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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages
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२५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
धारण करता है और उसमें क्रियाशक्तिका संचार करता है। अब अगले
सूत्रमें इसके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—
अणुश्च ॥ २ । ४ । १३ ॥
अणुः=यह सूक्ष्म; च=भी है।
व्याख्या—यह प्राणतत्त्व अपनी पाँच वृत्तियोंके द्वारा स्थूलरूपमें उपलब्ध
होता है; इसके सिवा, यह अणु अर्थात् सूक्ष्म भी है। यहाँ अणु कहनेसे यह
भाव नहीं समझना चाहिये कि यह छोटे आकारवाला है; इसकी सूक्ष्मताको
लक्षित करानेके लिये इसे अणु कहा गया है। सूक्ष्म होनेके साथ ही यह
परिच्छिन्न तत्त्व है। सूक्ष्मताके कारण व्यापक होनेपर भी सीमित है। ये सब
बातें भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आ गयी हैं।
सम्बन्ध—छान्दोग्य-श्रुतिमें जहाँ तेज प्रभृति तीन तत्त्वोंसे जगत्की उत्पत्तिका
वर्णन किया गया है, वहाँ उन तीनोंका अधिष्ठाता देवता किसको बताया
गया है? यह निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ २ । ४ । १४ ॥
ज्योतिराद्यधिष्ठानम् = ज्योति आदि तत्त्व जिसके अधिष्ठान बताये गये
हैं, वह; तु=तो ब्रह्म ही है; तदामननात् = क्योंकि दूसरी जगह भी श्रुतिके द्वारा
उसीको अधिष्ठाता बताया गया है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि उस जगत्कर्ता परमदेवने विचार
किया कि 'मैं बहुत होऊँ, तब उसने तेजकी रचना की, फिर तेजने विचार
किया।' इत्यादि (छा० उ० ६।२।३-४) इस वर्णनमें जो तेज आदि
तत्त्वमें विचार करनेवाला उनका अधिष्ठाता बताया गया है, वह परमात्मा
ही है; क्योंकि तैत्तिरीयोपनिषद्में कहा है कि 'इस जगत्की रचना करके
उसने उसमें जीवात्माके साथ-साथ प्रवेश किया।' (तै० उ० २।६)
इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमेश्वरने ही उन तत्त्वोंमें अधिष्ठातारूपसे
प्रविष्ट होकर विचार किया, स्वतन्त्र जड तत्त्वोंने नहीं।
सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि वह परब्रह्म परमेश्वर

सूत्र १५] अध्याय २ २५७

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सूत्र १५] अध्याय २ २५७
ही उन आकाशादि तत्त्वोंका अधिष्ठाता है, तब तो प्रत्येक शरीरका अधिष्ठाता
भी वही होगा। जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता मानना भी उचित नहीं होगा,
इसपर कहते हैं—
प्राणवता शब्दात्॥ २।४।१५॥
प्राणवता=(ब्रह्मने) प्राणधारी जीवात्माके सहित (प्रवेश किया);
शब्दात्=ऐसा श्रुतिका कथन होनेसे यह दोष नहीं है।
व्याख्या—श्रुतिमें यह भी वर्णन आया है कि इन तीनों तत्त्वोंको उत्पन्न
करनेके बाद उस परमदेवने विचार किया, 'अब मैं इस जीवात्माके सहित
इन तीनों देवताओंमें प्रविष्ट होकर नाना नाम-रूपोंको प्रकट करूँ।'१
(छा० उ० ६।३।२) इस कथनसे यह सिद्ध होता है कि जीवात्माके सहित
परमात्माने उन तत्त्वोंमें प्रविष्ट होकर जगत्का विस्तार किया। इसी प्रकार
ऐतरेयोपनिषद्के पहले अध्यायमें जगत्की उत्पत्तिका वर्णन करते हुए तीसरे
खण्डमें यह बताया गया है कि जीवात्माको सहयोग देनेके लिये जगत्कर्ता
परमेश्वरने सजीव शरीरमें प्रवेश किया। तथा मुण्डक और श्वेताश्वतरमें
ईश्वर और जीवको दो पक्षियोंकी भाँति एक ही शरीररूप वृक्षपर स्थित
बताया गया है।२ इसी प्रकार कठोपनिषद्में भी परमात्मा और जीवात्माको हृदयरूप
गुहामें स्थित कहा गया है।३ इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और परमेश्वर—इन
दोनोंका प्रत्येक शरीरमें साथ-साथ रहना सिद्ध होता है। इसलिये जीवात्माको
शरीरका अधिष्ठाता माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—श्रुतिमें तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले या पीछे भी जीवात्माकी
उत्पत्तिका वर्णन नहीं आया, फिर उस परमेश्वरने सहसा यह विचार कैसे
कर लिया कि 'इस जीवात्माके सहित मैं इन तत्त्वोंमें प्रवेश करूँ?' ऐसी
जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
१-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आ गया है।
२-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आ गया है।
३-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आ गया है।

२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

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२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
तस्य च नित्यत्वात् ॥ २ । ४ । १६ ॥
तस्य = उस जीवात्माकी; नित्यत्वात् = नित्यता प्रसिद्ध होनेके कारण;
च = भी (उसकी उत्पत्तिका वर्णन करना उचित ही है) ।
व्याख्या—जीवात्माको नित्य माना गया है। सृष्टिके समय शरीरकी
उत्पत्तिके साथ-साथ गौणरूपसे ही उसकी उत्पत्ति बतायी गयी है
(सू० २।३।१६), वास्तवमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है।
(सू० २।३।१७) इसलिये पंचभूतोंकी उत्पत्तिके पहले या बाद उसकी
उत्पत्ति न बतलाकर जो जीवात्माके सहित परमेश्वरका शरीरमें प्रविष्ट होना
कहा गया है, वह उचित ही है। उसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—श्रुतिमें प्राणके नामसे इन्द्रियोंका वर्णन आया है, इससे यह
जान पड़ता है कि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणके ही कार्य हैं, उसीकी वृत्तियाँ हैं, भिन्न
तत्त्व नहीं है। अथवा यह अनुमान होता है कि चक्षु आदिकी भाँति मुख्य प्राण
भी एक इन्द्रिय है, उन्हींकी जातिका पदार्थ है। ऐसी दशामें वास्तविक बात
क्या है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ २ । ४ । १७ ॥
ते = वे मन आदि ग्यारह; इन्द्रियाणि = इन्द्रिय; श्रेष्ठात् = मुख्य प्राणसे
भिन्न हैं; अन्यत्र तद्व्यपदेशात् = क्योंकि दूसरी श्रुतियोंसे उसका भिन्नतासे
वर्णन है।
व्याख्या—दूसरी श्रुतियोंमें मुख्य प्राणकी गणना इन्द्रियोंसे अलग की
गयी है तथा इन्द्रियोंको प्राणोंके नामसे नहीं कहा गया है। (मु० उ० २।१।३)*
इसलिये पूर्वोक्त चक्षु आदि दसों इन्द्रियाँ और मन मुख्य प्राणसे सर्वथा
भिन्न पदार्थ हैं। न तो वे मुख्य प्राणके कार्य हैं, न मुख्य प्राण उनकी
भाँति इन्द्रियोंकी गणनामें हैं। इन सबकी शरीरमें स्थिति मुख्य प्राणके अधीन
है, इसलिये गौणरूपसे श्रुतिमें इन्द्रियोंको प्राणके नामसे कहा गया है।

  • देखें सूत्र २।३।१५ की टिप्पणी।

सूत्र १८-१९ ] अध्याय २ २५९

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सूत्र १८-१९ ] अध्याय २ २५९
सम्बन्ध- इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता सिद्ध करनेके लिये दूसरा
हेतु प्रस्तुत करते हैं-
भेदश्रुतेः ॥ २ । ४ । १८ ॥
भेदश्रुतेः = इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणका भेद सुना गया है, इसलिये (भी
मुख्य प्राण उनसे भिन्न तत्त्व सिद्ध होता है)।
व्याख्या- श्रुतिमें जहाँ इन्द्रियोंका प्राणके नामसे वर्णन आया है, वहाँ
भी उनका मुख्य प्राणसे भेद कर दिया गया है (मु० उ० २।१।३ तथा
बृह० उ० १।३।३) तथा प्रश्नोपनिषद्में भी मुख्य प्राणकी श्रेष्ठताका
प्रतिपादन करनेके लिये अन्य सब तत्त्वोंसे और इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणको
अलग बताया है (प्र० उ० २।२, ३)। इस प्रकार श्रुतियोंमें मुख्य प्राणका
इन्द्रियोंसे भेद बताया जानेके कारण भी यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राण
इन सबसे भिन्न है।
सम्बन्ध - इसके सिवा-
वैलक्षण्याच्च ॥ २ । ४ । १९ ॥
वैलक्षण्यात् = परस्पर विलक्षणता होनेके कारण; च = भी (यही सिद्ध
होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न पदार्थ हैं)।
व्याख्या-सब इन्द्रियाँ और अन्तःकरण सुषुप्तिके समय विलीन हो
जाते हैं, उस समय भी मुख्य प्राण जागता रहता है, उसपर निद्राका कोई
प्रभाव नहीं पड़ता। यही इन सबकी अपेक्षा मुख्य प्राणकी विलक्षणता है;
इस कारण भी यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न हैं।
न तो इन्द्रियाँ प्राणका कार्य या वृत्तियाँ हैं और न मुख्य प्राण ही इन्द्रिय
है, इन्द्रियोंको गौणरूपसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है।
सम्बन्ध - तेज आदि तत्त्वोंकी रचना करके परमात्माने जीवसहित
उनमें प्रवेश करनेके पश्चात् नाम-रूपात्मक जगत्‌का विस्तार किया-यह

२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

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२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
श्रुतिमें वर्णन आया है। इस प्रसंगमें यह संदेह होता है कि नाम-रूपादिको
रचना करनेवाला कोई जीवविशेष है या परमात्मा ही। अतः इसका निर्णय
करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं—
संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २ । ४ । २० ॥
संज्ञामूर्तिक्लृप्तिः = नाम-रूपकी रचना; तु = भी; त्रिवृत्कुर्वतः = तीनों तत्त्वोंका
मिश्रण करनेवाले परमेश्वरका (ही कर्म है); उपदेशात् = क्योंकि वहाँ श्रुतिके
वर्णनसे यही बात सिद्ध होती है।
व्याख्या—इस समस्त नाम-रूपात्मक जगत्की रचना करना जीवात्माका
काम नहीं है। वहाँ जो जीवात्माके सहित परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात
कही गयी है, उसका अभिप्राय जीवात्माके कर्तापनमें परमात्माके कर्तृत्वकी
प्रधानता बताना है। उसे सृष्टिकर्ता बताना नहीं; क्योंकि जीवात्माके कर्म-
संस्कारोंके अनुसार उसको कर्म करनेकी शक्ति आदि और प्रेरणा देनेवाला
वही है। अतएव वहाँके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि नाम-रूपसे व्यक्त की
जानेवाली इस जड-चेतनात्मक जगत्की रचनारूप क्रिया उस परब्रह्म परमेश्वरकी
ही है जिसने उन तत्त्वोंको उत्पन्न करके उनका मिश्रण किया है; अन्य
किसीकी नहीं।
सम्बन्ध—उस परमात्माने तीनोंका मिश्रण करके उनसे यदि जगत्की
उत्पत्ति की तो किस तत्त्वसे कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ? इसका विभाग किस
प्रकार उपलब्ध होगा, इसपर कहते हैं—
मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ २ । ४ । २१ ॥
(जिस प्रकार) मांसादि = मांस आदि; भौमम् = पृथिवीके कार्य बताये
गये हैं, (वैसे ही); यथाशब्दम् = वहाँ श्रुतिके शब्दद्वारा बताये अनुसार;
इतरयोः = दूसरे दोनों तत्त्वोंका कार्य; च = भी समझ लेना चाहिये।
व्याख्या—भूमि यानी पृथिवीके कार्यको भौम कहते हैं। उस प्रकरणमें
जिस प्रकार भूमिरूप अन्नके कार्य मांस, विष्ठा और मन—ये तीनों बताये
गये हैं, उसी प्रकार उस प्रकरणके शब्दोंमें जिस-जिस तत्त्वके जो-जो कार्य

सूत्र २२ ] अध्याय २ २६१

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सूत्र २२ ] अध्याय २ २६१
बताये गये हैं, उसके वे ही कार्य हैं ऐसा समझ लेना चाहिये। वहाँ श्रुतिने
जलका कार्य मूत्र, रक्त और प्राणको तथा तेजका कार्य हड्डी, मज्जा और
वाणीको बताया है। अतः इन्हें ही उनका कार्य समझना चाहिये।
सम्बन्ध - जब तीनों तत्त्वोंका मिश्रण करके सबकी रचना की गयी,
तब खाये हुए किसी एक तत्त्वसे अमुक वस्तु हुई - इत्यादि रूपसे वर्णन
करना कैसे संगत हो सकता है? इसपर कहते हैं-
वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ २।४।२२ ॥
तद्वादः = वह कथन; तद्वादः = वह कथन; तु = तो; वैशेष्यात् = अधिकताके
नातेसे है।
व्याख्या - तीनोंके मिश्रणमें भी एककी अधिकता और दूसरोंकी
न्यूनता रहती है, अतः जिसकी अधिकता रहती है उस अधिकताको
लेकर व्यवहारमें मिश्रित तत्त्वोंका अलग-अलग नामसे कथन किया
जाता है; इसलिये कोई विरोध नहीं है। यहाँ 'तद्वादः' पदका दो बार
प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।
इस प्रकरणमें जो मनको अन्नका कार्य और अन्नमय कहा गया
है, प्राणोंको जलका कार्य और जलमय कहा गया है तथा वाणीको
तेजका कार्य और तेजोमयी कहा गया है, वह भी उन-उन तत्त्वोंके
सम्बन्धसे उनका उपकार होता हुआ देखा जानेके कारण गौणरूपसे
ही कहा हुआ मानना चाहिये। वास्तवमें मन, प्राण और वाणी आदि
इन्द्रियाँ भूतोंका कार्य नहीं हैं; भूतोंसे भिन्न पदार्थ हैं, यह बात पहले
सिद्ध की जा चुकी है (ब्र० सू० २।४।२)।
चौथा पाद सम्पूर्ण
श्रीवेदव्यास रचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का दूसरा अध्याय पूरा हुआ।

तीसरा अध्याय

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॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
तीसरा अध्याय
पहला पाद
पूर्व दो अध्यायोंमें ब्रह्म और जीवात्माके स्वरूपका प्रतिपादन किया
गया, अब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय बतानेके लिये तीसरा
अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इस अध्यायको साधनाध्याय अथवा
उपासनाध्याय कहते हैं। परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंमें सबसे पहले वैराग्यकी
आवश्यकता है। संसारके अनित्य भोगोंमें वैराग्य होनेसे ही मनुष्यमें परमात्माको
प्राप्त करनेकी शुभेच्छा प्रकट होती है और वह उसके लिये प्रयत्नशील होता
है। अतः वैराग्योत्पादनके लिये बार-बार जन्म-मृत्यु और गर्भादिके दुःखोंका
प्रदर्शन करानेके लिये पहला पाद आरम्भ किया जाता है।
प्रलयके बाद सृष्टि-कालमें उस परब्रह्म परमेश्वरसे जिस प्रकार इस
जगत्की उत्पत्ति होती है, उसका वर्णन तो पहले दो अध्यायोंमें किया गया।
उसके बाद वर्तमान जगत्में जो जीवात्माके शरीरोंका परिवर्तन होता रहता है,
उसके विषयमें श्रुतियोंने जैसा वर्णन किया है, उसपर इस तीसरे अध्यायके
प्रथम पादमें विचार किया जाता है। विचारका विषय यह है कि जब यह जीवात्मा
पहले शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है, तब अकेला ही जाता है या
और भी कोई इसके साथ जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं—
तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्न-
निरूपणाभ्याम् ॥ ३ । १ । १ ॥
तदन्तरप्रतिपत्तौ = उक्त देहके बाद देहान्तरकी प्राप्तिके समय (यह
जीवात्मा); सम्परिष्वक्तः = शरीरके बीजरूप सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ;
रंहति = जाता है (यह बात); प्रश्ननिरूपणाभ्याम् = प्रश्न और उसके
उत्तरसे सिद्ध होती है।

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सूत्र १ ] अध्याय ३ २६३

व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस
स्थलका वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परंतु
जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के
प्रकरणपर विचार किया जाता है। वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे
प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पांचालोंकी सभामें गया। वहाँ
प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके
हो?' उसने कहा—'हाँ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा
कहाँ जाता है? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है? देवयान और
पितृयानमार्गका क्या अन्तर है? यहाँसे गये हुए लोगोंसे वहाँका लोक भर
क्यों नहीं जाता?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें
यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं?' तब
प्रत्येक बातके उत्तरमें श्वेतकेतुने यही कहा—'मैं नहीं जानता।' यह
सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोंको
नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मैं शिक्षा पा चुका?' श्वेतकेतु लज्जित
होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण
क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं; किंतु उनमेंसे एकका भी उत्तर मैं न दे
सका। आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मैं तुमको शिक्षा दे चुका हूँ।'
पिताने कहा—'मैं स्वयं इन पाँचोंमेंसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको
कैसे बताता।' उसके बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया
और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो
पाँच बातें पूछी थी, उन्हें ही मुझे बतलाइये।' तब उस राजाने बहुत
दिनोंतक उन दोनोंको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह
विद्या क्षत्रियोंके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको
मिल रही है।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका
उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमें यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल
पाँचवीं आहुतिमें पुरुषरूप कैसे हो जाता है?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमें

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२६४ वेदान्त-दर्शन [पाद १
श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है। दूसरी आहुति
है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी
गयी है। तीसरी आहुति है पृथिवीरूप अग्निमें वर्षाको हवन करना; उससे
अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है। चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमें अन्नका
हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है
स्त्रीरूप अग्निमें वीर्यका हवन करना; उससे गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है
कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमें 'पुरुष' संज्ञक होता है। इस प्रकार
जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु होती है, तबतक यहाँ जीवित
रहता है—इत्यादि (छा० उ० ५।३।१ से ५।९।२ तक)।
इस प्रकरणमें जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोंके समुदाय सूक्ष्म
शरीरसहित वीर्यमें स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक
विवेचनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमें
जाता है, तब बीजरूपमें स्थित समस्त तत्त्वोंसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है।
सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुष हो जाना कहा है,
फिर इसमें सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको
यही बताना अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया?'' इस
जिज्ञासापर कहते हैं—
त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३।१।२॥
त्र्यात्मकत्वात्=(शरीर) तीनों तत्त्वोंका सम्मिश्रण है, इसलिये (जलके
कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमें सबसे अधिक
जलका भाग रहता है, इसलिये (जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है)।
व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमें कहा जा चुका है कि तीनों
तत्त्वोंका सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपको प्रकट किया
(छा० उ० ६।३।३)। वहाँ तीन तत्त्वोंका वर्णन भी उपलब्ध है, उसमें सभी
तत्त्वोंका मिश्रण समझ लेना चाहिये। स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया
जाता है, उसमें सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं तथापि जलकी अधिकता होनेसे

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सूत्र ३ ] अध्याय ३ २६५
वहाँ उसीके नामसे उसका वर्णन किया गया है। वास्तवमें वह कथन शरीरके
बीजभूत सभी तत्त्वोंको लक्ष्य करानेवाला है। एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाते
समय जीव प्राणमें स्थित होकर जाते हैं और प्राणको आपोमय (जलरूप)
कहा गया है, अतः उस दृष्टिसे भी वहाँ जलको ही पुरुषरूप बताना सर्वथा
सुसंगत है। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि जीवात्मा सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ
ही एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातकी पुष्टि करते हैं—
प्राणगतेश्च ॥ ३ । १ । ३ ॥
प्राणगतेः = जीवात्माके साथ प्राणोंके गमनका वर्णन होनेसे; च = भी
(यही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके
विषयमें कुछ प्रश्न किये हैं। उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि ‘यह एक
शरीरको छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस
प्रकार निकलता है?’ (प्र० उ० ३। १) उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा
है कि ‘जब इस शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा
हो जाता है, उस समय जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर
उदानवायुके सहित दूसरे शरीरमें चला जाता है। उस समय जीवात्माका
जैसा संकल्प होता है, उस संकल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमें
स्थित हो जाता है। वह प्राण उदानके सहित जीवात्माको उसके
संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों (योनियों)-में ले जाता है।’ (प्र० उ०
३। १० तक) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके
गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप सभी सूक्ष्म
तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।
छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ
श्रद्धाके नामसे संकल्पका ही हवन समझना चाहिये। भाव यह कि श्रद्धारूप

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२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
संकल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला
परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमें
स्थिति है, तीसरे परिणाममें पहुँचकर वह अन्नमें स्थित हुआ; चौथे
परिणाममें वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमें स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह
गर्भ होकर स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ। तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर
आया। इस प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है। प्राणका सहयोग
सभी जगह है; क्योंकि गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया
ही गया है। इस प्रकार श्रुतिके समस्त वर्णनकी संगति बैठ जाती है।
सम्बन्ध— अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण
करते हैं—
अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्॥ ३।१।४॥
चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी
बात दूसरी श्रुतिमें कही है, इसलिये (यह सिद्ध नहीं होता); इति न=तो यह
ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है।
व्याख्या—यदि कहो, “बृहदारण्यकके आर्तभाग और याज्ञवल्क्यके संवादमें
यह वर्णन आया है कि 'मरणकालमें वाणी अग्निमें विलीन हो जाती है, प्राण
वायुमें विलीन हो जाते हैं'—इत्यादि (बृह० उ० ३।२।१३) इससे यह
कहना सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा दूसरे तत्त्वोंके सहित जाता है, क्योंकि वे
सब तो अपने-अपने कारणमें यहीं विलीन हो जाते हैं।” तो ऐसी बात नहीं
है, क्योंकि यह बात आर्तभागने प्रश्नमें तो कही है, पर याज्ञवल्क्यने उत्तरमें
इसे स्वीकार नहीं किया, बल्कि सभासे अलग ले जाकर उसे गुप्तरूपसे वही
पाँच आहुतियोंवाली बात समझायी—यह अनुमान होता है; क्योंकि उसके
बाद श्रुति कहती है कि 'उन्होंने जो कुछ वर्णन किया, निस्संदेह वह कर्मका
ही वर्णन था। मनुष्य पुण्यकर्मोंसे पुण्यशील होता है और पापकर्मसे पापी
होता है।' छान्दोग्यके प्रकरणमें भी बादमें यही बात कही गयी है, इसलिये
वर्णनमें कोई भेद नहीं। वह श्रुति प्रश्नविषयक होनेसे गौण है, उत्तरकी बात

सूत्र ५-६ ] अध्याय ३ २६७

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सूत्र ५-६ ] अध्याय ३ २६७
ही ठीक है। उत्तर इसलिये गुप्त रखा गया कि सभाके बीचमें गर्भाधानका
वर्णन करना कुछ संकोचकी बात है; सभामें तो स्त्री-बालक सभी सुनते हैं।
सम्बन्ध - पुनः विरोध उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं—
प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ ३ । १ । ५ ॥
चेत्=यदि कहा जाय कि; प्रथमे=प्रथम आहुतिके वर्णनमें; अश्रवणात्=
(जलका नाम) नहीं सुना गया है, इसलिये (अन्तमें यह कहना कि पाँचवीं
आहुतिमें जल पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध है); इति न=तो ऐसी
बात नहीं है; हि=क्योंकि; उपपत्तेः=पूर्वापरकी संगतिसे (यही सिद्ध होता
है कि); ताः एव=(वहाँ) श्रद्धाके नामसे उस जलका ही कथन है।
व्याख्या-यदि कहो कि पहले-पहल श्रद्धाको हवनीय द्रव्यका रूप
दिया गया है, अतः उसीके परिणाम सब हैं, इस स्थितिमें यह कहना कि
पाँचवीं आहुतिमें जल ही पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध प्रतीत होता है।
तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ श्रद्धाके नामसे संकल्पमें स्थित जल आदि
समस्त सूक्ष्मतत्त्वोंका ग्रहण है और अन्तमें भी उसीको जल नामसे कहा
गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। भाव यह कि जीवात्माकी गति उसके
अन्तिम संकल्पानुसार होती है और वह प्राणके द्वारा ही होती है तथा श्रुतिमें
प्राणको जलमय बताया है अतः संकल्पके अनुसार जो सूक्ष्म तत्त्वोंका
समुदाय प्राणमें स्थित होता है, उसीको वहाँ श्रद्धाके नामसे कहा गया है। वह
कथन गतिमें संकल्पकी प्रधानता दिखानेके लिये है। इस प्रकार पहले-पहल
जो बात श्रद्धाके नामसे कही गयी है, उसीका अन्तिम वाक्यमें जलके नामसे
वर्णन किया है; अतः पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध - पहलेकी भाँति दूसरे विरोधकी उत्थापना करके उसका
निराकरण करते हैं—
अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३ । १ । ६ ॥
चेत्=यदि ऐसा कहा जाय कि; अश्रुतत्वात् = श्रुतिमें तत्त्वोंके साथ

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२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

जीवात्माके गमनका वर्णन नहीं है, इसलिये (उनके सहित जीवात्मा जाता
है, यह कहना युक्तिसंगत नहीं है); इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है;
इष्टादिकारिणाम्=(क्योंकि) उसी प्रसंगमें अच्छे-बुरे कर्म करनेवालोंका
वर्णन है; प्रतीते:=अतः इस श्रुतिमें उन शुभाशुभकारी जीवात्माओंके
वर्णनकी प्रतीति स्पष्ट है, इसलिये (उक्त विरोध यहाँ नहीं है)।
व्याख्या—यदि कहो कि उस प्रकरणमें जीवात्मा उन तत्त्वोंको लेकर
जाता है, ऐसी बात नहीं कही गयी है, केवल जलके नामसे तत्त्वोंका ही
पुरुषरूपमें हो जाना बताया गया है, इसलिये यह कहना विरुद्ध है कि तत्त्वोंसे
युक्त जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है तो यह कहना ठीक नहीं है;
क्योंकि उसी प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'जो अच्छे आचरणोंवाले
होते हैं वे उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं और जो नीच कर्म करनेवाले होते हैं,
वे नीच योनिको प्राप्त होते हैं।'* (छा० उ० ५।१०।७) इस वर्णनसे
अच्छे-बुरे कर्म करनेवाले जीवात्माका उन तत्त्वोंके साथ एक शरीरसे दूसरे
शरीरको प्राप्त होना सिद्ध होता है, इसलिये कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—इसी प्रकरणमें जहाँ सकामभावसे शुभ कर्म करनेवालोंके
लिये धूममार्गसे स्वर्गमें जानेकी बात कही गयी है, वहाँ ऐसा वर्णन आता है
कि 'वह स्वर्गमें जानेवाला पुरुष देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका
भक्षण करते हैं' (बृह० उ० ६।२।१६)। अतः यह कहना कैसे संगत होगा
कि पुण्यात्मालोग अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं। जब वे
स्वयं ही देवताओंके भोग बन जाते हैं तब उनके द्वारा स्वर्गका भोग भोगना
कैसे सिद्ध होगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३।१।७॥
अनात्मवित्त्वात्=वे लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, इस कारण (आत्मज्ञानीकी
* तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा
क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्।

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९

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सूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९
अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये), वा=ही; भाक्तम्=उनको देवताओंका
अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि=क्योंकि; तथा=उस प्रकारसे (उनका
हीनत्व और स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके भोगोंको भोगना) भी; दर्शयति=श्रुति
दिखलाती है।
व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं
हैं, अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओंका
अन्न और देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमें तो
श्रुति यह कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको
देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।' (छा० उ० ३।६।१)१ अतः इस कथनका यह
भाव है कि राजाके नौकरोंकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते
हैं। इस भावके वचन श्रुतिमें दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको
न जानकर दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह—जैसे यहाँ लोगोंके
घरोंमें पशु होते हैं, वैसे ही—देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १।
४।१०)२ आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है।
इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग
करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय
पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको
होता है ३।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है—
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥
'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः
मृत्युलोकमें लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे
१-'न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥'
२-'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते······यथा पशुरेवँस देवानाम्।'
३-अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः·········स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये
कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्ते। (बृह० उ० ४।३।३३)

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२७० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
भोगकामी मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं।' (गीता ९।२१) इसलिये
यह सिद्ध हुआ कि उनको देवताओंका अन्न कहना वहाँ गौणरूपसे है,
वास्तवमें वहाँ जाकर वे अपने कर्मोंका ही फल भोगते हैं और फिर वहाँसे
वापस लौट आते हैं। अतः जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें सूक्ष्म
तत्त्वोंके सहित जाना सर्वथा सुसंगत है, इसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—"उक्त प्रकरणमें कहा गया है कि 'जबतक उसके कर्मोंका
क्षय नहीं हो जाता, तबतक वह वहीं रहता है, फिर वहाँसे इस लोकमें लौट
आता है' अतः प्रश्न होता है कि उसके सभी पुण्यकर्म पूर्णतया समाप्त हो
जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहता है, जिसे साथ लेकर वह लौटता है।" इसका
निर्णय करनेके लिये कहते हैं—
कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च ॥ ३ । १ । ८ ॥
कृतात्यये=किये हुए पुण्य कर्मोंका क्षय होनेपर, अनुशयवान्=शेष
कर्मसंस्कारोंसे युक्त (जीवात्मा); यथेतम्=जैसे गया था उसी मार्गसे; च=
अथवा; अनेवम्=इससे भिन्न किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है;
दृष्टस्मृतिभ्याम्=श्रुति और स्मृतियोंसे (यही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या—उस जीवके द्वारा किये हुए कर्मोंमेंसे जिनका फल भोगनेके
लिये उसे स्वर्गलोकमें भेजा गया है, उन पुण्यकर्मोंका पूर्णतया क्षय हो
जानेपर वह स्वर्गस्थ जीवात्मा अनुशयसे अर्थात् शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त
होकर जिस मार्गसे गया था, उसीसे अथवा किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता
है। इस प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है—'तद् य इह रमणीयचरणा
अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्......अथ य इह कपूयचरणा
अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्।' अर्थात् 'अच्छे आचरणोंवाले
अच्छी योनिको प्राप्त होते हैं और बुरे आचरणोंवाले बुरी योनियोंको प्राप्त
होते हैं।' (छा० उ० ५।१०।७) इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है तथा स्मृतिमें
जो यह कहा गया है कि 'जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मोंमें स्थित रहनेवाले

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सूत्र ९-१० ] अध्याय ३ २७१
हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए
कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं।' (गौतमस्मृति
११।१) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण
करते हैं—
चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ३ । १ । ९ ॥
चेत् = यदि ऐसा कहो कि; चरणात् = चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये
(यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर आता है);
इति न = तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था = क्योंकि वह कथन अनुशय (शेष
कर्म-संस्कारों)-का उपलक्षण करनेके लिये है; इति = यह बात; कार्ष्णाजिनिः =
'कार्ष्णाजिनि' नामक आचार्य कहते हैं (इसलिये कोई विरोध नहीं है)।
व्याख्या—उपर्युक्त शंकाका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य
कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्वपक्षीद्वारा
यह कहा जाय कि “यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमें तो चरण शब्दका प्रयोग
है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा
स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता
है'' तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका
उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये ही है कि जीवात्मा
भुक्तशेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शंका उपस्थित करके उसका निराकरण
करते हैं—
आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥
चेत् = यदि कहो; आनर्थक्यम् = (बिना किसी कारणके उपलक्षणके
रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना) निरर्थक है; इति न = तो यह ठीक
नहीं; तदपेक्षत्वात् = क्योंकि कर्माशयमें आचरण आवश्यक है।

२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

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२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
व्याख्या—यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'चरण' शब्दको बिना किसी
कारणके कर्मसंस्कारका उपलक्षण मानना निरर्थक है, इसलिये उपर्युक्त
उत्तर ठीक नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है, उपर्युक्त उत्तर सर्वथा उचित
है, क्योंकि कर्मसंस्काररूप अनुशय पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणोंसे ही बनता
है, अतः कर्माशयके लिये आचरण अपेक्षित है, इसलिये, 'चरण' शब्दका
प्रयोग निरर्थक नहीं है।
सम्बन्ध—अब पूर्वोक्त शंकाके उत्तरमें महर्षि बादरिका मत प्रस्तुत
करते हैं—
सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३ । १ । ११ ॥
बादरिः तु=बादरि आचार्य तो, इति=ऐसा (मानते हैं कि); सुकृत-
दुष्कृते=इस प्रकरणमें 'चरण' नामसे शुभाशुभ कर्म; एव=ही कहे गये हैं।
व्याख्या—आचार्य श्रीबादरिका कहना है कि यहाँ उपलक्षण माननेकी
कोई आवश्यकता नहीं है; यहाँ 'रमणीयचरण' शब्द पुण्यकर्मोंका और
'कपूयचरण' शब्द पापकर्मका ही वाचक है। अतः यह समझना चाहिये
कि जो रमणीयचरण हैं, वे शुभ कर्माशयवाले हैं और जो कपूयचरण हैं
वे पाप कर्माशयवाले हैं। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा बचे
हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए ही लौटता है।
सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षी पुनः शंका उपस्थित करता है—
अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ ३ । १ । १२ ॥
च=किंतु; अनिष्टादिकारिणाम्=अशुभ आदि कर्म करनेवालोंका;
अपि=भी (चन्द्रलोकमें जाना); श्रुतम्=वेदमें सुना गया है।
व्याख्या—कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्में कहा है कि 'ये वैके
चास्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति।' ( १।२) अर्थात्
'जो कोई भी इस लोकसे जाते हैं, वे सब चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं।'
इस प्रकार यहाँ कोई विशेषण न देकर सभीका चन्द्रलोकमें जाना कहा

सूत्र १३ ] अध्याय ३ २७३

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सूत्र १३ ] अध्याय ३ २७३
गया है। इससे तो बुरे कर्म करनेवालोंका भी स्वर्गलोकमें जाना सिद्ध होता
है, अतः श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि इष्टापूर्त और दानादि शुभ कर्म
करनेवाले धूममार्गसे चन्द्रलोकको जाते हैं, उसके साथ उपर्युक्त श्रुतिका
विरोध प्रतीत होता है; उसका निराकरण कैसे होगा ?
सम्बन्ध — पूर्वसूत्रमें उपस्थित की हुई शंकाका उत्तर देते हैं—
संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गति-
दर्शनात् ॥ ३ । १ । १३ ॥
तु=किंतु; इतरेषाम्=दूसरोंका अर्थात् पापकर्म करनेवालोंका; संयमने=
यमलोकमें; अनुभूय=पापकर्मोंका फल भोगनेके बाद; आरोहावरोहौ=चढ़ना-
उतरना होता है; तद्गतिदर्शनात्=क्योंकि उनकी गति श्रुतिमें इसी
प्रकार देखी जाती है।
व्याख्या — वहाँ पापीलोगोंका चन्द्रलोकमें जाना नहीं कहा गया है;
क्योंकि पुण्यकर्मोंका फल भोगनेके लिये ही स्वर्गलोकमें जाना होता है;
चन्द्रलोकमें बुरे कर्मोंका फल भोगनेकी व्यवस्था नहीं है; इसलिये यही
समझना चाहिये कि अच्छे कर्म करनेवाले ही चन्द्रलोकमें जाते हैं। उनसे भिन्न
जो पापीलोग हैं, वे अपने पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये यमलोकमें जाते
हैं; वहाँ पापकर्मोंका फल भोग लेनेके बाद उनका पुनः कर्मानुसार गमनागमन
यानी नरकसे मृत्युलोकमें आना और पुनः नये कर्मानुसार स्वर्गमें जाना या
नरक आदि अधोगतिको पाना होता रहता है। उन लोगोंकी गतिका ऐसा ही
वर्णन श्रुतिमें देखा जाता है। कठोपनिषद्में यमराजने स्वयं कहा है कि—
न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥
'सम्पत्तिके अभिमानसे मोहित हुए, निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको
परलोक नहीं दीखता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही
सत्य है, दूसरा कोई लोक नहीं, इस प्रकार माननेवाला मनुष्य बार-बार मेरे
वशमें पड़ता है।' (कठ० १।२।६) इससे यही सिद्ध होता है कि शुभ कर्म

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२७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
करनेवाला ही पितृयानमार्गसे या अन्य मार्गसे स्वर्गलोकमें जाता है,
पापीलोग यमलोकमें जाते हैं। कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्में जिनके चन्द्रलोकमें
जानेकी बात कही गयी है, वे सब पुण्यकर्म करनेवाले ही हैं; क्योंकि
उसी श्रुतिमें चन्द्रलोकसे लौटनेवालोंकी कर्मानुसार गति बतायी गयी
है। इसलिये दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये स्मृतिका प्रमाण देते हैं—
स्मरन्ति च॥ ३ । १ । १४॥
च=तथा; स्मरन्ति=स्मृतिमें भी इसी बातका समर्थन किया गया है।
व्याख्या—गीतामें सोलहवें अध्यायके ७ वें श्लोकसे १५ वें श्लोकतक
आसुरी प्रकृतिवाले पापी पुरुषोंके लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके
अन्तमें कहा है कि ‘वे अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्त हुए, मोहजालमें
फँसे हुए और भोगोंके उपभोगमें रचे-पचे हुए मूढ़लोग कुम्भीपाक आदि
अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं (गीता १६। १६)। इस प्रकार स्मृतिके वर्णनसे
भी उसी बातका समर्थन होता है। अतः पापकर्मियोंका नरकमें गमन होता
है; यही मानना ठीक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको कहते हैं—
अपि च सप्त ॥ ३ । १ । १५ ॥
अपि च=इसके सिवा; सप्त=पापकर्मका फल भोगनेके लिये
प्रधानतः सात नरकोंका भी वर्णन आया है।
व्याख्या—इसके सिवा, पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये पुराणोंमें
प्रधानतासे रौरव आदि सात नरकोंका भी वर्णन किया गया है, इससे
उन पापकर्मियोंके स्वर्गगमनकी तो सम्भावना ही नहीं की जा सकती।
सम्बन्ध—नरकोंमें तो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी बताये गये हैं,
फिर यह कैसे कहा कि पापीलोग यमराजके अधिकारमें दण्ड भोगते हैं?
इसपर कहते हैं—

सूत्र १६-१७ ] अध्याय ३ २७५

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सूत्र १६-१७ ] अध्याय ३ २७५
तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३।१।१६॥
च=तथा; तत्र=उन यातनाके स्थानोंमें; अपि=भी; तद्व्यापारात्=उस
यमराजके ही आज्ञानुसार कार्य होनेसे; अविरोधः=किसी प्रकारका
विरोध नहीं है।
व्याख्या—यातना भोगनेके लिये जो रौरव आदि सात नरक बताये
गये हैं और वहाँ जो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी हैं, वे ही यमराजके
आज्ञानुसार कार्य करते हैं, इसलिये उनका किया हुआ कार्य भी यमराजका
ही कार्य है। अतः यमराजके अधिकारमें पापियोंके दण्ड भोगनेकी जो
बात कही गयी है, उसमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—ऐसा मान लेनेपर भी पूर्वोक्त श्रुतिमें जो सबके चन्द्रलोकमें
जानेकी बात कही गयी, उसकी संगति (कौ० १।२) कैसे होगी? इसपर
कहते हैं—
विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३।१।१७॥
विद्याकर्मणोः=ज्ञान और शुभ कर्म—इन दोनोंका; तु=ही; प्रकृतत्वात्=
प्रकरण होनेके कारण; इति=ऐसा कथन उचित ही है।
व्याख्या—जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (५।१०।१)-में विद्या
और शुभ कर्मोंका फल बतानेका प्रसंग आरम्भ करके देवयान और
पितृयान-मार्गकी बात कही गयी है, उसी प्रकार वहाँ कौषीतकि-
ब्राह्मणोपनिषद्में भी ज्ञान और शुभ कर्मोंका फल बतानेके प्रकरणमें ही
उक्त कथन है। इसलिये यह समझना चाहिये कि जो शुभ कर्म करनेवाले
अधिकारी मनुष्य इस लोकसे जाते हैं, वे ही सब-के-सब चन्द्रलोकको
जाते हैं, अनिष्ट कर्म करनेवाले नहीं; क्योंकि उनका प्रकरण नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'कठोपनिषद्में जो पापियोंके
लिये यमलोकमें जानेकी बात कही गयी है, वह छान्दोग्य-श्रुतिमें बतायी हुई
तीसरी गतिके अन्तर्गत है या उससे भिन्न?' इसके उत्तरमें कहते हैं—