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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 117

काण्ड ] स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण १०७

चिकने, ऊँचे उठे हुए ताम्रवर्णके समान लाल-लाल नखोंसे युक्त, मत्स्य, अंकुश, पद्म, चक्र तथा लाङ्गल (हल)-चिह्नसे सुशोभित एवं पसीनेसे रहित और कोमल तलवाले स्त्रीके चरण सौभाग्यशाली होते हैं।

सुन्दर रोमविहीन जंघा, गजशुण्डके सदृश ऊरु, पीपलपत्रके समान विशाल उत्तम गुह्यभाग, दक्षिणावर्त गम्भीर नाभि, रोमरहित त्रिवली और हृदयपर सुशोभित रोमरहित स्तन-प्रदेश—ये उत्तम स्त्रीके शुभ लक्षण हैं। (अध्याय ६४)


स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण

**श्रीहरिने कहा—**अब मैं सामुद्रिकशास्त्रमें कहे गये स्त्री और पुरुषके शुभाशुभ लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, जिन्हें जान लेनेसे भूत तथा भविष्यका ज्ञान हो जाता है।

मार्गमें गमन करनेपर विषम रूपसे पड़नेवाले, कषाय वर्णसे युक्त विचित्र प्रकारके बने हुए चरण वंशका नाश करते हैं। शङ्ख्वाकार चरणोंसे युक्त मनुष्य ब्रह्महत्या करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छा रखता है।

विरल रोमभागयुक्त जंघा तथा हाथीके सूँडके समान सुन्दर ऊरु भागोंवाले अंग राजाके शरीरमें सुशोभित होते हैं।

दरिद्रकी जंघाएँ सियारकी जंघाओंके समान होती हैं। कुंचित केशराशिवाले मनुष्यकी मृत्यु विदेशमें होती है।

मांसरहित जानु-प्रदेशवाला व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है। अल्प और छोटी-छोटी जानुओंके होनेसे मनुष्य स्त्री-प्रेमी तथा विशाल विकटाकार होनेपर दरिद्र होता है। मांससे भरपूर जानुओंके होनेपर मनुष्यको राज्यकी प्राप्ति होती है। बड़ी जानुओंके होनेपर मनुष्य दीर्घायु होता है।

मांसल स्फिक् (कूल्हा)-प्रदेशवाला व्यक्ति सुखी तथा सिंहके समान स्फिक् होनेपर वह राजपुरुष माना गया है। इसी प्रकार सिंहके सदृश कटिप्रदेशके होनेपर वह राजा होता है, किंतु कपिके समान कटिभागवाला व्यक्ति निर्धन होता है।

समान कक्ष (काँख)-प्रदेशवाले अत्यधिक भोग-विलासी होते हैं। निम्न कक्षाओंवाले धनहीन तथा उन्नत एवं विषम कक्षाओंवाले कुटिल होते हैं।

मत्स्यके समान उदरवाले प्रचुर धनवान् होते हैं। विस्तीर्ण नाभिप्रदेशसे सुशोभित जन सुखी एवं अत्यधिक गहरी नाभिके होनेपर कष्ट भोगनेवाले होते हैं।

त्रिवलीके मध्यभागमें नाभिके अवस्थित होनेपर प्राणी शूलरोगसे ग्रसित होते हैं। वामावर्त नाभिके होनेपर शक्तिसम्पन्न और दक्षिणावर्त होनेपर मेधावी होते हैं। पार्श्वदेशमें नाभिके विस्तृत होनेसे मनुष्य चिरंजीवी, उन्नत होनेपर ऐश्वर्यशाली, अधोमुख होनेपर गोधनसे सम्पन्न एवं पद्मकर्णिकाके सदृश सुन्दर होनेपर वे राजत्वको प्राप्त करते हैं।

उदरभागपर एक वलिके रहनेपर मनुष्य शतायु होता है। दो वलियोंके होनेसे वह ऐश्वर्यका भोग करनेवाला तथा त्रिवलियोंके होनेपर राजा या आचार्यकी पदवीको प्राप्त करता है। सरल वलियोंवाला मनुष्य सुखी होता है। वक्र वलिवाला व्यक्ति अगम्यागामी होता है।

जिसके दोनों पार्श्वभाग मांसल होते हैं, वह राजा होता है। मृदु, कोमल, सुन्दर और समभागकी दूरियोंपर अवस्थित दक्षिणावर्तीय रोमराशियोंसे सुशोभित व्यक्ति भी राजा होते हैं। यदि उदर-