वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
चौथा अध्याय
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
चौथा अध्याय
पहला पाद
तीसरे अध्यायमें परमात्माकी प्राप्तिके भिन्न-भिन्न साधनोंको
बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार किया गया; अब उन उपासनाओंके
फलविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये फलाध्याय नामक चौथा
अध्याय आरम्भ किया जाता है।
यहाँपर यह जिज्ञासा होती है कि पूर्वोक्त उपासनाएँ गुरुद्वारा
अध्ययन कर लेनेमात्रसे ही अपना फल देनेमें समर्थ हैं या उनके
साधनोंका बार-बार अभ्यास करना चाहिये? इसपर कहते हैं—
आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ४।१।१॥
आवृत्तिः = अध्ययन की हुई उपासनाका आवर्तन (बार-बार
अभ्यास) करना चाहिये; असकृदुपदेशात् = क्योंकि श्रुतिमें अनेक बार
इसके लिये उपदेश किया गया है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो
मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।'—'वह परमात्मा ही दर्शन करनेयोग्य,
सुननेयोग्य, मनन करनेयोग्य और ध्यान करनेयोग्य है' (बृह० उ०
४।५।६)। 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं
ध्यायमानः॥' अर्थात् 'विशुद्ध अन्तःकरणवाला साधक उस अवयवरहित
परमेश्वरको निरन्तर ध्यान करता हुआ ज्ञानकी निर्मलतासे
देखता है' (मु० उ० ३।१।८)। 'उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते
शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥'—जो कामनारहित साधक उस परमपुरुषकी
उपासना करते हैं, वे इस रजोवीर्यमय शरीरको अतिक्रमण कर जाते हैं'
(मु० उ० ३। २।१)। इस प्रकार जगह-जगह ब्रह्मविद्यारूप उपासनाका
सूत्र २-३ ] अध्याय ४ ४११
अभ्यास करनेके लिये बार-बार उपदेश दिया गया है। इससे यह सिद्ध
होता है कि आचार्यसे भलीभाँति ब्रह्मविद्याका अध्ययन करके उसपर
बार-बार विचार करते हुए उस परमात्मामें संलग्न होना चाहिये।
सम्बन्ध — प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं—
लिंगाच्च ॥ ४।१।२॥
लिंगात् = स्मृतिके वर्णनरूप लिंग (प्रमाण)-से; च = भी (यही बात सिद्ध
होती है)।
व्याख्या — भगवद्गीतामें जगह-जगह यह बात कही है कि ‘सर्वेषु
कालेषु मामनुस्मर’—‘सब कालमें मेरा स्मरण कर’ (गीता ८।७)। ‘परमं
पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥’ ‘बार-बार चिन्तन करता हुआ साधक
परम पुरुषको प्राप्त होता है।’ (गीता ८।८) ‘जो मेरा अनन्य भक्त मुझे
नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’*
(गीता ८।१४) ‘मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।’ ‘जो मेरे
नित्ययुक्त भक्त मुझमें मन लगाकर मेरी उपासना करते हैं।’ (गीता १२।२)
इसी प्रकार दूसरी स्मृतियोंमें भी कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि
ब्रह्मविद्याका निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये।
सम्बन्ध — उस परम प्राप्य परब्रह्मका किस भावसे निरन्तर चिन्तन
करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च॥ ४।१।३॥
आत्मा = वह मेरा आत्मा है; इति = इस भावसे; तु = ही; उपगच्छन्ति = ज्ञानी-
जन उसे जानते या प्राप्त करते हैं; च = और; ग्राहयन्ति = ऐसा ही ग्रहण कराते
या समझाते हैं।
व्याख्या — ‘यह आत्मा ब्रह्म है, यह आत्मा चार पादवाला है’ इत्यादि
- अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥