गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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सिंहके साथ मकर, कन्याके साथ मेष, तुलाके साथ मीन, कुम्भके साथ कर्क, धनुके साथ वृष और मिथुनके साथ वृश्चिकराशिका योग श्रेष्ठ होता है। यह षडष्टक योग है। यह योग प्रीतिकारक होता है,<sup>१</sup> इसमें संशय नहीं है।
(अध्याय ६१)
लग्न-फल, राशियोंके चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहोंका स्वभाव तथा सात वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य
श्रीहरिने कहा—हे शिव! सूर्य उदयकालसे मेषादि राशियोंपर अवस्थित रहते हैं। वे दिनमें क्रमशः छः राशियोंको पारकर रात्रिमें शेष छः राशियोंको पार करते हैं।
मेषलग्नमें कन्याका जन्म होनेपर वह वन्ध्या होती है। वृषलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या कामिनी होती है, मिथुनलग्नवाली सौभाग्यशालिनी तथा कर्कलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या वेश्या होती है। सिंहलग्नमें जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्रोंवाली, कन्यालग्नवाली रूपसे सम्पन्न, तुलालग्नवाली रूप और ऐश्वर्यसे युक्त तथा वृश्चिकलग्नवाली कर्कश स्वभावकी होती है। धनुलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या सौभाग्यवती तथा मकरलग्नवाली निम्न पुरुषोंके साथ गमन करनेवाली होती है। कुम्भलग्नमें जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्रों तथा मीनलग्नवाली वैराग्ययुक्त होती है<sup>२</sup>।
तुला, कर्क, मेष और मकर—ये चर राशियाँ हैं, इनमें यात्रादि चर कार्य करने चाहिये। सिंह, वृष, कुम्भ और वृश्चिक स्थिर राशि हैं। इनमें स्थिर कार्य करने चाहिये। कन्या, धनु, मीन एवं मिथुनराशि द्विस्वभावकी होती हैं। विद्वान् व्यक्तिको इन राशियोंमें द्विस्वभावसे युक्त कर्म करने चाहिये। यात्रा चरलग्नमें तथा गृह-प्रवेशादिका कार्य स्थिरलग्नमें करना चाहिये। देवताओंकी स्थापना और वैवाहिक संस्कारको द्विस्वभावके लग्नमें करना श्रेयस्कर है।
हे वृषभध्वज! प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी तिथियाँ नन्दा मानी जाती हैं। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ भद्रा कही गयी हैं। तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथियाँ जया कही गयी हैं। चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी—ये तीन रिक्ता तिथि हैं। ये शुभ कार्यके लिये वर्जित हैं।
सौम्य स्वभाववाला बुध ग्रह चर स्वभाव है। गुरु क्षिप्र, शुक्र मृदु और रवि ध्रुव स्वभावका है। शनि दारुण, मंगल उग्र तथा चन्द्रको समस्वभावका जानना चाहिये।
चर और क्षिप्र स्वभाववाले (अर्थात् बुध एवं बृहस्पति) वारमें यात्रा करनी चाहिये तथा मृदु और ध्रुव स्वभावसे संयुक्त शुक्र अथवा रविवारको गृह-प्रवेशादिका कार्य करना चाहिये। दारुण और उग्र स्वभाववाले शनि तथा मंगलवारको विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषासे क्षत्रियादि वीरोंको युद्धके लिये प्रस्थान करना चाहिये।
१-यहाँ षडष्टक योगको शुभ बताया गया है, किंतु मतान्तरसे वर-वधूके मेलापक चक्रमें यह षडष्टक योग अशुभ माना गया है। वर या वधूकी परस्पर जन्म-राशि एक-दूसरेसे छठी या आठवीं होना ही षडष्टक योग है। अर्थात् यदि एककी सिंह राशि हो और दूसरेकी मकरराशि तो ये राशियाँ गणना करनेपर एक-दूसरेसे छठी या आठवीं पड़ेंगी, ऐसे ही मेष-कन्या, वृष-तुला, मिथुन-वृश्चिक, कर्क-धनु आदिके विषयमें समझना चाहिये। प्रायः ऐसेमें विवाहादि नहीं किया जाता। षडष्टकके समान ही द्विर्द्वादश योग तथा नवम-पञ्चम योगपर भी विचार किया जाता है।
२-ज्योतिष-शास्त्रके अनुसार अन्य सभी योग एवं ग्रह-स्थितियोंको ध्यानमें रखकर ही इस फलपर विचार करना चाहिये। यहाँ दिग्दर्शनमात्र है।