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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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Page 259

२५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
धारण करता है और उसमें क्रियाशक्तिका संचार करता है। अब अगले
सूत्रमें इसके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—
अणुश्च ॥ २ । ४ । १३ ॥
अणुः=यह सूक्ष्म; च=भी है।
व्याख्या—यह प्राणतत्त्व अपनी पाँच वृत्तियोंके द्वारा स्थूलरूपमें उपलब्ध
होता है; इसके सिवा, यह अणु अर्थात् सूक्ष्म भी है। यहाँ अणु कहनेसे यह
भाव नहीं समझना चाहिये कि यह छोटे आकारवाला है; इसकी सूक्ष्मताको
लक्षित करानेके लिये इसे अणु कहा गया है। सूक्ष्म होनेके साथ ही यह
परिच्छिन्न तत्त्व है। सूक्ष्मताके कारण व्यापक होनेपर भी सीमित है। ये सब
बातें भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आ गयी हैं।
सम्बन्ध—छान्दोग्य-श्रुतिमें जहाँ तेज प्रभृति तीन तत्त्वोंसे जगत्की उत्पत्तिका
वर्णन किया गया है, वहाँ उन तीनोंका अधिष्ठाता देवता किसको बताया
गया है? यह निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ २ । ४ । १४ ॥
ज्योतिराद्यधिष्ठानम् = ज्योति आदि तत्त्व जिसके अधिष्ठान बताये गये
हैं, वह; तु=तो ब्रह्म ही है; तदामननात् = क्योंकि दूसरी जगह भी श्रुतिके द्वारा
उसीको अधिष्ठाता बताया गया है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि उस जगत्कर्ता परमदेवने विचार
किया कि 'मैं बहुत होऊँ, तब उसने तेजकी रचना की, फिर तेजने विचार
किया।' इत्यादि (छा० उ० ६।२।३-४) इस वर्णनमें जो तेज आदि
तत्त्वमें विचार करनेवाला उनका अधिष्ठाता बताया गया है, वह परमात्मा
ही है; क्योंकि तैत्तिरीयोपनिषद्में कहा है कि 'इस जगत्की रचना करके
उसने उसमें जीवात्माके साथ-साथ प्रवेश किया।' (तै० उ० २।६)
इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमेश्वरने ही उन तत्त्वोंमें अधिष्ठातारूपसे
प्रविष्ट होकर विचार किया, स्वतन्त्र जड तत्त्वोंने नहीं।
सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि वह परब्रह्म परमेश्वर