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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

Page 263 of 486

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Page 263

२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
श्रुतिमें वर्णन आया है। इस प्रसंगमें यह संदेह होता है कि नाम-रूपादिको
रचना करनेवाला कोई जीवविशेष है या परमात्मा ही। अतः इसका निर्णय
करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं—
संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २ । ४ । २० ॥
संज्ञामूर्तिक्लृप्तिः = नाम-रूपकी रचना; तु = भी; त्रिवृत्कुर्वतः = तीनों तत्त्वोंका
मिश्रण करनेवाले परमेश्वरका (ही कर्म है); उपदेशात् = क्योंकि वहाँ श्रुतिके
वर्णनसे यही बात सिद्ध होती है।
व्याख्या—इस समस्त नाम-रूपात्मक जगत्की रचना करना जीवात्माका
काम नहीं है। वहाँ जो जीवात्माके सहित परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात
कही गयी है, उसका अभिप्राय जीवात्माके कर्तापनमें परमात्माके कर्तृत्वकी
प्रधानता बताना है। उसे सृष्टिकर्ता बताना नहीं; क्योंकि जीवात्माके कर्म-
संस्कारोंके अनुसार उसको कर्म करनेकी शक्ति आदि और प्रेरणा देनेवाला
वही है। अतएव वहाँके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि नाम-रूपसे व्यक्त की
जानेवाली इस जड-चेतनात्मक जगत्की रचनारूप क्रिया उस परब्रह्म परमेश्वरकी
ही है जिसने उन तत्त्वोंको उत्पन्न करके उनका मिश्रण किया है; अन्य
किसीकी नहीं।
सम्बन्ध—उस परमात्माने तीनोंका मिश्रण करके उनसे यदि जगत्की
उत्पत्ति की तो किस तत्त्वसे कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ? इसका विभाग किस
प्रकार उपलब्ध होगा, इसपर कहते हैं—
मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ २ । ४ । २१ ॥
(जिस प्रकार) मांसादि = मांस आदि; भौमम् = पृथिवीके कार्य बताये
गये हैं, (वैसे ही); यथाशब्दम् = वहाँ श्रुतिके शब्दद्वारा बताये अनुसार;
इतरयोः = दूसरे दोनों तत्त्वोंका कार्य; च = भी समझ लेना चाहिये।
व्याख्या—भूमि यानी पृथिवीके कार्यको भौम कहते हैं। उस प्रकरणमें
जिस प्रकार भूमिरूप अन्नके कार्य मांस, विष्ठा और मन—ये तीनों बताये
गये हैं, उसी प्रकार उस प्रकरणके शब्दोंमें जिस-जिस तत्त्वके जो-जो कार्य