकलती है, वह पीतवर्णवाली एवं प्रभाविहीन होती है। जो शङ्खोद्भव मुक्ताएँ हैं, वे शार्ङ्गधनुषके तुल्य वर्णको प्राप्त पीतशङ्खोंके श्रेष्ठ गोत्रमें ही उत्पन्न होती हैं। जो गजमुक्ताएँ हैं, उनका भी जन्म विशुद्ध वंशवाले मदमत्त गजराजोंमें होता है, उन्हें मौक्तिकप्रभव अर्थात् गजमुक्ता नामसे अभिहित किया गया है। इनसे प्राप्त मुक्ता पूर्णतया पीतवर्णसे युक्त एवं प्रभाविहीन होती है।

मत्स्यसे उत्पन्न मुक्ता पाठीन मत्स्यके पीठके समान वर्णवाली, अत्यन्त सुन्दर, वृत्ताकार, लघु एवं अत्यधिक सूक्ष्म होती है। यह जलचर प्राणियोंके मुखोंमें प्राप्त होती है, उनमें भी जो मत्स्य अथाह समुद्रकी जलराशिमें विचरण करते हैं, वे इसके जनक होते हैं।

वराहके दाँतसे उत्पन्न मुक्ता उसके ही दन्ताङ्कुरोंके सदृश वर्णवाली होती है, किंतु ऐसी मुक्ता प्रदान करनेवाले विशिष्ट वराहराज कहीं किसी विशेष भूप्रदेशमें ही पाये जाते हैं।

बाँसके पर्वोंसे उत्पन्न मुक्ताएँ वर्षोपल (ओले)-के समान समुज्ज्वल वर्णकी सुन्दर शोभासे सुशोभित रहती हैं। ऐसी मुक्ताओंके जनक बाँसोंके वंश दिव्यजनोंके लिये उपभोग्य विशेष स्थानमें अङ्कुरित होते हैं। वे सार्वजनिक स्थानोंमें नहीं पाये जाते।

सर्पमुक्ता मत्स्यमुक्ताके सदृश विशुद्ध तथा वृत्ताकार होती है। स्थान-विशेषके कारण उसकी अत्यन्त उज्ज्वल शोभा होती है। इसकी कान्ति शाणपर चढ़ायी गयी तलवारकी धारके समान अत्यन्त स्वच्छ होती है। सर्पके सिरसे प्राप्त होनेवाली इस मुक्ताको अर्जित करनेवाले मनुष्य अतिशय प्रभासम्पन्न, राज्यलक्ष्मीसे युक्त तथा दुःसाध्य महान् ऐश्वर्यसम्पन्न, तेजस्वी एवं पुण्यवान् होते हैं।

रत्नोंके गुण एवं अवगुणोंको जाननेकी इच्छासे यदि रत्न-विधियोंमें पूर्ण अधिकार रखनेवाले विद्वानोंके द्वारा शुभ मुहूर्तमें प्रयत्नपूर्वक समस्त रक्षाविधिसे सम्पन्न भवनके ऊपर उस मुक्ताको स्थापित करा दिया जाय तो उस समय आकाशमें देव-दुन्दुभियोंकी ध्वनि परिव्याप्त हो उठती है। इन्द्रधनुषकी टंकार, विद्युल्लताओंके संघर्षण एवं सघन पयोधरोंकी पारस्परिक टकराहटसे अन्तरिक्ष आच्छादित हो उठता है।

जिसके कोशागारमें यह सर्पमुक्ता रहती है, उसकी मृत्यु सर्प, राक्षस, व्याधि या अन्य आभिचारिक दोषके कारण नहीं होती।

मेघसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता पृथ्वीतक आ ही नहीं पाती। देवगण आकाशमें ही उसका हरण कर लेते हैं। उस मेघमुक्ताके तेजकी दिव्य कान्तिसे अनावृत समस्त दिशाएँ आलोकित हो उठती हैं। सूर्यके समान देदीप्यमान उसका परिमण्डल देखनेमें कष्टसाध्य होता है। अग्नि, चन्द्र, नक्षत्र तथा ताराओंके तेजको तिरस्कृत करके जैसे सूर्यके कारण दिन प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार गहन अन्धकारसे भरी हुई रात्रियोंमें भी उस मेघमुक्ताका तेज दिनकी प्रभाके समान ही प्रभाको विकीर्ण करता है। विचित्र रत्नकान्तिको प्राप्त सुन्दर आभूषणको प्रशस्त बनानेके लिये जलराशिवाले चारों समुद्रोंसे इस मुक्ताका जन्म हुआ है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह जिसके पास रहती है, वह राजा होता है। उसके राज्यकी सम्पूर्ण भूमि सोनेसे परिपूर्ण होती है। कदाचित् शुभ तथा महान् कर्मविपाकसे यदि

५७- कर्केतनमणिकी परीक्षा-विधि

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काण्ड ] मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि ११९


कोई दरिद्र भी इस मेघमुक्ताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्तिके पास जबतक यह रहती है, तबतक वह शत्रुओंसे रहित सम्पूर्ण पृथिवीका उपभोग करता है।

यह मेघमणि मात्र राजाके लिये ही शुभप्रद है, ऐसा नहीं है, अपितु प्रजाओंके भाग्यसे भी इसका जन्म होता है। यह अपने चारों ओर सहस्र योजनपर्यन्त क्षेत्रमें अनर्थोंको आने नहीं देती।

दैत्यराज बलासुरके मुखसे विशीर्ण हुई दन्तपंक्ति आकाशमें फैली हुई नक्षत्रमालाके समान प्रतीत होती थी। विचित्र वर्णोंमें भी अपना विशुद्ध स्थान रखनेवाली वह दन्तावलि आकाशसे उस समुद्रकी जलराशिमें गिरी, जो पूर्णिमाके चन्द्रकी समस्त षोडशकलाओंको तिरस्कृत करनेमें समर्थ महागुणसम्पन्न मणिरत्नका निधान है। समुद्रके जलमें उसे शुक्तिमें स्थान प्राप्त हुआ। अतः वह सामुद्रिक मुक्ताका प्राचीन बीज बन गया, जिससे अन्य मुक्ताओंका उद्भव हुआ। समुद्रके जिस जल-प्रदेशमें सुन्दर रत्न मुक्तामणिके बीज गिरे, उसी प्रदेशमें वे बीज फैलकर शुक्तियोंमें स्थित होनेके कारण मुक्तामणि (मोती) हो गये। अतएव सिंहल, परलोक, सौराष्ट्र, ताम्रपर्ण, पारशव, कुबेर, पाण्ड्य, हाटक और हेमक—ये मुक्ताओंके खजाने हैं।

वर्धन, पारसीक, पाताल, लोकान्तर तथा सिंहलादिकी शुक्ति-मुक्ताएँ प्रमाण, स्थान, गुण और कान्तिकी दृष्टिसे अन्य क्षेत्रोंमें प्राप्त होनेवाली मुक्ताओंकी तुलनामें अत्यधिक हीन वर्णकी नहीं होती हैं। अतः विद्वान् व्यक्तिको उनके मूल उत्पत्ति-स्थानको लेकर चिन्तन नहीं करना चाहिये, बल्कि उनके रूप एवं प्रमाणपर ही विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता होती है। इस प्रकारकी मुक्तासे सम्बन्धित गुण-अवगुणकी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। ये सर्वत्र सब प्रकारकी आकृतियोंमें पायी जाती हैं।

शुक्तिसे उत्पन्न एक मुक्ताफलका मूल्य एक हजार तीन सौ पाँच मुद्रा होता है। आधे तोले भारवाली मुक्ताका मूल्य उक्त मूल्यकी अपेक्षा २/५ भाग कम होता है। जिस मुक्ताका भार तीन माशा अधिक हो, उसका मूल्य दो हजार मुद्रा कहा गया है।

ढाई माशा परिमाणवाली मुक्ताका मूल्य तेरह सौ मुद्रा होता है। जो मुक्ता दो माशा परिमाणकी होती है, उसका मूल्य आठ सौ मुद्रा है। जिसका परिमाण आधा माशा है, उसका मूल्य तीन सौ बीस मुद्रा है। जो मुक्ता भारमें छः गुंजाके बराबर है, पण्डितोंने उसका मूल्य दो सौ मुद्रा स्वीकार किया है। जिसका परिमाण तीन गुंजा है, वह एक सौ मुद्राकी होती है। जो मुक्ता उक्त परिमाणमें सोलहवाँ भाग है, विद्वानोंने उसको दार्विका कहा है। उसका मूल्य एक सौ दस मुद्रा होता है।

जिस मुक्ताका कथित परिमाणकी तुलनामें भार १/२० भाग होता है, उसको विद्वानोंने भवककी संज्ञा प्रदान की है। यदि वह मुक्ता गुणहीन न हो तो उसका मूल्य सत्तानबे मुद्रा होता है। जो मुक्ता उक्त स्वाभाविक परिमाणमें १/३० भागकी होती है, उसको शिक्य कहा जाता है। उसका मूल्य चालीस मुद्रा होता है। जिसका परिमाण कहे गये परिमाणकी अपेक्षा १/४०वाँ अंश हो तो उसका मूल्य तीस मुद्रा है। जो मुक्ता १/५०वाँ अंश परिमित होती है, उसे सोम कहा जाता है। उसका मूल्य बीस मुद्रा है। जो मुद्रा १/६० अंशके बराबर होती है, उसको निकरशीर्ष कहा जाता है। वह चौदह मुद्रा मूल्यकी होती है। १/८० तथा १/९० अंश परिमित मुक्ताको कूप्य नामसे अभिहित किया गया है। उनका मूल्य क्रमशः ग्यारह और नौ मुद्रा है।

५९- पुलकमणिके लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

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१२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विशुद्धताके लिये मुक्ताओंको अन्नपात्र (अर्थात् अन्न रखनेवाले मटके)-में भरे हुए जम्बीर-रसमें डालकर पकाना चाहिये। तत्पश्चात् उनकी मूल आकृतियोंको घिसकर चिक्कण एवं समुज्ज्वल आकार प्रदान करके उनमें यथाशीघ्र छेद भी कर देना चाहिये।

सर्वप्रथम पूर्णतया आर्द्र मिट्टीसे लिप्त मत्स्य पुटपाक और फिर बिडाल पुटपाकमें मुक्ताओंका पाचन करे। उसके बाद उन्हें चिकना और उज्ज्वल बनानेके लिये उसमेंसे निकालकर दूध अथवा जल या सुधारसमें पकाया जाता है। तदनन्तर स्वच्छ वस्त्रसे घिस-घिसकर उन्हें उज्ज्वल और चमकदार रूप प्रदान किया जाता है। ऐसा करनेसे वह मौक्तिक अत्यधिक गुणवान् तथा कान्तिसे युक्त हो जाता है। महाप्रभावशाली, सिद्ध एवं संतप्तजनोंके हितमें लगे रहनेवाले, दयावान् आचार्य व्याडिने ऐसा ही कहा है।

रसविशेषमें शोधित वही मुक्ता शरीरका अलङ्कार होती है—जो श्वेत काँचके समान हो, स्वर्णजटित हो तथा रत्नशास्त्रके अनुसार सुपरीक्षित होनेके कारण (तार) कष्टका निवारण करनेवाली हो। सिंहल-देशके कुशलजन ऐसा ही (शोधनादि कार्य) करते हैं।

यदि किसी मुक्ताके कृत्रिम होनेका संदेह हो तो उसको लवणमिश्रित उष्ण, स्नेह द्रव्यमें एक रात रखकर सूखे वस्त्रमें वेष्टित करके यथायोग्य धान्यके साथ उसका मर्दन करे। ऐसा करनेसे यदि उसमें विवर्ण भाव नहीं आता है तो उसको स्वाभाविक मुक्ता ही मानना चाहिये।

यथोक्त प्रमाणवाली गुरु, श्वेत, स्निग्ध, स्वच्छ, निर्मल एवं तेजसम्पन्न, सुन्दर एवं वृत्ताकार मुक्ता गुणसम्पन्न मानी गयी है। प्रमाणमें बड़ी-बड़ी, सुन्दर, रश्मि-कान्तिसे परिपूर्ण, श्वेत, सुवृत्ताकार, समान एवं सूक्ष्म छिद्रसे युक्त जो मुक्ता होती है, वह क्रय न करनेवाले व्यक्तिको भी आनन्दित करती है*। अतः ऐसी मुक्ताको प्रशस्त मानना चाहिये।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि रत्नशास्त्रीय परीक्षा-विधिके अनुसार जिस मुक्तामें सभी गुणोंका उदय हो गया है, यदि वह मुक्ता किसी पुरुषका योग (संयोग) प्राप्त कर लेती है तो वह अपने स्वामीको किसी भी प्रकारके एक भी अनर्थोत्पादक दोषके सम्पर्कमें नहीं आने देती। (अध्याय ६९)


पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने कहा—**भगवान् भास्कर जब महामहिम दैत्यराज बलासुरके उस श्रेष्ठ रत्नबीजरूप शरीरके रक्तको लेकर स्वच्छ नीले आकाश-मार्गसे देवलोकको जा रहे थे; उसी समय निरन्तर देवोंपर विजय प्राप्त करनेसे अहंकारमें भरे हुए लंकाधिपति रावणने आकर बलात् उनको शत्रुके समान आधे मार्गमें ही रोक लिया। भयवश सूर्यने बलासुरके रत्नबीजरूपी रक्तको लंका देशकी एक श्रेष्ठ नदीके जलमें छोड़ दिया, जो उस देशकी सुन्दर रमणियोंके कान्तिमय नितम्बोंकी प्रतिच्छायासे झिलमिलाते हुए अगाधजलसे परिपूर्ण तथा सुपारीकी वृक्ष-पंक्तियोंसे आच्छादित अपने दोनों तटोंसे सुशोभित हो रही थी। गङ्गाके समान पवित्र एवं उत्तम फलोंको प्रदान करनेमें सक्षम उस नदीका नाम रावणगङ्गा प्रसिद्ध हो गया।


* उत्तम मुक्ताका क्रय-(मुक्ता विक्रय) करनेसे रुपये मिलते हैं, उससे आनन्दानुभूति होती है। क्रय किये बिना भी अपनी उत्तमताके कारण यथाविधि यदि मुक्ता धारण की जाय तो वह स्वयं विविध ऐश्वर्य देती ही है। इसलिये आनन्दानुभूति दोनों दशा (क्रय करने, न करने)-में समान है।

६१- स्फटिक-परीक्षा

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काण्ड ]पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि१२१

बलासुरके रत्नबीजरूपी रक्तके गिरनेसे उस नदीके तटपर उसी समयसे रात्रिमें रत्नराशियाँ स्वयं आकर एकत्र होने लगीं। अतएव नदीका अन्तःभाग एवं बाह्यभाग सैकड़ों स्वर्ण-बाणोंके समान अपनी प्रभाको बिखेरनेमें समर्थ रत्नोंसे प्रतिभासित होने लगा। उस रावणगङ्गाके दोनों तट सदैव रत्नोंकी उज्ज्वल प्रभासे सुशोभित रहते हैं। उसके जलमें उत्पन्न पद्मराग नामक रत्न सौगन्धिक (शापमाल-विकसित होनेवाला श्वेतमाल), कुरुविन्दज (रत्नविशेष) तथा स्फटिक रत्नोंके प्रधान गुणोंको धारण करते हैं। उनका स्वरूप बन्धूकपुष्प, गुञ्जाफल, वीरबहूटी कीट तथा जवाकुसुम और अष्टक (कुंकुम)-के वर्णोंकी कान्तियोंसे सुशोभित रहता है। कुछ पद्मराग दाड़िम-बीजकी आभासे सम्पन्न तथा कुछ किंशुक (पलाश)-पुष्पके समान रक्तवर्णकी कान्तिसे युक्त रहते हैं। सिन्दूर, रक्तकमल, नीलोत्पल, कुंकुम और लाक्षारसके समान रंगवाले भी पद्मराग होते हैं। गहरा वर्ण होनेपर भी उन पद्मरागरत्नोंमें स्फुरित शोभासम्पन्न कान्तियाँ सुन्दर आभाको फैलाती रहती हैं।

स्फटिकसे उद्भूत पद्मराग सूर्यकी किरणोंसे सम्पृक्त होकर अपनी रश्मियोंके द्वारा दूर रहते हुए भी पार्श्वभागोंको अनुरञ्जित करते हैं। कुछ रत्न कुसुम्भवर्ण एवं नीलवर्णकी मिश्रित आभासे सम्पन्न रहते हैं तो कुछ रत्नोंका वर्ण नये विकसित कमलके सदृश शोभाको धारण करता है। कुछ रत्न भल्लान्तक तथा कण्टकारी-पुष्पके समान कान्ति प्राप्त करनेवाले हैं और कुछ रत्न हिंगुल अर्थात् हींग-वृक्षके पुष्पोंकी शोभासे सुशोभित रहते हैं। कतिपय रत्नोंका वर्ण चकोर, पुंस्कोकिल तथा सारस पक्षियोंके नेत्रोंके समान होता है। कुछ रत्न कुमुद-पुष्पके सदृश होते हैं। प्रायः गुण-प्रभाव, शारीरिक काठिन्य एवं गुरुत्वमें स्फटिकोद्भूत पद्मरागमणियाँ समान होती हैं।

सौगन्धिक मणियोंसे प्रादुर्भूत पद्मरागमणिका वर्ण नीले और लाल कमलके समान होता है। कुरुविन्दकसे उत्पन्न पद्मरागमणियोंमें वैसी आभा नहीं होती है, जैसी आभा स्फटिकसे उद्भूत पद्मराग मणियोंमें रहती है। अधिकांश मणियोंमें प्रभा अन्तर्निहित होती है। फिर भी वे अपनी समस्त पुञ्जीभूत रश्मि-प्रभाओंसे लोगोंपर अपना अत्यधिक प्रभाव डालती हैं।

उस रावणगङ्गामें जो भी कुरुविन्दक रत्न पाये जाते हैं, वे सभी सघन, रक्ताभवर्ण तथा स्फटिक प्रभाववाले होते हैं। उन रत्नोंकी वर्ण-समानताको प्राप्त करनेवाले अन्य रत्न आन्ध्रादिक किसी दूसरे देशमें दुर्लभ हैं। उन स्थानोंमें जो भी कुरुविन्दक रत्न प्राप्त होते हैं, उनका मूल्य इस रावणगङ्गा नदीसे प्राप्त रत्नोंकी अपेक्षा बहुत ही कम होता है। उसी प्रकार यहाँपर उत्पन्न स्फटिकमणियोंसे प्रादुर्भूत पद्मरागकी समानतामें तुम्बुरु देशसे प्राप्त होनेवाली मणियोंका भी मूल्य कम ही माना गया है।

वर्णाधिक्य, गुरुता, स्निग्धता, समता, निर्मलता, पारदर्शिता, तेजस्विता एवं महत्ता श्रेष्ठ मणियोंका गुण है। जिन मणियोंमें करकराहट, छिद्र, मल, प्रभाहीनता, परुषता तथा वर्णविहीनता होती है, वे सभी जातीय गुणोंके रहनेपर प्रशस्त नहीं मानी जातीं।

यदि अज्ञानतावश कोई मनुष्य ऐसी दोषयुक्त मणियोंको धारण कर लेता है तो उनके कुप्रभावसे उत्पन्न शोक, चिन्ता, रोग, मृत्यु तथा धननाशादि आपदाएँ उसको घेर लेती हैं।

पूर्वकथित श्रेष्ठ मणियोंकी तुलनामें अत्यधिक सौन्दर्य-सम्पन्न एवं उनके प्रतिरूप होनेपर भी पाँच जातियोंकी मणियोंको विजातीय माना गया है। जिनका परीक्षण विद्वान् पुरुषको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। कलशपुर, सिंहल, तुम्बुरु, मुक्तपाणि तथा

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१२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

श्रीपूर्णकमें उत्पन्न पद्मरागका रावणगङ्गासे प्राप्त शुभप्रद पद्मरागमणियोंसे सादृश्य होनेपर भी वे विजातीय ही माने गये हैं।

तुष-सदृश (मलिन वर्णका) होनेसे कलशपुर, अल्प ताम्रवर्णके कारण तुम्बुरु देश, कृष्णवर्णके रहनेसे सिंहल, नीलवर्णके होनेसे मुक्त तथा कान्तिविहीन होनेसे श्रीपूर्णककी मणियोंमें (रावणगङ्गाकी मणियोंकी अपेक्षा) विजातीय रूप होनेसे ही भेद स्पष्ट होता है।

जो पद्मराग ताम्रिका (गुञ्जा)-के वर्णको धारण करता है, तुष (बहेड़ा)-के समान मध्यमें पूर्णतासे युक्त (गोलाकार) होता है तथा स्नेहसे प्रदिग्ध (स्वभावतः स्नेहिल) होता है और अत्यन्त घिसनेके कारण कान्तिविहीन हो जाता है, मस्तक-संघर्षण अथवा हाथोंकी अँगुलियोंके स्पर्शसे जिसके पार्श्वभाग काले हो जाते हैं, हाथमें लेकर बार-बार ऊपरकी ओर उछालनेपर जो मणि प्रत्येक बार एक ही वर्णको धारण करती है, वह सभी गुणोंसे युक्त होती है। समान प्रमाण, समान जाति अथवा गुरुत्व धर्मसे दो वस्तुओंमें तुलना होती है। अतः विशेष रत्नाकरसे प्राप्त रत्नोंकी स्वजातिका निर्धारण गुरुत्व और गुण-धर्मके अनुसार विद्वान् व्यक्तिको करना चाहिये। यदि उनमें संदेह उत्पन्न हो जाय तो उनको शाणपर चढ़ाकर खरादना चाहिये। वज्र या कुरुविन्दक रत्नको छोड़कर अन्य किसी भी रत्नके द्वारा पद्मराग एवं इन्द्रनीलमणिमें चिह्न-विशेष टंकित नहीं किया जा सकता है।

जातिविशेषमें उत्पन्न सभी मणियाँ विजातीय नहीं होती हैं। उनका वर्ण समान होता है, फिर भी उनके पृथक्करणके लिये उनमें विभिन्न भेद बताये गये हैं। गुणयुक्त मणिके साथ गुणरहित मणिको धारण नहीं करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको कौस्तुभ-मणिके साथ विजातीय मणिको धारण नहीं करना चाहिये; क्योंकि अनेक गुणोंसे सम्पन्न मणियोंको एक ही विजातीय मणि नष्ट करनेमें समर्थ होती है।

शत्रुओंके बीच निवास करने तथा प्रमाद-वृत्तिमें आसक्त रहनेपर भी विशुद्ध महागुणसम्पन्न पद्मरागमणिका स्वामी होनेसे किसी भी व्यक्तिको आपदाएँ स्पर्शतक नहीं कर सकतीं। जो गुणोंसे परिपूर्ण तेजस्वी सुन्दर वर्णवाले पद्मरागमणिको धारण करता है, उसके समीपमें उपस्थित होकर दोष-संसर्गजनित उपद्रव कोई कष्ट देनेमें अपनेको सक्षम नहीं कर पाते हैं।

जिस प्रकार तण्डुल-परिमाणके अनुसार हीरेका मूल्य निर्धारित होता है, उसी प्रकार महागुणसम्पन्न पद्मरागमणिके मूल्यका निर्धारण उड़दके परिमाणका आकलन करके करना चाहिये।

जो मणि या रत्न उत्तम वर्ण एवं श्रेष्ठ कान्तियोंसे सम्पन्न रहते हैं, उन्हींको प्रशस्त माना जाता है। यदि उनमें तनिक भी दोषके कारण भ्रष्टता आ जाती है तो उनका मूल्य घट जाता है। (अध्याय ७०)


मरकतमणि*का लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि

**सूतजीने कहा—**नागराज वासुकि उस असुरपति बलासुरके पित्तको लेकर अत्यन्त वेगसे मानो आकाशमार्गको दो भागोंमें विभक्त करते हुए देवलोकको जा रहे थे। उस समय वे अपने ही सिरपर अवस्थित मणिकी प्रभासे देदीप्यमान होनेके कारण आकाशरूपी समुद्रपर बने हुए एक अद्वितीय रजतसेतुके समान सुशोभित हो रहे थे। उसी समय अपने पंख-निपातसे पृथिवी एवं आकाशको आतंकित


* मरकतमणि—पन्ना।