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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २

३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
व्याख्या—कठोपनिषद् (२। २। ९)-में कहा है कि—
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥
'जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्डमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि नाना
रूपोंमें उनके सदृश रूपवाला हो रहा है, उसी प्रकार सब प्राणियोंका
अन्तरात्मा परमेश्वर एक होता हुआ ही नाना रूपोंमें प्रत्येकके रूपवाला-
सा हो रहा है तथा उनके बाहर भी है।' अग्निकी ही भाँति वहाँ वायु और
सूर्यके दृष्टान्तसे भी परमेश्वरकी वस्तुगत गुण-दोषसे निर्लेपता सिद्ध की
गयी है (क० उ० २। २। १०-११)। इस प्रकार प्रतिबिम्बके अतिरिक्त
दूसरे दृष्टान्त, जो उस ब्रह्मकी स्थितिके सत्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले
हैं, वेदमें देखे जाते हैं; इसलिये भी प्राणियोंमें और प्रत्येक वस्तुमें उस
परब्रह्म परमेश्वरकी स्थिति प्रतिबिम्बकी भाँति आभासमात्र नहीं; किंतु
सत्य है। अतएव वह सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है,
यही मानना युक्तिसंगत है।
सम्बन्ध— यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि परब्रह्म परमेश्वर दोनों
प्रकारके लक्षणोंवाला है। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें ब्रह्मको दोनों
प्रकारवाला बताकर अन्तमें जो ऐसा कहा गया है 'नेति-नेति' अर्थात् ऐसा
नहीं है, ऐसा नहीं है, इन निषेधपरक श्रुतियोंका क्या अभिप्राय है? अतः
इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च
भूयः ॥ ३।२।२२॥
प्रकृतैतावत्त्वम् = प्रकरणमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनकी
इयत्ताका; प्रतिषेधति = 'नेति-नेति' श्रुति निषेध करती है; हि = क्योंकि; ततः =
उसके बाद; भूयः = दुबारा; ब्रवीति च = कहती भी है।
व्याख्या— बृहदारण्यकोपनिषद्में ब्रह्मके मूर्त और अमूर्त दो रूप बताकर
प्रकरण आरम्भ किया गया है। वहाँ भौतिक जगत्में तो पृथ्वी, जल