वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
चरणाभिधानात् = (उस प्रसंगमें) उक्त ज्योतिके चार पादोंका
एकता बतायी गयी है, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया
है, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय। इसलिये यह जिज्ञासा होती है
कि उक्त 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है? इसपर कहते हैं—
ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १। १। २४॥
चरणाभिधानात् = (उस प्रसंगमें) उक्त ज्योतिके चार पादोंका
कथन होनेसे; ज्योतिः='ज्योतिः' शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमें 'ज्योतिः' का वर्णन
इस प्रकार हुआ है— 'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः
पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः
पुरुषे ज्योतिः ॥' (३। १३। ७) अर्थात् 'जो इस स्वर्गलोकसे ऊपर परम
ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर),
जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम परमधाममें प्रकाशित
हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति
है।' इस प्रसंगमें आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं
है, यह बात तो इसमें वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है तथापि यह
'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है? ज्ञानका या जीवात्माका अथवा
ब्रह्मका? इसका निर्णय नहीं होता; अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो
'ज्योतिः' शब्द आया है, वह ब्रह्मका ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व
बारहवें खण्डमें इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त
भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतस्वरूप
तथा परमधाममें स्थित बताया है।* इसलिये इस प्रसंगमें आया हुआ
'ज्योतिः' शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता।
माण्डूक्योपनिषद् मन्त्र ४ और १० में आत्माके चार पादोंका वर्णन
- वह मन्त्र इस प्रकार है—
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
(छा० उ० ३। १२। ६)