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Read in context| ११२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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मधुर शब्दोंका प्रयोग करके वह दूसरोंको सुख प्रदान करती है, वही स्त्री श्रेष्ठ होती है। स्त्रियोंकी नासिका और नासिका-छिद्र समान होना मनोहर और मङ्गलदायी होता है।
स्त्रियोंके नीलकमलके समान नेत्र अच्छे होते हैं। बालचन्द्रके सदृश भौंहोंका होना शुभ है, किंतु उनका मोटा होना अच्छा नहीं है। उनका मस्तक अर्द्धचन्द्रके समान सुन्दर, समतल तथा रोमविहीन होना शुभ है।
सुन्दर, समान, मांसल एवं कोमल कान श्रेष्ठ होते हैं। स्त्रियोंके चिकने, नीलवर्णवाले, मृदु और घुँघराले केश प्रशस्त माने गये हैं। उनका सम आकारवाला सिर शुभ होता है। चरणतल अथवा करतलमें अश्व, हस्ति, श्री, वृक्ष, यूप, बाण, यव, तोमर, ध्वज, चामर, माला, पर्वत, कुण्डल, वेदी, शङ्ख, छत्र, पद्म, स्वस्तिक, रथ तथा अङ्कुश आदि चिह्नवाली स्त्रियाँ राजवल्लभा होती हैं।
स्त्रियोंके मांसल मणिबन्धवाले तथा कमलदलके समान हाथोंको शुभ माना जाता है। स्त्रियोंके करतलोंका न तो अधिक निम्न और न अधिक उन्नत होना अच्छा होता है। शुभ रेखाओंसे व्याप्त करतलवाली स्त्रियाँ आजीवन सधवा रहकर विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग करती हैं। हाथमें जो रेखा मणिबन्धसे निकलकर मध्यमा अँगुलीतक जाती है, वह ऊर्ध्वरेखा कही जाती है। ऐसी रेखा यदि स्त्री या पुरुषके करतल अथवा चरणतलमें अवस्थित रहती है तो वे स्त्री या पुरुष राज्य अथवा अन्य प्रकारके सुखोंका उपभोग करते हैं।
कनिष्ठिका अँगुलीके मूलसे निकलकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियोंके मध्यभागतक रेखाके पहुँचनेपर स्त्री या पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है। यदि इन अँगुलियोंके बीचतक आनेवाली रेखाका परिमाण उसकी अपेक्षा कम हो तो उसी अनुपातमें मनुष्यकी आयु भी कम होती है।
अङ्गुष्ठमूलक रेखाओंके रहनेपर स्त्री या पुरुष बहुत-से पुत्रों या कन्याओंवाले होते हैं। स्थान-स्थानपर आयुरेखाके छिन्न-भिन्न होनेसे मनुष्यकी आयु अल्प हो जाती है। यदि वह रेखा दीर्घ एवं अविच्छिन्न हो तो उस पुरुष अथवा स्त्रीको दीर्घायु माना जाता है। स्त्रियोंके विषयमें कहे गये ये सभी लक्षण शुभ हैं। इनके विपरीत लक्षणोंके होनेपर उन्हें अशुभ मानना चाहिये। (अध्याय ६५)
चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम
**श्रीहरिने कहा—**हे शिव! चक्राङ्कित शालग्राम-शिलाकी पूजा सब प्रकारके कल्याण-मङ्गल प्रदान करती है।
प्रथम शालग्राम-शिलाका नाम सुदर्शन है। (इसमें एक चक्रका चिह्न अङ्कित होता है।) दूसरी शिलाका नाम लक्ष्मीनारायण है। (इसमें दो चक्रोंके चिह्न होते हैं।) तीन चक्रोंवाली शिलाको अच्युत तथा चार चक्रोंवाली शिलाको चतुर्भुज कहा जाता है। इस प्रकार चक्रसमन्वित अन्य शालग्राम-शिलाओंको क्रमशः—वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण तथा पुरुषोत्तमके नामसे अभिहित किया गया है। नौ चक्रोंवाली शिलाको नवव्यूह और दस चक्रोंवाली शिलाको दशात्मक कहते हैं। एकादश चक्रोंसे युक्त शिलाको अनिरुद्ध एवं द्वादश चक्रोंसे समन्वित शिलाका नाम द्वादशात्मक है। उसके ऊपर चक्रोंकी चाहे जितनी संख्या हो, उनसे लक्षित शिलामूर्तिका