वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
सम्बन्ध— सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' को जगत्का कारण न माननेमें कोई
दोष नहीं है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरा कारण उपस्थित करते हैं—
इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ । १ । २ ॥
च=तथा; इतरेषाम्=अन्य स्मृतिकारोंके (मतमें); अनुपलब्धेः=प्रधान-
कारणवादकी उपलब्धि नहीं होती, इसलिये (भी प्रधानको जगत्का
कारण न मानना उचित ही है)।
व्याख्या— मनु आदि जो दूसरे स्मृतिकार हैं, उनके ग्रन्थोंमें सांख्य-
शास्त्रोक्त प्रक्रियाके अनुसार प्रधानको कारण मानने और उससे सृष्टिके
होनेका वर्णन नहीं मिलता है; इसलिये इस विषयमें सांख्यशास्त्रको प्रमाण
न मानना उचित ही है।
सम्बन्ध— सांख्यकी सृष्टि-प्रक्रियाको योगशास्त्रके प्रवर्तक पातंजल
भी मानते हैं, अतः उसको मान्यता क्यों न देनी चाहिये ? इसपर कहते हैं—
एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ २ । १ । ३ ॥
एतेन=इस पूर्वोक्त विवेचनसे; योगः=योगशास्त्रका भी; प्रत्युक्तः=प्रत्युत्तर हो
गया।
व्याख्या— उपर्युक्त विवेचनसे अर्थात् पूर्वसूत्रोंमें जो कारण बताये गये हैं,
उन्हींसे पातंजल-योगशास्त्रकी भी उस मान्यताका निराकरण हो गया,
जिसमें उन्होंने दृश्य (जडप्रकृति)-को जगत्का स्वतन्त्र कारण कहा है;
क्योंकि अन्य विषयोंमें योगका सांख्यके साथ मतभेद होनेपर भी जड
प्रकृतिको जगत्का कारण माननेमें दोनों एकमत हैं; अतः एकके ही
निराकरणसे दोनोंका निराकरण हो गया।
सम्बन्ध— पूर्वप्रकरणमें यह कहा गया है कि वेदानुकूल स्मृतियोंको ही
प्रमाण मानना आवश्यक है, इसलिये वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतियोंको मान्यता न
देना अनुचित नहीं है। इसलिये पूर्वपक्षी वेदके वर्णनसे सांख्यमतकी एकता
दिखानेके लिये कहता है—